संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
भण्डपुत्र वध वर्णन ] [ ३५१
अथ प्रथम युद्ध दिवसः—दश अक्षौहिणियों से युक्त वीर्यशाली भी दण्डनाथा के तीक्ष्ण शरों से रण में भग्न होकर भाग गया था। उस देवी ने दश अक्षौहिणी सेना नष्ट कर दी थी।१। भण्डासुर इस वृत्तान्त को सुन-कर बड़ा क्षुब्ध हो गया था। रात्रि में कपटयुक्त संग्राम जो दुष्ट असुरों ने किया था, इसको सुनकर मन्त्रिणी और दण्डनाथा दोनों को बड़ा निर्वेद हुआ था ।२। दैत्यों के द्वारा देवी का समागमन का होना बहुत ही कष्ट का विषम है। उत्तान बुद्धि वाली हम आगे दूर चल दी थीं ।३। महाचक्र रथेन्द्र की रक्षा सैनिकों द्वारा नहीं हुई है। रात्रि में इसी अवसर को पाकर दुष्टों ने पराकरण किया था।४। वहाँ पर क्या वृत्तान्त हुआ था ? क्या स्वामिनी ने युद्ध किया था ? अथवा अन्य शक्तियों ने असुरों के साथ युद्ध किया ? ।५। यह कार्य विनष्ट हो गया-वहाँ पर कैसी प्रवृत्ति है और महा-देवी के हृदय में कौन सा प्रसंग प्रवृत्त हो रहा है।६। इस रीति से उन शक्तियों ने जिनमें दण्डनाथा अग्रणी थी शंका से बेचैन होकर मन्त्रिणी को अपना अगुआ बनाकर ललिता के समीप में गमन किया था ।७।
शक्तिचक्रचमूनाथाः सर्वास्ताः पूजिता द्रुतम् । व्यतीतायां विभावर्यां रथेन्द्रं पर्यवारयन् ॥८ अवरुह्य स्वयानाभ्यां मंत्रिणोदण्डनायिके । अधस्तात्सैन्यमावेश्य तदारुरुहतू रथम् ॥६ क्रमेण नव पर्वाणि व्यतीत्य त्वरितक्रमैः । तत्तत्सर्वगतै शक्तिचक्रैः सम्यङ् निवेदितैः ॥१० अभजेतां महाराज्ञीं मंत्रिणिदण्डनायिके । ते व्यजिज्ञपतां देव्या अष्टांगस्पृष्टभूतले ॥११ महाप्रमादः समभूदिति नः श्रुतमंबिके । कूटयुद्धप्रकारेण दैत्यैरपकृतं खलैः ॥१२ स दुरात्मा दुराचारः प्रकाशसमरात्त्रसन् । कुहकव्यवहारेण जयसिद्धिं तु कांक्षति ॥१३ दैवान्नः स्वामिनीगात्रे दुष्टानाममरद्रुहाम् । शरादिकपरामर्शो न जातस्तेन जीवति ॥१४
३५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
शक्तिचक्र की सेना की सब स्वामिनी शीघ्र ही पूजित हुईं और विभावरी रात्रि के व्यतीत होने पर उन्होंने रथेन्द्र को चारों ओर से परिवारित कर लिया था ।८। मन्त्रिणी और दण्ड नायिका दोनों अपने यानों से नीचे उतरी थीं ओर नीचे की ओर सेना को आवेशित करके तब रथ पर समारूढ़ हुई थीं ।६। क्रम से नौ पर्वों को व्यतीत करके शीघ्र क्रमों वे चलीं थीं। उन-उनके सर्वगत शक्ति चक्र जो सम्यक् रीति से निवेदित थे वे युक्त थीं ।१०। मन्त्रिणी ओर दण्ड नायिका दोनों ने महाराज्ञी का सेवन किया था। उन्होंने देवी के आगे भूमि में साष्टाङ्ग प्रणाम किया था और निवेदित किया था ।११। हे अम्बिके ! महान प्रमाद हो गया है ऐसा हमने श्रवण किया है। उन खल दैत्यों ने कूट युद्ध के प्रकार से आपका अपकार किया है ।१२। वह दुष्ट बुरे आचार वाला प्रकाश में युद्ध से डरकर कुहक व्यवहार से जय की सिद्धि चाहता है ।१३। यह तो दैव की गति है कि उन सुरों के द्रोही दुष्टों का हमारी स्वामिनी के शरीर में शर आदि का स्पर्श नहीं हुआ ओर उसी से जीवित विद्यमान हैं ।१४।
एकावलंबनं कृत्वा महाराज्ञि भवत्पदम् । वयं सर्वा हि जीवामः साधयामः समीहितम् ॥१५
अतोऽस्माभिः प्रकर्त्तव्यं श्रीमत्त्यंगस्य रक्षणम् । मायाविनश्च दैत्येन्द्रास्तत्र मन्त्रो विधीयताम् ॥१६
आपत्कालेषु जेतव्या भंडाद्या दानवाधमाः । कूटयुद्धं न कुर्वन्ति न विशंति चमूमिमाम् ॥१७
प्रथमयुद्धदिवसः— तथा महेंद्रशैलस्य कार्यं दक्षिणदेशतः । शिबिरं बहुविस्तारं योजनानां शतावधि ॥१८
वह्निप्राकारवलयं रक्षणार्थं विधीयताम् । अस्मत्सेनानिवेशस्य द्विषां दर्पशमाय च ॥१९
शतयोजनमात्रस्तु मध्यदेशः प्रकल्प्यताम् । वह्निप्राकारचक्रस्य द्वारं दक्षिणतो भवेत् ॥२०
यतो दक्षिणदेशस्थं शून्यकं विद्धिषां पुरम् । द्वारे च बहवः कल्प्याः परिवारा उदायुधाः ॥२१
भंडासुर वध वर्णन ] [ ३५३
हे महाराज्ञि ! हम तो सब एक मात्र आपका ही चरण का अवलम्बन ग्रहण करके जीवित हैं और आपके समीहित का साधन करती हैं। ।१५। इसलिए हमको श्रीमती के अङ्ग की रक्षा करनी चाहिए ।१६। भण्ड आदि महान अधम दानव आपत्ति के समय में ही जीतने के योग्य हैं। ये कूट युद्ध नहीं करते हैं और इस सेना में भी प्रवेश नहीं करते हैं ।१७। उसी भाँति से महेन्द्र पर्वत के दक्षिण भाग में एक बहुत विस्तार वाला जिसकी सीमा सौ योजन की होवे शिविर बनाना चाहिए ।१८। उसकी रक्षा के लिए चारों ओर अग्नि का प्राकार बनाना चाहिए । उसमें हमारी सेना का निवेश होगा और यह द्वेषियों के दर्प का शमन करने के लिए भी होगा ।१९। सौ योजन मात्र इसका मध्य भाग प्रकल्पित किया जावे। वह्नि प्राकार चक्र का द्वार दक्षिण की ओर होना चाहिए ।२०। विद्वेषियों के पुर की स्थिति दक्षिण भाग में है जिसका नाम शून्यक है। उसके द्वार पर आयुध लिए हुए बहुत से परिवार कल्पित रहने चाहिए ।२१।
