संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
त्वां विना क्षणमात्रं मे न निश्वासः प्रवर्तते । ममोच्छ्वसितमेवासि न त्वं याहि महाहवम् ॥८२ दण्डिनी मन्त्रिणी चैव शक्तयोऽन्याश्च कोटिशः । संत्येव समरे कर्तुं वत्से त्वं किं प्रमाद्यसि ॥८३ इति श्रीललितादेव्या निरुद्धापि कुमारिका । कौमारकौतुकाविष्टा पुनर्युद्धमयाचत ॥८४
मैं कुमारी होने से बड़े कौतुक के साथ उनके साथ युद्ध करना चाहती हूँ । इस युद्ध करने की खुजली से मेरी बाहुएं फड़क रही हैं ।७८। आप मुझे इसके लिए निवारित न करें क्योंकि इस निषेध करने से तो मेरी यह क्रीड़ा का हनन ही हो जायगा । मैं तो छोटी बच्ची हूँ सर्वदा ही क्रीड़ाओं में मेरा अनुराग रहा करता है ।७९। क्षणभर रण करने की क्रीड़ा से मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी और चित्त में आनन्द होगा । जब इस तरह से देवी से कहा गया था तो ललिता देवी ने उस कुमारिका से कहा था ।८०। हे वत्से ! तुम तो बहुत ही कोमल अङ्ग वाली हो-नौ ही वर्ष की हो और नूतन क्रम वाली हो और तुमको नये युद्ध की ही शिक्षा मिली है ऐसी कुमारी तुम मेरी एक ही सैनिका हो ।८१। तुम्हारे बिना मुझे एक क्षण भी निश्वास नहीं होता है । तुम तो मेरे श्वास ही हो अतः तुम इस महान् संग्राम में मत जाओ ।८२। दण्डिनी और मन्त्रिणी ऐसी अन्य करोड़ों ही शक्तियाँ हैं, हे वत्से ! जो इस संग्राम में उपस्थित ही रहती हैं । तुम ऐसा प्रमाद क्यों कर रही हो ? ।८३। इस रीति से ललिता देवी के द्वारा उस कुमारी को रोका भी गया था तो भी कुमारावस्था के कौतुक से समाविष्ट होकर पुनः युद्ध करने की प्रार्थना उसने की थी ।८४।
सुदृढं निश्चयं दृष्ट्वा तस्याः श्रीललितांबिका । अनुज्ञां कृतवत्येव गाढमाश्लिष्य बाहुभिः ॥८५
स्वकीयकवचादेकमाच्छिद्य कवचं ददौ । स्वायुधेभ्यश्चायुधानि वितीर्य विससर्ज ताम् ॥८६
कर्णीरथं महाराज्या चापदण्डात्समुद्धृतम् । हंसयुग्मशतैर्युक्तमारुरोह कुमारिका ॥८७