भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 763, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 763

भंडासुर वध वर्णन ] [ ३५३

हे महाराज्ञि ! हम तो सब एक मात्र आपका ही चरण का अवलम्बन ग्रहण करके जीवित हैं और आपके समीहित का साधन करती हैं। ।१५। इसलिए हमको श्रीमती के अङ्ग की रक्षा करनी चाहिए ।१६। भण्ड आदि महान अधम दानव आपत्ति के समय में ही जीतने के योग्य हैं। ये कूट युद्ध नहीं करते हैं और इस सेना में भी प्रवेश नहीं करते हैं ।१७। उसी भाँति से महेन्द्र पर्वत के दक्षिण भाग में एक बहुत विस्तार वाला जिसकी सीमा सौ योजन की होवे शिविर बनाना चाहिए ।१८। उसकी रक्षा के लिए चारों ओर अग्नि का प्राकार बनाना चाहिए । उसमें हमारी सेना का निवेश होगा और यह द्वेषियों के दर्प का शमन करने के लिए भी होगा ।१९। सौ योजन मात्र इसका मध्य भाग प्रकल्पित किया जावे। वह्नि प्राकार चक्र का द्वार दक्षिण की ओर होना चाहिए ।२०। विद्वेषियों के पुर की स्थिति दक्षिण भाग में है जिसका नाम शून्यक है। उसके द्वार पर आयुध लिए हुए बहुत से परिवार कल्पित रहने चाहिए ।२१।

निर्गच्छतां प्रविशतां जनानामुपरोधकाः ।
अनालस्या अनिद्राश्च विधेयाः सततोद्यताः ॥२२
एवं च सति दुष्टानां कूटयुद्धं चिकीर्षितम् ।
अवेलासु च संध्यासु मध्यरात्रिषु च द्विषाम् ।
अशक्यमेव भवति प्रौढमाक्रमणं हठात् ॥२३
नो चेद्दुराशया दैत्या बहुमायापरिग्रहाः ।
पश्यतोहरवत्सर्वं विलुंठति महद्बलम् ॥२४
मंत्रिण्या दंडनाथाया इति श्रुत्वा वचस्तदा ।
शुचिदन्तरुचा मुक्ता वहन्ती ललिताब्रवीत् ॥२५
भवतीनामयं मन्त्रश्चारुबुद्ध्या विचारितः ।
अयं कुशलधीमार्गो नीतिरेषा सनातना ॥२६
स्वचक्रस्य पुरो रक्षां विधाय दृढसाधनः ।
परचक्राक्रमः कार्यो जिगीषद्भिर्महाजनैः ॥२७
इत्युक्त्वा मन्त्रिणीदंडनाथे सा ललितेश्वरी ।
ज्वालामालिनिकां नित्यामाहूयेदमुवाच ह ॥२८