भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 778, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 778

३६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

दिशत प्रीतिवाचं मे ममांके वल्गताधुना ।
किमिदानीमिमं तातमवमुच्य सुखं गताः ॥४॥
युष्मान्विना न शोभन्ते मम राज्यानि पुत्रकाः ।
रिक्तानि मम गेहानि रिक्ता राजसभापि मे ॥५॥
कथमेवं विनिःशेषं हता यूयं दुराशयाः ।
अप्रधृष्यभुजासत्त्वान्भवतो मत्कुलांकुरान् ।
कथमेकपदे दुष्टा वनिता संगरेऽवधीत् ॥६॥
मम नष्टानि सौख्यानि मम नष्टाः कुलस्त्रियः ।
इतः परं कुले क्षीणे साहसानि सुखानि च ॥७॥

इसके अनन्तर अपने समस्त पुत्रों के विनष्ट हो जाने पर महान शोक से परिप्लुत होकर भण्डासुर विलाप करने लगा था और उसने यह मान लिया था कि अब मेरे कुल का नाश हो गया है ।१। वह इस रीति से क्रन्दन करने लगा था—हा ! मेरे पुत्रो ! तुम सब तो बहुत ही उदार गुणों वाले थे—तुम सभी मेरी आज्ञा में तत्पर रहे थे—हा ! आप तो मेरे नेत्रों को सुधा के सूर के ही समान थे और मेरे कुल को बढ़ाने वाले थे ।२। हा ! आप लोग तो सभी देवों के मद का भंजन करने वाले थे—हा ! आप लोग देवाङ्गनाओं के हृदयों को मोहित करने में कामदेव के ही तुल्य थे ।३। मुझे अपनी प्रीति युक्त वाणी सुनाओ—अब मेरी गोद में आकर बैठो—इस समय यह घटना हो गयी है कि आप लोग अपने पिता का त्याग करके सुखी हो गये हो ।४। हे पुत्रो ! आप सबके बिना यह मेरे राज्य शोभित नहीं हो रहे हैं । मेरे घर सब अब सूने हैं और मेरी राज्य सभा भी सूनी हो गयी है । यह क्या हुआ और आप सभी कैसे दुराशयों वाले एक ही साथ निहत हो गये हैं । जिनकी भुजाओं का बल कोई भी दबा नहीं सकता था ऐसे जो मेरे कुल के अंकुर आप सब थे उन सबको एक ही बार में उस दुष्टा नारी ने युद्ध में कैसे मार डाला था ।५-६। मेरी सब सेनाएँ नष्ट हो गयीं और मेरी कुल स्त्रियां भी विनष्ट हो गयी हैं । इससे आगे कुल के क्षीण हो जाने पर सब साहस और सुख भी विनष्ट हो गये हैं ।७।

भवतः सुकृतैर्लब्ध्वा मम पूर्वजनुः कृतैः ।
नाशोऽयं भवतामद्य जातो नष्टस्ततोऽस्म्यहम् ॥८