संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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में गया था ।२५। जब प्रयाण करने को वह उद्यत हुआ था तो सूर्य अस्त हो गया था । पर्यस्त किरणों के समुदाय से दिशाएँ सब पारस वर्ण की हो गयीं थीं ।२६। अनुराग वाली सन्ध्या गमन करते हुए भानुमाली पीछे ही चली गयी मानो पाताल की कुञ्ज में वह सूर्य के साथ रमण करने को उत्सुक हो गयी थी। चरमाब्धि के पय के ही समान तारे शोभित हो रहे थे । बड़े वेग से प्रयाण करने वाले सूर्य के देह के सङ्ग से ही वे कण समुत्थित हुए थे ।२७-२८।
अथाससाद बहुलं तमः कज्जलमेचकम् ।
सार्थं कत्तुंमिवोद्युक्तं सवर्णस्यासिदुर्धिया ॥२९॥
मायारथं समारूढो गूढशार्वरसंवृतः ।
अदृश्यवपुरापेदे ललिताकटकं खलः ॥३०॥
तत्र गत्वा ज्वलज्ज्वलं वह्निप्राकारमंडलम् ।
शतयोजनविस्तारमालोकयत दुर्मतिः ॥३१॥
परितो विभ्रमञ्छालमवकाशमवाप्नुवन् ।
दक्षिणं द्वारमासाद्य निदध्यौ क्षणमुद्धतः ॥३२॥
तत्रापश्यन्महासत्त्वास्सावधाना धृतायुधाः ।
आरूढयानाः संनद्धवर्माणो द्वारदेशतः ॥३३॥
स्तंभिनीप्रमुखाः शक्तीर्विशत्यक्षौहिणीयुताः ।
सर्वदा द्वाररक्षार्थं निर्दिष्टा दंडनाथया ॥३४॥
विलोक्य विस्मयाविष्टो विचार्य च चिरं तदा ।
शालस्य बहिरेवासौ स्थित्वा यन्त्रं समातनोत् ॥३५॥
इसके अनन्तर काजल के तुल्य एक दम काला बड़ा भारी अन्धकार प्राप्त हो गया था । असिकी दुर्धी से मानों सवर्ण का साथ करने को ही बह उद्युक्त हो गया था ।२९। गूढ शार्वर से संवृत वह दैत्य माया के रथ पर सवार हुआ था और उसने अपना शरीर अदृश्य कर लिया था । फिर वह खल ललिता की सेना में प्राप्त हुआ था ।३०। वहाँ जाकर उस दुष्ट बुद्धि वाले ने अग्नि का प्राकार मण्डल देखा था जो जलती हुई ज्वालाओं वाला था और सौ योजन के विस्तार से समन्वित था ।३१। उसके सब ओर भ्रमण