संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
यौवनेन मदेनान्धा भूयसा रुद्धदृष्टयः । भ्रुकुटीकुटिलाश्चक्रुः सिंहनादं महत्तरम् ॥६८॥ विदीर्णमिव तेनासीद्ब्रह्मांडं चंडिमस्पृशा । उत्पातवारिदोत्सृष्टघोरनिर्घातरंहसा ॥६९॥ एतस्यानुभूतस्य महाशब्दस्य डम्बरः । क्षोभयामास शक्तीनां श्रवांसि च मनांसि च ॥७०॥
दो सौ अक्षौहिणी सेना को साथ में लेकर उस भण्ड के पुत्र नगर से भृकुटियां तानकर क्रूर मुखों वाले होते हुए ही निकल कर चल दिये थे ।६४। वे यही कहते हुए चल रहे थे कि हम समस्त शक्तियों की सेनाओं को खा जायेंगे और रण में एक ही क्षण में अपने तीक्ष्ण बाणों से उनके सभी आयुधों का चूर्ण कर देंगे ।६५। उस अग्नि की चहार दीवारी के वलय को भी वेग से शान्त कर देंगे। उस दुर्विदग्धा ललिता को शीघ्र बन्दी बना डालेंगे ।६६। वे भण्डासुर के पुत्र परस्पर में वीर भाषणों के उद्घोषों से बातचीत करते हुए उस अग्नि के प्राकार के समीप में प्राप्त हो गये थे ।६७। यौवन से और बड़े बढ़े हुए मद से अन्धे हो रहे थे और उनकी दृष्टि रुद्ध हो गयी थी । उन्होंने अपनी भौहों को तिरछी करके बड़ा भारी सिंहनाद किया था ।६८। प्रचण्ड स्पर्श वाले उस सैन्य समुदाय से यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विदीर्ण-सा हो गया था । वह सैन्य समुदाय उत्पातजनक मेघों से उत्कृष्ट घोर निर्घात के वेग वाला था ।६६। इस अनुभूत महान् घोष का डम्बर ऐसा था कि उसने शक्तियों के कानों को और मनों को क्षुब्ध कर दिया था ।७०।
आगत्य ते कलकलं चक्रुः सार्धं स्वसैनिकैः । विविधायुधसम्पातमूच्छर्द्धैमानिकच्छटम् ॥७१॥ चतुर्बाहुमुखान्भूत्वा भण्डदैत्यकुमारकान् । आगतान्युद्धकृत्याय बाला कौतूहलं दधे ॥७२॥ कुमारी ललितादेव्यास्तस्या निकटवासिनी । समस्तशक्तिचक्राणां पूज्या विक्रमशालिनी ॥७३॥ ललितासदृशाकारा कुमारी कौपमादधे । या सदा नववर्षैव सर्वविद्यामहाखनिः ॥७४॥