संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 762, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें३५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
शक्तिचक्र की सेना की सब स्वामिनी शीघ्र ही पूजित हुईं और विभावरी रात्रि के व्यतीत होने पर उन्होंने रथेन्द्र को चारों ओर से परिवारित कर लिया था ।८। मन्त्रिणी और दण्ड नायिका दोनों अपने यानों से नीचे उतरी थीं ओर नीचे की ओर सेना को आवेशित करके तब रथ पर समारूढ़ हुई थीं ।६। क्रम से नौ पर्वों को व्यतीत करके शीघ्र क्रमों वे चलीं थीं। उन-उनके सर्वगत शक्ति चक्र जो सम्यक् रीति से निवेदित थे वे युक्त थीं ।१०। मन्त्रिणी ओर दण्ड नायिका दोनों ने महाराज्ञी का सेवन किया था। उन्होंने देवी के आगे भूमि में साष्टाङ्ग प्रणाम किया था और निवेदित किया था ।११। हे अम्बिके ! महान प्रमाद हो गया है ऐसा हमने श्रवण किया है। उन खल दैत्यों ने कूट युद्ध के प्रकार से आपका अपकार किया है ।१२। वह दुष्ट बुरे आचार वाला प्रकाश में युद्ध से डरकर कुहक व्यवहार से जय की सिद्धि चाहता है ।१३। यह तो दैव की गति है कि उन सुरों के द्रोही दुष्टों का हमारी स्वामिनी के शरीर में शर आदि का स्पर्श नहीं हुआ ओर उसी से जीवित विद्यमान हैं ।१४।
एकावलंबनं कृत्वा महाराज्ञि भवत्पदम् । वयं सर्वा हि जीवामः साधयामः समीहितम् ॥१५
अतोऽस्माभिः प्रकर्त्तव्यं श्रीमत्त्यंगस्य रक्षणम् । मायाविनश्च दैत्येन्द्रास्तत्र मन्त्रो विधीयताम् ॥१६
आपत्कालेषु जेतव्या भंडाद्या दानवाधमाः । कूटयुद्धं न कुर्वन्ति न विशंति चमूमिमाम् ॥१७
प्रथमयुद्धदिवसः— तथा महेंद्रशैलस्य कार्यं दक्षिणदेशतः । शिबिरं बहुविस्तारं योजनानां शतावधि ॥१८
वह्निप्राकारवलयं रक्षणार्थं विधीयताम् । अस्मत्सेनानिवेशस्य द्विषां दर्पशमाय च ॥१९
शतयोजनमात्रस्तु मध्यदेशः प्रकल्प्यताम् । वह्निप्राकारचक्रस्य द्वारं दक्षिणतो भवेत् ॥२०
यतो दक्षिणदेशस्थं शून्यकं विद्धिषां पुरम् । द्वारे च बहवः कल्प्याः परिवारा उदायुधाः ॥२१