संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगणनाथ पराक्रम वर्णन ] [ ३७१
होकर रण करने का उत्साह करते हैं ।१६। आपकी सामान्य भी आज्ञा पाकर हम लोग सम्पूर्ण भुवन का मर्दन करने में हठ से समर्थ हैं। उस मुग्ध भामिनी की तो बात ही क्या है। अर्थात् वह बिचारी नारी हमारे सामने बहुत ही तुच्छ है ।२०। क्या हम सातों सागरों का चूस डालें अथवा समस्त पर्वतों को खोदकर चूर्ण कर देवें और इन तीनों भुवनों को उठाकर अधर देवें। तात्पर्य यह है कि हम असम्भव कार्य को भी आपके आदेश से कर सकने की शक्ति रखते हैं ।२१।
छिन्दाम सुरान्सर्वान्भिन्दाम तदालयान् ।
पिनषाम हरित्पालानाज्ञां देहि महामते ॥२२
इत्युदीरितमाकर्ण्य महाहंकारगर्वितम् ।
उवाच वचनं क्रुद्धः प्रतिघारुणलोचनः ॥२३
विशुक्र भवता गत्वा मायांतर्हितवर्ष्मणा ।
जयविघ्नं महायन्त्रं कर्त्तव्यं कटके द्विषाम् ॥२४
इति तस्य वचः श्रुत्वा विशुक्रो रोषरुषितः ।
मायातिरोहितवपुर्जगाम ललिताबलम् ॥२५
तस्मिन्प्रयातुमुद्युक्ते सूर्योऽस्तं समुपागतः ।
पर्यस्तकिरणस्तोमपाटलीकृतदिङ्मुखः ॥२६
अनुरागवती संध्या प्रयांतं भानुमालिनम् ।
अनुवव्राज पातालकुञ्जे रंतुमिवोत्सुका ॥२७
वेगात्प्रपततो भानोर्देहसङ्गात्समुत्थिताः ।
चरमाब्धेरिव पयःकणास्तारा विरेजिरे ॥२८
हम समस्त सुरों को छेद डालेंगे शौर उनके आलयों को तोड़-फोड़ डालेंगे। हम दिक्पालों को पीस डालेंगे। हे महामते ! आप हमको अपनी आज्ञा भर दे दीजिए ।२२। इस महान अहंकार से युक्त वचन को सुनकर लाल नेत्रों वाला भण्ड क्रुद्ध होकर बोला था ।२३। हे विशुक्र ! माया से अपने वर्म को छिपाकर आप वहाँ जाकर कटक में शत्रुओं के जय के विघ्न वाले महामन्त्र को करो ।२४। उसके इस वचन को श्रवण करके विशुक्र रोष से भर गया था और माया से अपने शरीर को छिपाकर ललिता की सेना