संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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इत्थं सुरक्षितं श्रुत्वा ललिताशिबिरोदरम् ।
भूयः संज्वरमापन्नः प्रचण्डो भंडदानवः ॥४२
अन्य शक्तियों का भी महान बल जो कि शक्तियां बहुत महान थीं गत क्लम होकर विशंकदोदर शाल में प्रविष्ट हुआ था ।३६। दण्डिनी ने राजचक्र रथेन्द्र को मध्य में स्थापित कर दिया था और उसकी बांई ओर अपना रथ रखा था तथा दाहिनी ओर श्यामला का रथ स्थापित किया था ।३७। पीछे के भाग में सम्पद्देशी और आगे ह्यासना को नियुक्त किया था । इस रीति से सब ओर में चक्रराज रथ को संवेशित किया था ।३८। द्वार भाग में स्तम्भिनी नाम वाली देवी को नियोजित किया था जो बीस अक्षौहिणी सेना से समन्वित थी और जलते हुए दण्डायुधों से बहुत ही उदग्र थी ।३६। जो दण्डनाथा की देवी विघ्न देवी—इस नाम से प्रसिद्ध थी उसने इस प्रकार से शिविर को सुरक्षित बना दिया था तथा योत्रिणी-पूषणी और उदित भूयिष्ठा ने फिर युद्ध का उपाश्रय लिया था ।४०। किलकिल की ध्वनि करके वह शक्ति की विशाल सेना अग्नि के प्राकार वाले द्वार बड़ा घोष करती हुई बाहिर निकली थी ।४१। ललिता देवी के शिविर के मध्यभाग को इस प्रकार से सुरक्षित हुआ श्रवण करके वह परम प्रचण्ड भंड दानव पुनः बड़े ही सन्ताप को प्राप्त हो गया था ।४२।
मन्त्रयित्वा पुनस्तत्र कुटिलाक्षपुरोगमैः ।
विषंगेण विशुक्रेणासममात्मसुतैरपि ॥४३
एकौघस्य प्रसारेण युद्धं कर्तुं महाबलः ।
चतुर्बाहुमुखान्पुत्रांश्चतुर्जलधिसन्निभान् ॥४४
चतुरान्युद्धकृत्येषु समाहूय स दानवः ।
प्रेषयामास युद्धाय भण्डश्चण्डक्रुधा ज्वलन् ॥४५
त्रिंशत्संख्याश्च तत्पुत्रा महाकाया महाबलाः ।
तेषां नामानि वक्ष्यामि समाकर्णय कुम्भज ॥४६
चतुर्बाहुश्चकोराक्षस्तृतीयस्तु चतुःशिरा ।
वज्रघोषश्चोर्ध्वकेशो महाकायो महाहनुः ॥४७
मखशत्रुर्मखस्कन्दी सिंहघोषः सिरालकः ।
लङ्गुनः पट्टसेनश्च पुराजित्पूर्वमारकः ॥४८