निर्गच्छतां प्रविशतां जनानामुपरोधकाः ।
अनालस्या अनिद्राश्च विधेयाः सततोद्यताः ॥२२
एवं च सति दुष्टानां कूटयुद्धं चिकीर्षितम् ।
अवेलासु च संध्यासु मध्यरात्रिषु च द्विषाम् ।
अशक्यमेव भवति प्रौढमाक्रमणं हठात् ॥२३
नो चेद्दुराशया दैत्या बहुमायापरिग्रहाः ।
पश्यतोहरवत्सर्वं विलुंठति महद्बलम् ॥२४
मंत्रिण्या दंडनाथाया इति श्रुत्वा वचस्तदा ।
शुचिदन्तरुचा मुक्ता वहन्ती ललिताब्रवीत् ॥२५
भवतीनामयं मन्त्रश्चारुबुद्ध्या विचारितः ।
अयं कुशलधीमार्गो नीतिरेषा सनातना ॥२६
स्वचक्रस्य पुरो रक्षां विधाय दृढसाधनः ।
परचक्राक्रमः कार्यो जिगीषद्भिर्महाजनैः ॥२७
इत्युक्त्वा मन्त्रिणीदंडनाथे सा ललितेश्वरी ।
ज्वालामालिनिकां नित्यामाहूयेदमुवाच ह ॥२८
३५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
जनों के उपरोधक निर्गमन करें और प्रवेश करे। ये सब बिना आलस्य वाले अनिद्र और निरन्तर उद्यत रखने चाहिए ।२२। ऐसा होने पर दुष्टों का अभीष्ट कूट युद्ध नहीं होगा। और शत्रुओं का असमयों में—सन्ध्याओं में और मध्य रात्रियों में हठ से प्रौढ़ आक्रमण नहीं हो सकने के योग्य होता है ।२३। यदि ऐसा नहीं किया जावे तो ये दैत्य बहुत बुरे अभिप्राय वाले तथा बहुत-सी माया के परिग्रह वाले हैं और ये स्वर्णकार के ही समान महान बल का विलुण्ठन कर लिया करते हैं ।२४। उस समय में मन्त्रिणी और दण्डनाथा के इस वचन का श्रवण करके शुद्ध दांतों की कान्ति से मुक्ताओं का वहन करती हुई श्री ललिता देवी ने कहा—।२५। आप सबका यह मन्त्र बहुत ही सुन्दर बुद्धि से विचारा हुआ है। यह कुशल बुद्धि का मार्ग है और यह सनातन नोति है ।२६। जीत की इच्छा वाले महान जनों को चाहिए कि अपने चक्र के आगे रक्षा करके सुदृढ़ साधन वाला होवे, फिर दूसरे शत्रु के चक्र पर आक्रमण करना चाहिए ।२७। उस ललितेश्वरी ने मन्त्रिणी और दण्डनाथा से कहा और ज्वाला मालिनिका को जो नित्या थी बुलाकर यह कहा था ।२८।
वत्से त्वं वह्निरूपासि ज्वालामालामयाकृतिः । त्वया विधीयतां रक्षा बलस्यास्य महीयसः ॥२९॥ शतयोजनविस्तारं परिवृत्य महीतलम् । त्रिंशद्योजनमुन्नद्धं ज्वालाकारत्वमाव्रज ॥३०॥ द्वारयोजनमात्रं तु मुक्त्वान्यत्र ज्वलत्तनुः । वह्निज्यालात्वमापन्ना संरक्ष सकलं बलम् ॥३१॥ ज्वालामालिनिकां नित्यामित्युक्त्वा ललितेश्वरी । महेन्द्रोत्तरभूभागं चलितुं चक्र उद्यमम् ॥३२॥ सा च नित्यानित्यमयी ज्वलज्ज्यालामयाकृतिः । चतुर्दशीतिथिमयी तथेति प्रणनाम ताम् ॥३३॥ तयैव पूर्वनिर्दिष्टं महेन्द्रोत्तरभूतलम् । कुण्डलीकृत्य जज्वल शालरूपेण सा पुनः ॥३४॥ नभोवलयजंबालज्वालामालामयाकृतिः । बभासे दंडनाथाया मंत्रिनाथचमूरपि ॥३५॥
भंडपुत्र वध वर्णन ] [ ३५५
हे वत्से ! आप तो ज्वाला मालाओं से परिपूर्ण आकृति वाली वह्नि-रूपा हैं। इस महान बल की रक्षा आपको ही करनी चाहिए ।२६। इस महीतल को सौ योजन के विस्तार वाला परिवृत करो और तीस योजन ऊँचा बनाओ जो ज्वालाकार वाला हो ।३०। एक योजन मात्र द्वार को छोड़कर अन्यत्र जाज्वल्यमान कलेवर वाला होवे । वह्नि की ज्वाला को प्राप्त होकर सम्पूर्ण सेना को रक्षा करो ।३१। उस ललितेश्वरी ने ज्वाला मालिनिका से इतना ही कहा था और फिर महेन्द्र गिरि के उत्तर की भूमि के भाग में चलने का उद्यम किया था ।३२। और फिर वह नित्यानित्यमयी थी तथा जलती हुई ज्वालाओं से पूर्ण आकृति वाली थी। वह चतुर्दशी तिथि मयी थी। उसने ऐसा ही होगा—यह कहकर ललितादेवी को प्रणाम किया था ।३३। उसी भाँति से पूर्व में निर्दिष्ट महेन्द्र के उत्तर भूतल को कुण्डली कृत बनाकर उसने फिर शाल रूप से ज्वलित कर दिया था ।३४। दण्डनाथा और मन्त्रिणी की चमू भी ऐसी शोभित हुई थी मानो नभोवलय के जम्बाल से ज्वालाओं की माला से पूर्ण आकृति होवे ।३५।
अन्यासामपि शक्तीनां महतीनां महद्बलम् ।
विशंकटोदरं सालं प्रविवेश गतक्लमा ॥३६॥
राजचक्ररथेन्द्रं तु मध्ये संस्थाप्य दंडिनी ।
वामपक्षे रथं स्वीयं दक्षिणे श्यामलारथम् ॥३७॥
पश्चाद्भागे सम्पद्देशीं पुरस्ताच्च ह्मासनाम् ।
एवं संवेश्य परितश्चक्रराजरथस्य च ॥३८॥
द्वारे निवेशयामास विंशत्यक्षौहिणीयुताम् ।
ज्वलद्दंडायुधोद्ग्रां स्तम्भिनीं नाम देवताम् ॥३९॥
