भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भंड पुत्र वध वर्णन ] [ ३६३

तस्यां रणे प्रवृत्तायां सर्वपर्वस्थदेवताः । बद्धांजलिपुटा नेमुः प्रधृतासिपरम्पराः ॥८८॥ ताभिः प्रणम्यमाना सा चक्रराजरथोत्तमात् । अवरुह्य तले सैन्यं वर्तमानमगाहत ॥८९॥ तामायांतीमथो दृष्ट्वा कुमारीं कोपपाटलाम् । मंत्रिणीदण्डनाथे च सभये वाचमूचतुः ॥६०॥ किं भर्तृदारिके युद्धे व्यवसायः कृतस्त्वया । अकांडे किं महाराज्ञा प्रेषितासि रणं प्रति ॥६१॥

श्री ललिता अम्बा से उस कुमारी का परम दृढ़ निश्चय समझकर अपनी बाहुओं से खूब अच्छी तरह समालिङ्गन करके उसको युद्ध करने की आज्ञा दी थी ।८५। ललिता देवी ने अपने कवच से एक कवच निकाल कर उसको दिया था और अपने आयुधों से आयुध देकर उसको विदा किया था ।८६। चाप और दंड से समुद्धृत महाराज्ञी का कर्णी रथ था जो सैकड़ों हंसों से युक्त था उस पर कुमारिका ने समारोहण किया था ।८७। उसके रण में प्रवृत्त हो जाने पर सभी पर्वों पर स्थित देवता हाथों को जोड़े हुए असियों को प्रधृत करके प्रणाम करने लगे थे ।८८। उनके द्वारा प्रणाम किये जाने पर वह देवी चक्रराज रथोत्तम से नीचे उतर गयी और वहाँ पर जो सेना थी उसका अवगाहन किया था ।८९। इसके अनन्तर उस कुमारी को कोप से पाटल और आती हुई देखा तो मन्त्रिणी और दंडनाथा ने भययुक्त होकर यह वचन कहे थे ।६०। हे भर्तृदारिके ! क्या आपने युद्ध में व्यवसाय किया है ? महाराज्ञी ने अकाण्ड में यह क्या रण की ओर आपको भेज दिया है ? ।६१।

तदेतदुचितं नैव वर्तमानेऽपि सैनिके । त्वं मूर्तं जीवितमसि श्रीदेव्या बालिके यतः ॥६२॥ निवर्तस्व रणोत्साहात्प्रणामस्ते विधीयते । इति ताभ्यां प्रार्थितापि प्राचलद्दृढनिश्चया ॥६३॥ अत्यन्तं विस्मयाविष्टे मंत्रिणोदण्डनायिके । सहैव तस्या रक्षार्थं चेलतुः पार्श्वयोर्द्वयोः ॥६४॥