संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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जनों के उपरोधक निर्गमन करें और प्रवेश करे। ये सब बिना आलस्य वाले अनिद्र और निरन्तर उद्यत रखने चाहिए ।२२। ऐसा होने पर दुष्टों का अभीष्ट कूट युद्ध नहीं होगा। और शत्रुओं का असमयों में—सन्ध्याओं में और मध्य रात्रियों में हठ से प्रौढ़ आक्रमण नहीं हो सकने के योग्य होता है ।२३। यदि ऐसा नहीं किया जावे तो ये दैत्य बहुत बुरे अभिप्राय वाले तथा बहुत-सी माया के परिग्रह वाले हैं और ये स्वर्णकार के ही समान महान बल का विलुण्ठन कर लिया करते हैं ।२४। उस समय में मन्त्रिणी और दण्डनाथा के इस वचन का श्रवण करके शुद्ध दांतों की कान्ति से मुक्ताओं का वहन करती हुई श्री ललिता देवी ने कहा—।२५। आप सबका यह मन्त्र बहुत ही सुन्दर बुद्धि से विचारा हुआ है। यह कुशल बुद्धि का मार्ग है और यह सनातन नोति है ।२६। जीत की इच्छा वाले महान जनों को चाहिए कि अपने चक्र के आगे रक्षा करके सुदृढ़ साधन वाला होवे, फिर दूसरे शत्रु के चक्र पर आक्रमण करना चाहिए ।२७। उस ललितेश्वरी ने मन्त्रिणी और दण्डनाथा से कहा और ज्वाला मालिनिका को जो नित्या थी बुलाकर यह कहा था ।२८।
वत्से त्वं वह्निरूपासि ज्वालामालामयाकृतिः । त्वया विधीयतां रक्षा बलस्यास्य महीयसः ॥२९॥ शतयोजनविस्तारं परिवृत्य महीतलम् । त्रिंशद्योजनमुन्नद्धं ज्वालाकारत्वमाव्रज ॥३०॥ द्वारयोजनमात्रं तु मुक्त्वान्यत्र ज्वलत्तनुः । वह्निज्यालात्वमापन्ना संरक्ष सकलं बलम् ॥३१॥ ज्वालामालिनिकां नित्यामित्युक्त्वा ललितेश्वरी । महेन्द्रोत्तरभूभागं चलितुं चक्र उद्यमम् ॥३२॥ सा च नित्यानित्यमयी ज्वलज्ज्यालामयाकृतिः । चतुर्दशीतिथिमयी तथेति प्रणनाम ताम् ॥३३॥ तयैव पूर्वनिर्दिष्टं महेन्द्रोत्तरभूतलम् । कुण्डलीकृत्य जज्वल शालरूपेण सा पुनः ॥३४॥ नभोवलयजंबालज्वालामालामयाकृतिः । बभासे दंडनाथाया मंत्रिनाथचमूरपि ॥३५॥