या देवी दंडनाथाया विघ्नदेवीति विश्रुता ।
एवं सुरक्षितं कृत्वा शिविरं योत्रिणी तथा ।
पूष्ण्युदितभूयिष्ठे पुनर्युद्धमुपाश्रयत् ॥४०॥
कृत्वा किलकिलारावं ततः शक्तिमहाचमूः ।
अग्निप्राकारद्वारान्निर्जगाम महारवा ॥४१॥
३५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इत्थं सुरक्षितं श्रुत्वा ललिताशिबिरोदरम् ।
भूयः संज्वरमापन्नः प्रचण्डो भंडदानवः ॥४२
अन्य शक्तियों का भी महान बल जो कि शक्तियां बहुत महान थीं गत क्लम होकर विशंकदोदर शाल में प्रविष्ट हुआ था ।३६। दण्डिनी ने राजचक्र रथेन्द्र को मध्य में स्थापित कर दिया था और उसकी बांई ओर अपना रथ रखा था तथा दाहिनी ओर श्यामला का रथ स्थापित किया था ।३७। पीछे के भाग में सम्पद्देशी और आगे ह्यासना को नियुक्त किया था । इस रीति से सब ओर में चक्रराज रथ को संवेशित किया था ।३८। द्वार भाग में स्तम्भिनी नाम वाली देवी को नियोजित किया था जो बीस अक्षौहिणी सेना से समन्वित थी और जलते हुए दण्डायुधों से बहुत ही उदग्र थी ।३६। जो दण्डनाथा की देवी विघ्न देवी—इस नाम से प्रसिद्ध थी उसने इस प्रकार से शिविर को सुरक्षित बना दिया था तथा योत्रिणी-पूषणी और उदित भूयिष्ठा ने फिर युद्ध का उपाश्रय लिया था ।४०। किलकिल की ध्वनि करके वह शक्ति की विशाल सेना अग्नि के प्राकार वाले द्वार बड़ा घोष करती हुई बाहिर निकली थी ।४१। ललिता देवी के शिविर के मध्यभाग को इस प्रकार से सुरक्षित हुआ श्रवण करके वह परम प्रचण्ड भंड दानव पुनः बड़े ही सन्ताप को प्राप्त हो गया था ।४२।
मन्त्रयित्वा पुनस्तत्र कुटिलाक्षपुरोगमैः ।
विषंगेण विशुक्रेणासममात्मसुतैरपि ॥४३
एकौघस्य प्रसारेण युद्धं कर्तुं महाबलः ।
चतुर्बाहुमुखान्पुत्रांश्चतुर्जलधिसन्निभान् ॥४४
चतुरान्युद्धकृत्येषु समाहूय स दानवः ।
प्रेषयामास युद्धाय भण्डश्चण्डक्रुधा ज्वलन् ॥४५
त्रिंशत्संख्याश्च तत्पुत्रा महाकाया महाबलाः ।
तेषां नामानि वक्ष्यामि समाकर्णय कुम्भज ॥४६
चतुर्बाहुश्चकोराक्षस्तृतीयस्तु चतुःशिरा ।
वज्रघोषश्चोर्ध्वकेशो महाकायो महाहनुः ॥४७
मखशत्रुर्मखस्कन्दी सिंहघोषः सिरालकः ।
लङ्गुनः पट्टसेनश्च पुराजित्पूर्वमारकः ॥४८
भंड पुत्र वध वर्णन ] [ ३५७
स्वर्गशत्रुः स्वर्गबलो दुर्गारव्यः स्वर्गकण्टकः । अतिमाया बृहन्माय उपमावञ्च वीर्यवान् ॥४९॥
फिर उसने वहाँ पर कुटिलाक्ष जिनमें प्रमुख था उन सबके साथ मन्त्रणा करके तथा विषङ्ग-विशुक्र और अपने पुत्रों के साथ भी मंत्रणा की थी ॥४३। उस महान बलवान ने एक हो साथ सामूहिक प्रसार से युद्ध करने के लिए निश्चय किया था और चार समुद्रों के तुल्य जो चतुर्बाहु प्रमुख चार पुत्र थे उनको नियुक्त किया था ॥४४। उस दानव ने चारों को बुलाया था और युद्ध के कृत्यों में नियुक्त किया था । भंडासुर बड़े ही प्रचण्ड क्रोध से जलता हुआ होकर उसने हमको युद्ध के लिए भेज दिया था ॥४५। उसके पुत्र संख्या में तीस थे । इनके विशाल शरीर थे और इनमें महान बल विद्यमान था । हे कुम्भज ! उनके सबके नाम भी मैं बतलाऊँगा आप सुनिए ॥४६। चतुर्बाहु-चकोराक्ष-चतुःशिरा--वज्रघोष-ऊर्ध्वकेश-महाकाय-महाहनु-मखशत्रु-मखस्कन्दी-सिंहघोष-शिरालक-लडुन-पट्टसेन-पुराजित-पूर्वमारक-स्वर्ग-शत्रु-स्वर्गवल--दुर्गारव्य-स्वर्ग-कण्टक-अतिमाय-बृहन्माय-उपमाय-वीर्यवान् ॥४७-४६॥
इत्येते दुर्मदाः पुत्रा भण्डदैत्यस्य दुर्द्धियः । पितुः सदृशदोर्वीर्याः पितुः सदृशविग्रहाः ॥५० आगत्य भण्डचरणावभ्यवंदत भक्तितः । तानुद्वीक्ष्य प्रसन्नाभ्यां लोचनाभ्यां स दानवः । सगौरवमिदं वाक्यं बभाषे कुलघातकः ॥५१ भो भो मदीयास्तनया भवतां कः समो भुवि । भवतामेव सत्येन जितं विश्वं मया पुरा ॥५२ शक्रस्याग्नेर्यमस्यापि निर्ऋतेः पाशिनस्तथा । कचेषु कर्षणं कोपात्कृतं युष्माभिराहवे ॥५३ अस्त्राण्यपि च शस्त्राणि जानीथ निखिलान्यपि । जाग्रत्स्वेव हि युष्मासु कुलभ्रंशोऽयमागतः ॥५४ मायाविनी दुर्ललिता काचित्स्त्री युद्धदुर्मदा । बहुभिः स्वसमानाभिः स्त्रीभिर्युक्ता हिनस्ति नः ॥५५
३५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तदेनां समरेऽवश्यमात्मवश्यां विधास्यथ ।
जीवग्राहं च सा ग्राह्या भवद्भिर्ज्वलदायुधैः ॥५६
