संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभण्डपुत्र वध वर्णन ] [ ३५१
अथ प्रथम युद्ध दिवसः—दश अक्षौहिणियों से युक्त वीर्यशाली भी दण्डनाथा के तीक्ष्ण शरों से रण में भग्न होकर भाग गया था। उस देवी ने दश अक्षौहिणी सेना नष्ट कर दी थी।१। भण्डासुर इस वृत्तान्त को सुन-कर बड़ा क्षुब्ध हो गया था। रात्रि में कपटयुक्त संग्राम जो दुष्ट असुरों ने किया था, इसको सुनकर मन्त्रिणी और दण्डनाथा दोनों को बड़ा निर्वेद हुआ था ।२। दैत्यों के द्वारा देवी का समागमन का होना बहुत ही कष्ट का विषम है। उत्तान बुद्धि वाली हम आगे दूर चल दी थीं ।३। महाचक्र रथेन्द्र की रक्षा सैनिकों द्वारा नहीं हुई है। रात्रि में इसी अवसर को पाकर दुष्टों ने पराकरण किया था।४। वहाँ पर क्या वृत्तान्त हुआ था ? क्या स्वामिनी ने युद्ध किया था ? अथवा अन्य शक्तियों ने असुरों के साथ युद्ध किया ? ।५। यह कार्य विनष्ट हो गया-वहाँ पर कैसी प्रवृत्ति है और महा-देवी के हृदय में कौन सा प्रसंग प्रवृत्त हो रहा है।६। इस रीति से उन शक्तियों ने जिनमें दण्डनाथा अग्रणी थी शंका से बेचैन होकर मन्त्रिणी को अपना अगुआ बनाकर ललिता के समीप में गमन किया था ।७।
शक्तिचक्रचमूनाथाः सर्वास्ताः पूजिता द्रुतम् । व्यतीतायां विभावर्यां रथेन्द्रं पर्यवारयन् ॥८ अवरुह्य स्वयानाभ्यां मंत्रिणोदण्डनायिके । अधस्तात्सैन्यमावेश्य तदारुरुहतू रथम् ॥६ क्रमेण नव पर्वाणि व्यतीत्य त्वरितक्रमैः । तत्तत्सर्वगतै शक्तिचक्रैः सम्यङ् निवेदितैः ॥१० अभजेतां महाराज्ञीं मंत्रिणिदण्डनायिके । ते व्यजिज्ञपतां देव्या अष्टांगस्पृष्टभूतले ॥११ महाप्रमादः समभूदिति नः श्रुतमंबिके । कूटयुद्धप्रकारेण दैत्यैरपकृतं खलैः ॥१२ स दुरात्मा दुराचारः प्रकाशसमरात्त्रसन् । कुहकव्यवहारेण जयसिद्धिं तु कांक्षति ॥१३ दैवान्नः स्वामिनीगात्रे दुष्टानाममरद्रुहाम् । शरादिकपरामर्शो न जातस्तेन जीवति ॥१४