संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ । [ ब्रह्माण्ड पुराण
अथाग्निवरणद्वारा ताभ्यामनुगता सती । प्रभूतसेनायुक्ताभ्यां निर्जगाम कुमारिका ॥६५॥ सनाथशक्तिसेनानां सर्वासामनुगृह्णती । प्रणामांजलिजालानि कर्णीरथकृतासना ॥६६॥ भंडस्य तनयान्दुष्टानभ्यद्रवदरिंदमा । तस्याः प्रादेशिकं सैन्यं कुमार्या न हि विद्यते ॥६७॥ सर्वं हि ललितासैन्यं तत्सैन्यं समजायत । ततः प्रवृत्ते युद्धमत्युद्धतपराक्रमम् ॥६८॥
'हे बालिके ! क्योंकि आप तो श्री देवी के मूर्त्तिमान् जीवन ही हैं अतएव यह उचित नहीं है जबकि सेनाएं विद्यमान हैं ।६२। आप तो इस समय इस रण करने के उत्साह को त्याग कर लौट जाइए । आपको हमारे प्रणाम किये जाते हैं । इस तरह से उन दोनों के द्वारा प्रार्थना भी की गयी थी तो भी दृढ़ निश्चय वाली वहां चल दी थी ।६३। मन्त्रिणी और दण्डनायिका दोनों अत्यधिक विस्मय से समाविष्ट हो गईं थीं और उसके दोनों ओर उसी की रक्षा करने के लिए चल दी थीं ।६४। इसके अनन्तर अग्नि के वरण के द्वारा उन दोनों से अनुगता होती हुई जो बहुत सेना से युक्त थीं कुमारिका वह वहां से निर्गत हुई थी ।६५। कर्णीरथ पर विराजमान स्वामी के सहित समस्त शक्तियों की सेनाओं पर अनुग्रह करती हुई वह रवाना हुई थी । उसको मार्ग में सभी प्रणामाञ्जलियां कर रहे थे ।६६। शत्रुओं का दमन करने वाली ने भंडासुर के पुत्रों पर आक्रमण कर दिया था । उस कुमारी की प्रादेशिक सेना नहीं थी ।६७। समस्त ललिता की ही सेना हो उसकी सेना हो गयी थी । इसके अनन्तर अतीव उद्धत पराक्रम से संयुत महान् युद्ध प्रवृत्त हो गया था ।६८।
ववर्ष शरजालानि दैत्येन्द्रेषु कुमारिका । भण्डासुरकुमारैस्तैर्महाराज्ञो कुमारिका । यद्युद्धमतनोत्तत्तु स्पृहणीयं सुरासुरैः ॥६६॥ अत्यन्तविस्मिता दैत्यकुमारा नववर्षिणीम् । कर्णीरथस्थामलोक्य किरन्तीं शरमंडलम् ॥१००॥