संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभंड पुत्र वध वर्णन ] [ ३५७
स्वर्गशत्रुः स्वर्गबलो दुर्गारव्यः स्वर्गकण्टकः । अतिमाया बृहन्माय उपमावञ्च वीर्यवान् ॥४९॥
फिर उसने वहाँ पर कुटिलाक्ष जिनमें प्रमुख था उन सबके साथ मन्त्रणा करके तथा विषङ्ग-विशुक्र और अपने पुत्रों के साथ भी मंत्रणा की थी ॥४३। उस महान बलवान ने एक हो साथ सामूहिक प्रसार से युद्ध करने के लिए निश्चय किया था और चार समुद्रों के तुल्य जो चतुर्बाहु प्रमुख चार पुत्र थे उनको नियुक्त किया था ॥४४। उस दानव ने चारों को बुलाया था और युद्ध के कृत्यों में नियुक्त किया था । भंडासुर बड़े ही प्रचण्ड क्रोध से जलता हुआ होकर उसने हमको युद्ध के लिए भेज दिया था ॥४५। उसके पुत्र संख्या में तीस थे । इनके विशाल शरीर थे और इनमें महान बल विद्यमान था । हे कुम्भज ! उनके सबके नाम भी मैं बतलाऊँगा आप सुनिए ॥४६। चतुर्बाहु-चकोराक्ष-चतुःशिरा--वज्रघोष-ऊर्ध्वकेश-महाकाय-महाहनु-मखशत्रु-मखस्कन्दी-सिंहघोष-शिरालक-लडुन-पट्टसेन-पुराजित-पूर्वमारक-स्वर्ग-शत्रु-स्वर्गवल--दुर्गारव्य-स्वर्ग-कण्टक-अतिमाय-बृहन्माय-उपमाय-वीर्यवान् ॥४७-४६॥
इत्येते दुर्मदाः पुत्रा भण्डदैत्यस्य दुर्द्धियः । पितुः सदृशदोर्वीर्याः पितुः सदृशविग्रहाः ॥५० आगत्य भण्डचरणावभ्यवंदत भक्तितः । तानुद्वीक्ष्य प्रसन्नाभ्यां लोचनाभ्यां स दानवः । सगौरवमिदं वाक्यं बभाषे कुलघातकः ॥५१ भो भो मदीयास्तनया भवतां कः समो भुवि । भवतामेव सत्येन जितं विश्वं मया पुरा ॥५२ शक्रस्याग्नेर्यमस्यापि निर्ऋतेः पाशिनस्तथा । कचेषु कर्षणं कोपात्कृतं युष्माभिराहवे ॥५३ अस्त्राण्यपि च शस्त्राणि जानीथ निखिलान्यपि । जाग्रत्स्वेव हि युष्मासु कुलभ्रंशोऽयमागतः ॥५४ मायाविनी दुर्ललिता काचित्स्त्री युद्धदुर्मदा । बहुभिः स्वसमानाभिः स्त्रीभिर्युक्ता हिनस्ति नः ॥५५