संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पीड़ा दे रही है कि स्त्री ने आकर युद्ध में बड़े-बड़े योद्धाओं का हनन किया है ।१३। उस दैत्य के द्वारा ऐसा कहने पर भण्ड ने पुत्रों के शोक का त्याग कर दिया था और फिर भण्ड ने प्रचण्ड कालाग्नि के समान क्रोध किया था ।१४।
स कोशात्क्षिप्रमुद्धृत्य खड्गमुग्रं यमोपमम् । विस्फारिताक्षियुगलो भृशं जज्वाल तेजसा ॥ १५ ॥ इदानीमेव तां दुष्टां खड्गेनानेन खण्डशः । शकलीकृत्य समरे श्रमं प्राप्स्यामि बंधुभिः ॥ १६ ॥ इति रोषस्खलद्वर्णः श्वसन्निव भुजंगमः । खड्गं विधुन्वन्नुत्थायः प्रचचालातिमत्तवत् ॥ १७ ॥ तं निरुध्य च संभ्रान्ताः सर्वे दानवपुङ्गवाः । वाचमूचुरतिक्रोधाज्ज्वलंतो ललितां प्रति ॥ १८ ॥ न तदर्थे कार्यः स्वामिन्संभ्रम ईदृशः । अस्माभिः स्वबलैर्युक्तैः रणोत्साहो विधीयते ॥ १९ ॥ भवदाज्ञालवं प्राप्य समस्तभुवनं हठात् । विमर्दयितुमीशाः स्मः किमु तां मुग्धभामिनीम् ॥ २० ॥ किं चोषयामः सप्ताब्धीन्क्षोदयामोऽथ वा गिरीन् । अधरोत्तरमेवैतत्रैलोक्यं करवाम वा ॥ २१ ॥
उसने यमराज के तुल्य अपने खड्ग को म्यान से निकाल लिया था जो बड़ा ही उग्र था । उसने अपने नेत्रों को फैलाया था और वह तेज से ज्वलित हो गया था ।१५। युद्ध में बन्धुओं के सहित इसी समय मैं इस खड्ग से उस दुष्टा के खण्ड-२ करके युद्ध में श्रम को प्राप्त करूंगा ।१६। इस तरह से रोष से उसका वर्ण स्खलित हो गया था और वह सर्प के ही तुल्य निःश्वास ले रहा था । वह एक मत्त पुरुष के ही समान अपने खड्ग को हिलाता हुआ वहाँ से चल दिया था ।१७। सभी सम्भ्रान्त दानवों ने उसको रोक दिया था और अत्यधिक क्रोध से जलते हुए उन्होंने ललिता के प्रति वचन कहने का आरम्भ कर दिया था ।१८। हे स्वामिन् ! उसके लिए आपको ऐसा सम्भ्रम नहीं करना चाहिए। हम लोग अपने बलों से समन्वित