ये इतने भंडासुर के दुष्ट बुद्धि वाले और दुर्मंद पुत्र थे । ये सभी अपने पिता के ही समान तो बाहुबल वाले थे और पिता के तुल्य ही इनका कलेवर था ।५०। उन सबने भक्ति की भावना से भण्डासुर के चरणों में प्रणाम किया था । उस दानव ने प्रसन्न लोचनों से उनको देखा था और बड़े गौरव के साथ उनसे यह वाक्य बोला था और यह अपने समस्त कुल का घातक था ।५१। हे मेरे पुत्रो ! इस भूमण्डल में आपके समान कोई भी नहीं हैं। आप लोगों के ही बल-विक्रम से मैंने पहिले यह समस्त विश्व को जीत लिया था ।५२। तुम सबने युद्धस्थल में कोप से इन्द्र का—अग्नि का—यम का—निर्ऋति का और पाशी के कवचों का कर्षंण किया था ।५३। आप लोग सब अस्त्रों को भी जानते हैं। अब आप सबके जाग्रत रहते हुए भी यह हमारे कुल का भ्रंश आ गया है ।५४। कोई दुष्टा—मायाविनी और युद्ध करने में दुर्मंदा है जो कि अपने ही सदृश स्त्रियों से संयुत होकर हमको मार रही है ।५५। सो अब इसको युद्ध में अपने वश में अवश्य ही तुम कर लोगे । आप सब जलते हुए आयुधों को लेकर उसको जीवित ही पकड़ लेना ।५६।
अप्रमेयप्रकोपांधान्युष्मानेकां स्त्रियं प्रति ।
सम्प्रेषणमनौचित्यं तथाप्येष विधेः क्रमः ॥५७
इममेकं सहध्वं च शौर्यकीर्तिविपर्ययम् ।
इत्युक्त्वा भण्डदैत्येन्द्रस्तान्प्रहैषीद्रणं प्रति ।
द्विशतं चाक्षौहिणीनां तत्सहायतयाऽहिनोत् ॥५८
द्विशत्यक्षौहिणीसेना मुख्यस्य तिलकायिता ।
बद्धभ्रुकुटयः शस्त्रपाणयो निर्ययुर्गृहात् ॥५९
निर्गमे भण्डपुत्राणां भू प्रकम्पमलम्बत ।
उत्पाता विविधा जाता वित्रस्तं चाभवज्जगत् ॥६०
तान्कुमारान्महासत्त्वांल्लाजवर्षैरवाकिरन् ।
वीथीषु यानैश्चलितान्पौरवृद्धपुरंध्रयः ॥६१
भंड पुत्र वध वर्णन ] [ ३५६
वंदिनो मागधाश्चैव कुमाराणां स्तुतिं व्यधुः । मंगलारार्तिकं चक्रुर्द्वारे द्वारे पुरांगनाः ॥६२ भिद्यमानेव वसुधा कृष्यमाणमिवांबरम् । आसीत्तेषां विनिर्याणे घूर्णमान इवार्णवः ॥६३
आप सबका प्रकोप तो अप्रमेय है । आप सब ऐसे वीरों को केवल एक नारी की ओर भेजना उचित नहीं है तथापि यह विधाता का ही ऐसा क्रम है ।५७। यह एक आपकी कीर्त्ति का बड़ा भारी विपर्यय है उसको आप लोग सहन कर लीजिए क्योंकि आपकी बहुत बड़ी शूरता है और एक साधारण नारी पर आक्रमण करना है । यह कह कर उस भण्डासुर ने उन सबको युद्ध में भेजा था । तथा उनकी सहायता के लिए दो सौ अक्षौहिणी सेनाएं भी भेज दी थीं ।५८। वह दो सौ अक्षौहिणी सेना भी सबमें शिरोमणि थी । वे सभी सैनिक क्रोध से अपनी भृकुटियों को ताने हुए थे और हाथों में हथियार लेकर वहाँ से निकले थे ।५६। जब भण्ड के पुत्रों ने निर्गमन किया था उस समय भूमण्डल काँप उठा था । अनेक उत्पात उत्पन्न हुए थे और सम्पूर्ण जगत् भयभीत हो गया था ।६०। उस पुर की प्रौढ़ स्त्रियों ने वीथियों में यानों के द्वारा चलते हुए महान् उलवान उन कुमारों के ऊपर लाजाओं की वर्षा की थी ।६१। बन्दीगण और मागधों ने उन कुमारों का स्तवन किया था और पुरकी अंगनाओं ने द्वारों पर उनकी मंगल कामना से आरती की थी ।६२। उस समय में यह भूमि विद्यमान सी हो रही थी और आकाश आकृष्यमाण-सा हो रहा था । उनके निकलने के समय सागर घूर्णमान सा हो गया था ।६३।
द्विशत्यक्षौहिणीसेनां गृहीत्वा भण्डसूनवः । क्रोधोद्यद्भ्रुकुटीक्रूरवदना निर्ययुः पुरात् ॥६४ शक्तिसैन्यानि सर्वाणि भक्षयामः क्षणाद्रणे । तेषामायुधचक्राणि चूर्णयामः शितैः शरैः ॥६५ अग्निप्रकारावलयं शमयामश्च रंहसा । दुर्विदग्धां तां ललितां वन्दीकुर्मश्च सत्वरम् ॥६६ इत्यन्योन्यं प्रबलगन्तो वीरभाषणघोषणैः । आसेदुरग्निप्राकारसमीपं भण्डसूनवः ॥६७
३६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
यौवनेन मदेनान्धा भूयसा रुद्धदृष्टयः । भ्रुकुटीकुटिलाश्चक्रुः सिंहनादं महत्तरम् ॥६८॥ विदीर्णमिव तेनासीद्ब्रह्मांडं चंडिमस्पृशा । उत्पातवारिदोत्सृष्टघोरनिर्घातरंहसा ॥६९॥ एतस्यानुभूतस्य महाशब्दस्य डम्बरः । क्षोभयामास शक्तीनां श्रवांसि च मनांसि च ॥७०॥
दो सौ अक्षौहिणी सेना को साथ में लेकर उस भण्ड के पुत्र नगर से भृकुटियां तानकर क्रूर मुखों वाले होते हुए ही निकल कर चल दिये थे ।६४। वे यही कहते हुए चल रहे थे कि हम समस्त शक्तियों की सेनाओं को खा जायेंगे और रण में एक ही क्षण में अपने तीक्ष्ण बाणों से उनके सभी आयुधों का चूर्ण कर देंगे ।६५। उस अग्नि की चहार दीवारी के वलय को भी वेग से शान्त कर देंगे। उस दुर्विदग्धा ललिता को शीघ्र बन्दी बना डालेंगे ।६६। वे भण्डासुर के पुत्र परस्पर में वीर भाषणों के उद्घोषों से बातचीत करते हुए उस अग्नि के प्राकार के समीप में प्राप्त हो गये थे ।६७। यौवन से और बड़े बढ़े हुए मद से अन्धे हो रहे थे और उनकी दृष्टि रुद्ध हो गयी थी । उन्होंने अपनी भौहों को तिरछी करके बड़ा भारी सिंहनाद किया था ।६८। प्रचण्ड स्पर्श वाले उस सैन्य समुदाय से यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विदीर्ण-सा हो गया था । वह सैन्य समुदाय उत्पातजनक मेघों से उत्कृष्ट घोर निर्घात के वेग वाला था ।६६। इस अनुभूत महान् घोष का डम्बर ऐसा था कि उसने शक्तियों के कानों को और मनों को क्षुब्ध कर दिया था ।७०।
