संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगणनाथ पराक्रम वर्णन ] [ ३६६
हा हतोऽस्मि विपन्नोऽस्मि मन्दभाग्योऽस्मि पुत्रकाः । इति शोकार्तस पर्यस्यन्प्रलपन्मुक्तमूर्धजः । मूर्च्छंया लुप्तहृदयो निष्पपात नृपासनात् ॥६ विशुक्रश्च विषंगश्च कुटिलाक्षश्च संसदि । भंडमाश्वासयामासुर्दैवस्य कुटिलक्रमैः ॥१० विशुक्र उवाच- देव किं प्राकृत इव प्राप्तः शोकस्य वश्यताम् । लपसि त्वं प्रति सुतान्प्राप्तमृत्यून्महाहवे ॥११ धर्मवान्विहितः पंथा वीराणामेष शाश्वतः । अशोच्यमाहवे मृत्युं प्राप्नुवंति यदर्हितम् ॥१२ एतदेव विनाशाय शल्यवद्बाधते मनः । यत्स्त्री समागत्य हठान्निहंति सुभटान्रणे ॥१३ इत्युक्ते तेन दैत्येन पुत्रशोको व्यमुच्यत । भंडेन चंडकालाग्निसदृशः क्रोध आदधे ॥१४
आप लोगों के जन्म मैंने पूर्व पुण्यों के द्वारा ही प्राप्त किये थे आज आप सबका विनाश हो गया है अब तो मैं भी विनष्ट ही हो गया हूँ ।८। हे पुत्रो ! हा ! अब तो मैं मर ही गया हूँ-विपत्ति ग्रस्त हो गया हूँ ओर खोटी तकदीर वाला हो गया हूँ । इस तरह से वह शोक से ग्रस्त हो गया था और माथे के बालों को खोलकर प्रलाप कर रहा था। उसको मूर्च्छा हो गयी थी ओर उसकी हृदयगति लुप्त हो गयी थी-वह फिर नृपासन से नीचे गिर पड़ाथा ।६। फिर विशुक्र-विषङ्ग ओर कुटिलकर्मों ने उस संसद में भाग्य के कुटिलाओं को कहते हुए भण्डासुर को आश्वासन दिया था ।१०। विशुक्र ने कहा-हे स्वामिन् ! आप सामान्य मानव के ही समान शोक के वश में क्यों प्राप्त हो गये हैं। महान संग्राम में मरे हुए पुत्रों की ओर क्या बात कर रहे हैं ।११। वीरों का तो यह युद्ध करते हुए मर जाना धार्मिक मार्ग ही है और यह निरन्तर होने वाला है । जो युद्ध में मृत्यु को प्राप्त होते हैं वह तो उनकी मृत्यु शोच करने के योग्य नहीं हुआ करती है प्रत्युत पूजित ही हुआ करती है ।१२। केवल यही बात शल्य के समान मन को