भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 765, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 765

भंडपुत्र वध वर्णन ] [ ३५५

हे वत्से ! आप तो ज्वाला मालाओं से परिपूर्ण आकृति वाली वह्नि-रूपा हैं। इस महान बल की रक्षा आपको ही करनी चाहिए ।२६। इस महीतल को सौ योजन के विस्तार वाला परिवृत करो और तीस योजन ऊँचा बनाओ जो ज्वालाकार वाला हो ।३०। एक योजन मात्र द्वार को छोड़कर अन्यत्र जाज्वल्यमान कलेवर वाला होवे । वह्नि की ज्वाला को प्राप्त होकर सम्पूर्ण सेना को रक्षा करो ।३१। उस ललितेश्वरी ने ज्वाला मालिनिका से इतना ही कहा था और फिर महेन्द्र गिरि के उत्तर की भूमि के भाग में चलने का उद्यम किया था ।३२। और फिर वह नित्यानित्यमयी थी तथा जलती हुई ज्वालाओं से पूर्ण आकृति वाली थी। वह चतुर्दशी तिथि मयी थी। उसने ऐसा ही होगा—यह कहकर ललितादेवी को प्रणाम किया था ।३३। उसी भाँति से पूर्व में निर्दिष्ट महेन्द्र के उत्तर भूतल को कुण्डली कृत बनाकर उसने फिर शाल रूप से ज्वलित कर दिया था ।३४। दण्डनाथा और मन्त्रिणी की चमू भी ऐसी शोभित हुई थी मानो नभोवलय के जम्बाल से ज्वालाओं की माला से पूर्ण आकृति होवे ।३५।

अन्यासामपि शक्तीनां महतीनां महद्बलम् ।
विशंकटोदरं सालं प्रविवेश गतक्लमा ॥३६॥

राजचक्ररथेन्द्रं तु मध्ये संस्थाप्य दंडिनी ।
वामपक्षे रथं स्वीयं दक्षिणे श्यामलारथम् ॥३७॥

पश्चाद्भागे सम्पद्देशीं पुरस्ताच्च ह्मासनाम् ।
एवं संवेश्य परितश्चक्रराजरथस्य च ॥३८॥

द्वारे निवेशयामास विंशत्यक्षौहिणीयुताम् ।
ज्वलद्दंडायुधोद्ग्रां स्तम्भिनीं नाम देवताम् ॥३९॥

या देवी दंडनाथाया विघ्नदेवीति विश्रुता ।
एवं सुरक्षितं कृत्वा शिविरं योत्रिणी तथा ।
पूष्ण्युदितभूयिष्ठे पुनर्युद्धमुपाश्रयत् ॥४०॥

कृत्वा किलकिलारावं ततः शक्तिमहाचमूः ।
अग्निप्राकारद्वारान्निर्जगाम महारवा ॥४१॥