आगत्य ते कलकलं चक्रुः सार्धं स्वसैनिकैः । विविधायुधसम्पातमूच्छर्द्धैमानिकच्छटम् ॥७१॥ चतुर्बाहुमुखान्भूत्वा भण्डदैत्यकुमारकान् । आगतान्युद्धकृत्याय बाला कौतूहलं दधे ॥७२॥ कुमारी ललितादेव्यास्तस्या निकटवासिनी । समस्तशक्तिचक्राणां पूज्या विक्रमशालिनी ॥७३॥ ललितासदृशाकारा कुमारी कौपमादधे । या सदा नववर्षैव सर्वविद्यामहाखनिः ॥७४॥
भंड पुत्र वध वर्णन ] [ ३६१
बालारुणतनुः श्रोणी शोणवर्णवपुर्लता । महाराज्ञी पादपीठे नित्यमाहितसंनिधिः ॥७५॥ तस्या बहिश्चराः प्राणा या चतुर्थं विलोचनम् । तानागतानभाण्डसुतान्संहारिष्यामि सत्वरम् ॥७६॥ इति निश्चित्य बालांबा महाराज्यै व्यजिज्ञपत् । मातर्भंडमहादैत्यसूनवो योद्धुमागताः ॥७७॥
अनेक प्रकार के आयुधों के गिराने से विमानों की छटा को मूर्च्छित करते हुए उन्होंने वहाँ आकर अपने सैनिकों के साथ कलकल ध्वनि कर दी थी ॥७१॥ चतुर्बाहु जिनमें प्रमुख था ऐसे उन भण्डासुर के कुमारों को आये हुए जानकर जो कि युद्ध के ही लिए समागत हुए थे बाला ने अपने मन में कौतूहल किया था ॥७२॥ उस ललिता देवी के निकट में वास करने वाली कुमारी समस्त शक्तियों के चक्रों की पूज्य और विक्रम वाली थी ॥७३॥ कुमारी ललिता के ही तुल्य आकार वाली थी। उसने कोप किया था जो सदा नूतन वर्षा के ही समान समस्त विद्याओं की बड़ी खान थी ॥७४॥ उसकी श्रोणी बालसूर्य के तुल्य लाल वर्ण की थी तथा उसका शरीर भी शोण (रक्त) था। वह महाराज्ञी के पाद पीठ पर ही नित्य सन्निधान करने वाली थी ॥७५॥ उसके बाहिर संचरण करने वाले प्राण जो चौथा नेत्र ही था। उसने कहा था उन समागत भंड के पुत्रों को मैं शीघ्र मार डालूँगी ॥७६॥ उस बालाम्बा ने यह निश्चय करके महारानी से कहा था—हे माता ! भंडासुर के पुत्र युद्ध करने को आ गये हैं ॥७७॥
तैः समं योद्धुमिच्छामि कुमारित्वात्सकौतुका । स्फुरन्ताविव मे बाहू युद्धकण्डूयनयानया ॥७८॥ क्रीडा ममैषा हन्तव्या न भवत्या निवारणैः । अहं हि बालिका नित्यं क्रीडनेष्वनुरागिणी ॥७९॥ क्षणं रणक्रीडया च प्रीति यास्यामि चेतसा । इति विज्ञापिता देवी प्रत्युवाच कुमारिकाम् ॥८०॥ वत्से त्वमतिसृद्वंगी नववर्षा नवक्रमा । नवीनयुद्धशिक्षा च कुमारी त्वं ममैकिका ॥८१॥
३६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
त्वां विना क्षणमात्रं मे न निश्वासः प्रवर्तते । ममोच्छ्वसितमेवासि न त्वं याहि महाहवम् ॥८२ दण्डिनी मन्त्रिणी चैव शक्तयोऽन्याश्च कोटिशः । संत्येव समरे कर्तुं वत्से त्वं किं प्रमाद्यसि ॥८३ इति श्रीललितादेव्या निरुद्धापि कुमारिका । कौमारकौतुकाविष्टा पुनर्युद्धमयाचत ॥८४
मैं कुमारी होने से बड़े कौतुक के साथ उनके साथ युद्ध करना चाहती हूँ । इस युद्ध करने की खुजली से मेरी बाहुएं फड़क रही हैं ।७८। आप मुझे इसके लिए निवारित न करें क्योंकि इस निषेध करने से तो मेरी यह क्रीड़ा का हनन ही हो जायगा । मैं तो छोटी बच्ची हूँ सर्वदा ही क्रीड़ाओं में मेरा अनुराग रहा करता है ।७९। क्षणभर रण करने की क्रीड़ा से मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी और चित्त में आनन्द होगा । जब इस तरह से देवी से कहा गया था तो ललिता देवी ने उस कुमारिका से कहा था ।८०। हे वत्से ! तुम तो बहुत ही कोमल अङ्ग वाली हो-नौ ही वर्ष की हो और नूतन क्रम वाली हो और तुमको नये युद्ध की ही शिक्षा मिली है ऐसी कुमारी तुम मेरी एक ही सैनिका हो ।८१। तुम्हारे बिना मुझे एक क्षण भी निश्वास नहीं होता है । तुम तो मेरे श्वास ही हो अतः तुम इस महान् संग्राम में मत जाओ ।८२। दण्डिनी और मन्त्रिणी ऐसी अन्य करोड़ों ही शक्तियाँ हैं, हे वत्से ! जो इस संग्राम में उपस्थित ही रहती हैं । तुम ऐसा प्रमाद क्यों कर रही हो ? ।८३। इस रीति से ललिता देवी के द्वारा उस कुमारी को रोका भी गया था तो भी कुमारावस्था के कौतुक से समाविष्ट होकर पुनः युद्ध करने की प्रार्थना उसने की थी ।८४।
सुदृढं निश्चयं दृष्ट्वा तस्याः श्रीललितांबिका । अनुज्ञां कृतवत्येव गाढमाश्लिष्य बाहुभिः ॥८५
स्वकीयकवचादेकमाच्छिद्य कवचं ददौ । स्वायुधेभ्यश्चायुधानि वितीर्य विससर्ज ताम् ॥८६
कर्णीरथं महाराज्या चापदण्डात्समुद्धृतम् । हंसयुग्मशतैर्युक्तमारुरोह कुमारिका ॥८७
