भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तदेनां समरेऽवश्यमात्मवश्यां विधास्यथ ।
जीवग्राहं च सा ग्राह्या भवद्भिर्ज्वलदायुधैः ॥५६

ये इतने भंडासुर के दुष्ट बुद्धि वाले और दुर्मंद पुत्र थे । ये सभी अपने पिता के ही समान तो बाहुबल वाले थे और पिता के तुल्य ही इनका कलेवर था ।५०। उन सबने भक्ति की भावना से भण्डासुर के चरणों में प्रणाम किया था । उस दानव ने प्रसन्न लोचनों से उनको देखा था और बड़े गौरव के साथ उनसे यह वाक्य बोला था और यह अपने समस्त कुल का घातक था ।५१। हे मेरे पुत्रो ! इस भूमण्डल में आपके समान कोई भी नहीं हैं। आप लोगों के ही बल-विक्रम से मैंने पहिले यह समस्त विश्व को जीत लिया था ।५२। तुम सबने युद्धस्थल में कोप से इन्द्र का—अग्नि का—यम का—निर्ऋति का और पाशी के कवचों का कर्षंण किया था ।५३। आप लोग सब अस्त्रों को भी जानते हैं। अब आप सबके जाग्रत रहते हुए भी यह हमारे कुल का भ्रंश आ गया है ।५४। कोई दुष्टा—मायाविनी और युद्ध करने में दुर्मंदा है जो कि अपने ही सदृश स्त्रियों से संयुत होकर हमको मार रही है ।५५। सो अब इसको युद्ध में अपने वश में अवश्य ही तुम कर लोगे । आप सब जलते हुए आयुधों को लेकर उसको जीवित ही पकड़ लेना ।५६।

अप्रमेयप्रकोपांधान्युष्मानेकां स्त्रियं प्रति ।
सम्प्रेषणमनौचित्यं तथाप्येष विधेः क्रमः ॥५७

इममेकं सहध्वं च शौर्यकीर्तिविपर्ययम् ।
इत्युक्त्वा भण्डदैत्येन्द्रस्तान्प्रहैषीद्रणं प्रति ।
द्विशतं चाक्षौहिणीनां तत्सहायतयाऽहिनोत् ॥५८

द्विशत्यक्षौहिणीसेना मुख्यस्य तिलकायिता ।
बद्धभ्रुकुटयः शस्त्रपाणयो निर्ययुर्गृहात् ॥५९

निर्गमे भण्डपुत्राणां भू प्रकम्पमलम्बत ।
उत्पाता विविधा जाता वित्रस्तं चाभवज्जगत् ॥६०

तान्कुमारान्महासत्त्वांल्लाजवर्षैरवाकिरन् ।
वीथीषु यानैश्चलितान्पौरवृद्धपुरंध्रयः ॥६१