भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 771

भंड पुत्र वध वर्णन ] [ ३६१

बालारुणतनुः श्रोणी शोणवर्णवपुर्लता । महाराज्ञी पादपीठे नित्यमाहितसंनिधिः ॥७५॥ तस्या बहिश्चराः प्राणा या चतुर्थं विलोचनम् । तानागतानभाण्डसुतान्संहारिष्यामि सत्वरम् ॥७६॥ इति निश्चित्य बालांबा महाराज्यै व्यजिज्ञपत् । मातर्भंडमहादैत्यसूनवो योद्धुमागताः ॥७७॥

अनेक प्रकार के आयुधों के गिराने से विमानों की छटा को मूर्च्छित करते हुए उन्होंने वहाँ आकर अपने सैनिकों के साथ कलकल ध्वनि कर दी थी ॥७१॥ चतुर्बाहु जिनमें प्रमुख था ऐसे उन भण्डासुर के कुमारों को आये हुए जानकर जो कि युद्ध के ही लिए समागत हुए थे बाला ने अपने मन में कौतूहल किया था ॥७२॥ उस ललिता देवी के निकट में वास करने वाली कुमारी समस्त शक्तियों के चक्रों की पूज्य और विक्रम वाली थी ॥७३॥ कुमारी ललिता के ही तुल्य आकार वाली थी। उसने कोप किया था जो सदा नूतन वर्षा के ही समान समस्त विद्याओं की बड़ी खान थी ॥७४॥ उसकी श्रोणी बालसूर्य के तुल्य लाल वर्ण की थी तथा उसका शरीर भी शोण (रक्त) था। वह महाराज्ञी के पाद पीठ पर ही नित्य सन्निधान करने वाली थी ॥७५॥ उसके बाहिर संचरण करने वाले प्राण जो चौथा नेत्र ही था। उसने कहा था उन समागत भंड के पुत्रों को मैं शीघ्र मार डालूँगी ॥७६॥ उस बालाम्बा ने यह निश्चय करके महारानी से कहा था—हे माता ! भंडासुर के पुत्र युद्ध करने को आ गये हैं ॥७७॥

तैः समं योद्धुमिच्छामि कुमारित्वात्सकौतुका । स्फुरन्ताविव मे बाहू युद्धकण्डूयनयानया ॥७८॥ क्रीडा ममैषा हन्तव्या न भवत्या निवारणैः । अहं हि बालिका नित्यं क्रीडनेष्वनुरागिणी ॥७९॥ क्षणं रणक्रीडया च प्रीति यास्यामि चेतसा । इति विज्ञापिता देवी प्रत्युवाच कुमारिकाम् ॥८०॥ वत्से त्वमतिसृद्वंगी नववर्षा नवक्रमा । नवीनयुद्धशिक्षा च कुमारी त्वं ममैकिका ॥८१॥