भंड पुत्र वध वर्णन ] [ ३६३
तस्यां रणे प्रवृत्तायां सर्वपर्वस्थदेवताः । बद्धांजलिपुटा नेमुः प्रधृतासिपरम्पराः ॥८८॥ ताभिः प्रणम्यमाना सा चक्रराजरथोत्तमात् । अवरुह्य तले सैन्यं वर्तमानमगाहत ॥८९॥ तामायांतीमथो दृष्ट्वा कुमारीं कोपपाटलाम् । मंत्रिणीदण्डनाथे च सभये वाचमूचतुः ॥६०॥ किं भर्तृदारिके युद्धे व्यवसायः कृतस्त्वया । अकांडे किं महाराज्ञा प्रेषितासि रणं प्रति ॥६१॥
श्री ललिता अम्बा से उस कुमारी का परम दृढ़ निश्चय समझकर अपनी बाहुओं से खूब अच्छी तरह समालिङ्गन करके उसको युद्ध करने की आज्ञा दी थी ।८५। ललिता देवी ने अपने कवच से एक कवच निकाल कर उसको दिया था और अपने आयुधों से आयुध देकर उसको विदा किया था ।८६। चाप और दंड से समुद्धृत महाराज्ञी का कर्णी रथ था जो सैकड़ों हंसों से युक्त था उस पर कुमारिका ने समारोहण किया था ।८७। उसके रण में प्रवृत्त हो जाने पर सभी पर्वों पर स्थित देवता हाथों को जोड़े हुए असियों को प्रधृत करके प्रणाम करने लगे थे ।८८। उनके द्वारा प्रणाम किये जाने पर वह देवी चक्रराज रथोत्तम से नीचे उतर गयी और वहाँ पर जो सेना थी उसका अवगाहन किया था ।८९। इसके अनन्तर उस कुमारी को कोप से पाटल और आती हुई देखा तो मन्त्रिणी और दंडनाथा ने भययुक्त होकर यह वचन कहे थे ।६०। हे भर्तृदारिके ! क्या आपने युद्ध में व्यवसाय किया है ? महाराज्ञी ने अकाण्ड में यह क्या रण की ओर आपको भेज दिया है ? ।६१।
तदेतदुचितं नैव वर्तमानेऽपि सैनिके । त्वं मूर्तं जीवितमसि श्रीदेव्या बालिके यतः ॥६२॥ निवर्तस्व रणोत्साहात्प्रणामस्ते विधीयते । इति ताभ्यां प्रार्थितापि प्राचलद्दृढनिश्चया ॥६३॥ अत्यन्तं विस्मयाविष्टे मंत्रिणोदण्डनायिके । सहैव तस्या रक्षार्थं चेलतुः पार्श्वयोर्द्वयोः ॥६४॥
३६४ । [ ब्रह्माण्ड पुराण
अथाग्निवरणद्वारा ताभ्यामनुगता सती । प्रभूतसेनायुक्ताभ्यां निर्जगाम कुमारिका ॥६५॥ सनाथशक्तिसेनानां सर्वासामनुगृह्णती । प्रणामांजलिजालानि कर्णीरथकृतासना ॥६६॥ भंडस्य तनयान्दुष्टानभ्यद्रवदरिंदमा । तस्याः प्रादेशिकं सैन्यं कुमार्या न हि विद्यते ॥६७॥ सर्वं हि ललितासैन्यं तत्सैन्यं समजायत । ततः प्रवृत्ते युद्धमत्युद्धतपराक्रमम् ॥६८॥
'हे बालिके ! क्योंकि आप तो श्री देवी के मूर्त्तिमान् जीवन ही हैं अतएव यह उचित नहीं है जबकि सेनाएं विद्यमान हैं ।६२। आप तो इस समय इस रण करने के उत्साह को त्याग कर लौट जाइए । आपको हमारे प्रणाम किये जाते हैं । इस तरह से उन दोनों के द्वारा प्रार्थना भी की गयी थी तो भी दृढ़ निश्चय वाली वहां चल दी थी ।६३। मन्त्रिणी और दण्डनायिका दोनों अत्यधिक विस्मय से समाविष्ट हो गईं थीं और उसके दोनों ओर उसी की रक्षा करने के लिए चल दी थीं ।६४। इसके अनन्तर अग्नि के वरण के द्वारा उन दोनों से अनुगता होती हुई जो बहुत सेना से युक्त थीं कुमारिका वह वहां से निर्गत हुई थी ।६५। कर्णीरथ पर विराजमान स्वामी के सहित समस्त शक्तियों की सेनाओं पर अनुग्रह करती हुई वह रवाना हुई थी । उसको मार्ग में सभी प्रणामाञ्जलियां कर रहे थे ।६६। शत्रुओं का दमन करने वाली ने भंडासुर के पुत्रों पर आक्रमण कर दिया था । उस कुमारी की प्रादेशिक सेना नहीं थी ।६७। समस्त ललिता की ही सेना हो उसकी सेना हो गयी थी । इसके अनन्तर अतीव उद्धत पराक्रम से संयुत महान् युद्ध प्रवृत्त हो गया था ।६८।
ववर्ष शरजालानि दैत्येन्द्रेषु कुमारिका । भण्डासुरकुमारैस्तैर्महाराज्ञो कुमारिका । यद्युद्धमतनोत्तत्तु स्पृहणीयं सुरासुरैः ॥६६॥ अत्यन्तविस्मिता दैत्यकुमारा नववर्षिणीम् । कर्णीरथस्थामलोक्य किरन्तीं शरमंडलम् ॥१००॥
भंडपुत्र वध वर्णन ] [ ३६५
क्षणे क्षणे बालिकया क्रियमाणं महार णम् । व्यजिज्ञपन्महाराज्ञयै भ्रमन्त्यः परिचारिकाः ॥१०१॥ मंत्रिणीदण्डनाथे च न तां विजहतू रणे । प्रेक्षकत्वमनुप्राप्ते तूष्णीमेव बभूवतुः ॥१०२॥ सर्वेषां दैत्यपुत्राणामेकरूपा कुमारिका । प्रत्येकभिन्ना ददृशे विम्बमालेव भास्वतः ॥१०३॥ सायकैरग्निचूडालैस्तेषां मर्माणि भिदती । रक्तोत्पलामिव क्रोधसंरक्तं बिभ्रती मुखम् ॥१०४॥ आश्चर्यं ब्रुवतो व्योम्नि पश्यतां त्रिदिवौकसाम् । साधुवादैर्बहुविधैर्मन्त्रिणीदण्डनाथयोः ॥१०५॥
