संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभंड पुत्र वध वर्णन ] [ ३५६
वंदिनो मागधाश्चैव कुमाराणां स्तुतिं व्यधुः । मंगलारार्तिकं चक्रुर्द्वारे द्वारे पुरांगनाः ॥६२ भिद्यमानेव वसुधा कृष्यमाणमिवांबरम् । आसीत्तेषां विनिर्याणे घूर्णमान इवार्णवः ॥६३
आप सबका प्रकोप तो अप्रमेय है । आप सब ऐसे वीरों को केवल एक नारी की ओर भेजना उचित नहीं है तथापि यह विधाता का ही ऐसा क्रम है ।५७। यह एक आपकी कीर्त्ति का बड़ा भारी विपर्यय है उसको आप लोग सहन कर लीजिए क्योंकि आपकी बहुत बड़ी शूरता है और एक साधारण नारी पर आक्रमण करना है । यह कह कर उस भण्डासुर ने उन सबको युद्ध में भेजा था । तथा उनकी सहायता के लिए दो सौ अक्षौहिणी सेनाएं भी भेज दी थीं ।५८। वह दो सौ अक्षौहिणी सेना भी सबमें शिरोमणि थी । वे सभी सैनिक क्रोध से अपनी भृकुटियों को ताने हुए थे और हाथों में हथियार लेकर वहाँ से निकले थे ।५६। जब भण्ड के पुत्रों ने निर्गमन किया था उस समय भूमण्डल काँप उठा था । अनेक उत्पात उत्पन्न हुए थे और सम्पूर्ण जगत् भयभीत हो गया था ।६०। उस पुर की प्रौढ़ स्त्रियों ने वीथियों में यानों के द्वारा चलते हुए महान् उलवान उन कुमारों के ऊपर लाजाओं की वर्षा की थी ।६१। बन्दीगण और मागधों ने उन कुमारों का स्तवन किया था और पुरकी अंगनाओं ने द्वारों पर उनकी मंगल कामना से आरती की थी ।६२। उस समय में यह भूमि विद्यमान सी हो रही थी और आकाश आकृष्यमाण-सा हो रहा था । उनके निकलने के समय सागर घूर्णमान सा हो गया था ।६३।
द्विशत्यक्षौहिणीसेनां गृहीत्वा भण्डसूनवः । क्रोधोद्यद्भ्रुकुटीक्रूरवदना निर्ययुः पुरात् ॥६४ शक्तिसैन्यानि सर्वाणि भक्षयामः क्षणाद्रणे । तेषामायुधचक्राणि चूर्णयामः शितैः शरैः ॥६५ अग्निप्रकारावलयं शमयामश्च रंहसा । दुर्विदग्धां तां ललितां वन्दीकुर्मश्च सत्वरम् ॥६६ इत्यन्योन्यं प्रबलगन्तो वीरभाषणघोषणैः । आसेदुरग्निप्राकारसमीपं भण्डसूनवः ॥६७