उस कुमारिका ने अपने बाणों के जालों की उन दैत्येन्द्रों पर वर्षा की थी । उन भंडासुर के पुत्रों के साथ उस महाराज्ञी की कुमारिका का जो युद्ध उस समय में हुआ था वह सभी सुरों और असुरों के द्वारा स्पृहा करने के ही योग्य था ।६६। कर्णीरथ पर स्थित हुई बाणों के मण्डल की वर्षा करने वाली उस नौ वर्ष की कुमारिका को देखकर दैत्यराज के पुत्र अत्यन्त अधिक विस्मित हो गये थे ।१००। प्रतिक्षण उस बालिका के द्वारा किये जाने वाले युद्ध का समाचार परिचारिकाएं भ्रमण करती हुई महाराज्ञी को बता रही थी ।१०१। मन्त्रिणी और दण्डनाथाओं ने उस कुमारिका को कभी भी युद्ध में साथ नहीं छोड़ा था। ये दोनों प्रेक्षक थीं और चुप ही हो गयी थीं ।१०२। सूर्य देव की विम्बमाला के ही तुल्य वह एक ही स्वरूप वाली कुमारी समस्त दैत्य के पुत्रों को प्रत्येक को भिन्न दिखाई दे रही थी ।१०३। अग्नि चूडाल बाणों से उनके कर्मों का भेदन करती हुई युद्ध कर रही थी और उसका मुख क्रोध से लाल रक्त कमल के ही समान शोभित हो रहा था ।१०४। नभ में देवगण देखते हुए बड़ा ही आश्चर्य प्रकट कर रहे थे । तथा मन्त्रिणी और दण्डनाथा के अनेक प्रकार के साधु वाद भी कहे जा रहे थे ।१०५।
अर्च्यमाना रणं चक्रे लघुहस्ता कुमारिका । द्वितीयं युद्धदिवसं समस्तमपि सा रणे ॥१०६॥
[ ३६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
प्रकाशयामास बलं ललितादुहिता निजम् । अस्त्रप्रत्यस्त्रमोक्षेण तान्सर्वानपि भिन्दती ॥१०७ नारायणास्त्रमोक्षेण महाराज्ञीकुमारिका । द्विशत्यक्षौहिणीसैन्यं भस्मसादकरोत्क्षणात् ॥१०८ अक्षौहिणीनां क्षयतः क्षणात्कोपमुपागताः । आकृष्टगुरुधन्वानस्तेऽपतन्नेकहेलया ॥१०६ ततः कलकले जाते शक्तीनां च दिवौकसाम् । युगपत्तिंशतो बाणानसृजत्सा कुमारिका ॥११० हस्तलाघवमाश्रित्य मुक्तैश्चन्द्रार्धसायकैः । त्रिंशता त्रिंशतो भण्डपुत्राणामाहतं शिरः ॥१११ इति भंडस्य पुत्रेषु प्राप्तेषु यमसादनम् । अत्यन्तविस्मयाविष्टा ववृषुः पुष्पमम्बराः ॥११२
लघु हाथों वाली वह कुमारिका पूज्यमान होती हुई युद्ध कर रही थी । उसने युद्ध में दूसरा पूर्ण दिवस भी समाप्त किया था और उस ललिता देवी की पुत्री ने अपने बल को प्रकाशित किया था। वह उन सबको अपने अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों से भेदन कर रही थी ।१०६-१०७। उस महाराज्ञी की कुमारिका ने नारायणास्त्र को छोड़कर दो सौ अक्षौहिणी सेनाओं को एक ही क्षण में भस्मसात् कर दिया था ।१०८। उन अक्षौहिणी सेनाओं के विनाश होने से एक ही क्षण में क्रोध को प्राप्त हुए वे दैत्यराज के पुत्रों ने अपने-अपने धनुषों को खींचा था और वे सब एक ही साथ गिर गये थे ।१०६। फिर शक्तियों का और देवगणों का कलकल उत्पन्न हो जाने पर उस कुमारिका ने एक ही साथ तीस बाण छोड़े थे ।११०। हाथ की कुशलता का आश्रय लेकर छोड़े हुए अर्ध चन्द्र बाणों से जो संख्या में तीस थे उन तीसों भण्डासुर के पुत्रों का उसने शरीर काट डाला था ।१११। इस तरह से भंड के समस्त पुत्रों के मर जाने पर अत्यधिक विस्मय से युक्त होकर देवों ने आकाश में स्थित होकर पुष्पों की वर्षा की थी ।११२।
सा च पुत्री महाराज्ञाः विध्वस्तासुरसैनिका । मन्त्रिणीदण्डनाथाभ्यामालिग्यत भृशं मुदा ॥११३
भण्डपुत्र वध वर्णन | ३६७
तस्याः पराक्रमोन्मेषैर्नृत्यन्त्यो जयदायिभिः । शक्तयस्तुमुलं चक्रुः साधुवादैर्जगत्त्रयम् ॥११४॥ सर्वाश्च शक्तिसेनान्यो दण्डनाथापुरःसराः । तदाश्चर्यं महाराज्ञ्यै निवेदयितुमुद्गताः ॥११५॥ ताभिर्निवेद्यमानानि सा देवी ललितांबिका । पुत्रीभुजावदानानि श्रुत्वा प्रीतिं समाययौ ॥११६॥ समस्तमपि तच्चक्रं शक्तीनां तत्पराक्रमैः । अदृष्टपूर्वैर्देवेषु विस्मयस्य वशं गतम् ॥११७॥
और उस महाराज्ञी की पुत्री ने भंडासुर के सब पुत्रों को विध्वस्त कर दिया था और फिर मन्त्रिणी और दण्डनाथा के द्वारा बार-बार आलिंगन की गयी थी तथा इन दोनों को बड़ी ही प्रसन्नता हुई थी ।११३। उस कुमारिका के जो विजय देने वाले पराक्रमों के उन्मेषों से नृत्य करती हुई शक्तियों के साधुवादों के तुमुल घोष से तीनों लोकों को भर दिया था ।११४। समस्त शक्तियों के सेनानियों ने जिनमें दण्डनाथा भी थी उस महान आश्चर्य जनक युद्ध की विजय को महाराज्ञी को निवेदन करने के लिए तैयारी की थी ।११५। ललिता देवी ने अपनी पुत्री की भुजाओं के अवदानों को जो उन शक्तियों के द्वारा सुनाये गये थे श्रवण करके बहुत ही अधिक प्रसन्नता प्राप्त की थी ।११६। वह समस्त चक्र शक्तियों के अदृष्ट पूर्व पराक्रमों से देवों के भी विस्मय करने वाला हो गया था ।११७।
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॥ गणनाथ पराक्रम वर्णन ॥
अथ नष्टेषु पुत्रेषु शोकानलपरिप्लुतः । विललाप स दैत्येन्द्रो मत्वा जातं कुलक्षयम् ॥१॥ हा पुत्रा हा गुणोदारा हा मदेकपरायणाः । हा मन्नेत्रसुधापूरा हा मत्कुलविवर्धनाः ॥२॥ हा समस्तसुरश्रेष्ठमदभंजनतत्पराः । हा समस्तसुरस्त्रीणामंतर्मोहनमन्मथाः ॥३॥
३६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दिशत प्रीतिवाचं मे ममांके वल्गताधुना ।
किमिदानीमिमं तातमवमुच्य सुखं गताः ॥४॥
युष्मान्विना न शोभन्ते मम राज्यानि पुत्रकाः ।
रिक्तानि मम गेहानि रिक्ता राजसभापि मे ॥५॥
कथमेवं विनिःशेषं हता यूयं दुराशयाः ।
अप्रधृष्यभुजासत्त्वान्भवतो मत्कुलांकुरान् ।
कथमेकपदे दुष्टा वनिता संगरेऽवधीत् ॥६॥
मम नष्टानि सौख्यानि मम नष्टाः कुलस्त्रियः ।
इतः परं कुले क्षीणे साहसानि सुखानि च ॥७॥
इसके अनन्तर अपने समस्त पुत्रों के विनष्ट हो जाने पर महान शोक से परिप्लुत होकर भण्डासुर विलाप करने लगा था और उसने यह मान लिया था कि अब मेरे कुल का नाश हो गया है ।१। वह इस रीति से क्रन्दन करने लगा था—हा ! मेरे पुत्रो ! तुम सब तो बहुत ही उदार गुणों वाले थे—तुम सभी मेरी आज्ञा में तत्पर रहे थे—हा ! आप तो मेरे नेत्रों को सुधा के सूर के ही समान थे और मेरे कुल को बढ़ाने वाले थे ।२। हा ! आप लोग तो सभी देवों के मद का भंजन करने वाले थे—हा ! आप लोग देवाङ्गनाओं के हृदयों को मोहित करने में कामदेव के ही तुल्य थे ।३। मुझे अपनी प्रीति युक्त वाणी सुनाओ—अब मेरी गोद में आकर बैठो—इस समय यह घटना हो गयी है कि आप लोग अपने पिता का त्याग करके सुखी हो गये हो ।४। हे पुत्रो ! आप सबके बिना यह मेरे राज्य शोभित नहीं हो रहे हैं । मेरे घर सब अब सूने हैं और मेरी राज्य सभा भी सूनी हो गयी है । यह क्या हुआ और आप सभी कैसे दुराशयों वाले एक ही साथ निहत हो गये हैं । जिनकी भुजाओं का बल कोई भी दबा नहीं सकता था ऐसे जो मेरे कुल के अंकुर आप सब थे उन सबको एक ही बार में उस दुष्टा नारी ने युद्ध में कैसे मार डाला था ।५-६। मेरी सब सेनाएँ नष्ट हो गयीं और मेरी कुल स्त्रियां भी विनष्ट हो गयी हैं । इससे आगे कुल के क्षीण हो जाने पर सब साहस और सुख भी विनष्ट हो गये हैं ।७।
भवतः सुकृतैर्लब्ध्वा मम पूर्वजनुः कृतैः ।
नाशोऽयं भवतामद्य जातो नष्टस्ततोऽस्म्यहम् ॥८
गणनाथ पराक्रम वर्णन ] [ ३६६
हा हतोऽस्मि विपन्नोऽस्मि मन्दभाग्योऽस्मि पुत्रकाः । इति शोकार्तस पर्यस्यन्प्रलपन्मुक्तमूर्धजः । मूर्च्छंया लुप्तहृदयो निष्पपात नृपासनात् ॥६ विशुक्रश्च विषंगश्च कुटिलाक्षश्च संसदि । भंडमाश्वासयामासुर्दैवस्य कुटिलक्रमैः ॥१० विशुक्र उवाच- देव किं प्राकृत इव प्राप्तः शोकस्य वश्यताम् । लपसि त्वं प्रति सुतान्प्राप्तमृत्यून्महाहवे ॥११ धर्मवान्विहितः पंथा वीराणामेष शाश्वतः । अशोच्यमाहवे मृत्युं प्राप्नुवंति यदर्हितम् ॥१२ एतदेव विनाशाय शल्यवद्बाधते मनः । यत्स्त्री समागत्य हठान्निहंति सुभटान्रणे ॥१३ इत्युक्ते तेन दैत्येन पुत्रशोको व्यमुच्यत । भंडेन चंडकालाग्निसदृशः क्रोध आदधे ॥१४
आप लोगों के जन्म मैंने पूर्व पुण्यों के द्वारा ही प्राप्त किये थे आज आप सबका विनाश हो गया है अब तो मैं भी विनष्ट ही हो गया हूँ ।८। हे पुत्रो ! हा ! अब तो मैं मर ही गया हूँ-विपत्ति ग्रस्त हो गया हूँ ओर खोटी तकदीर वाला हो गया हूँ । इस तरह से वह शोक से ग्रस्त हो गया था और माथे के बालों को खोलकर प्रलाप कर रहा था। उसको मूर्च्छा हो गयी थी ओर उसकी हृदयगति लुप्त हो गयी थी-वह फिर नृपासन से नीचे गिर पड़ाथा ।६। फिर विशुक्र-विषङ्ग ओर कुटिलकर्मों ने उस संसद में भाग्य के कुटिलाओं को कहते हुए भण्डासुर को आश्वासन दिया था ।१०। विशुक्र ने कहा-हे स्वामिन् ! आप सामान्य मानव के ही समान शोक के वश में क्यों प्राप्त हो गये हैं। महान संग्राम में मरे हुए पुत्रों की ओर क्या बात कर रहे हैं ।११। वीरों का तो यह युद्ध करते हुए मर जाना धार्मिक मार्ग ही है और यह निरन्तर होने वाला है । जो युद्ध में मृत्यु को प्राप्त होते हैं वह तो उनकी मृत्यु शोच करने के योग्य नहीं हुआ करती है प्रत्युत पूजित ही हुआ करती है ।१२। केवल यही बात शल्य के समान मन को
३७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पीड़ा दे रही है कि स्त्री ने आकर युद्ध में बड़े-बड़े योद्धाओं का हनन किया है ।१३। उस दैत्य के द्वारा ऐसा कहने पर भण्ड ने पुत्रों के शोक का त्याग कर दिया था और फिर भण्ड ने प्रचण्ड कालाग्नि के समान क्रोध किया था ।१४।
स कोशात्क्षिप्रमुद्धृत्य खड्गमुग्रं यमोपमम् । विस्फारिताक्षियुगलो भृशं जज्वाल तेजसा ॥ १५ ॥ इदानीमेव तां दुष्टां खड्गेनानेन खण्डशः । शकलीकृत्य समरे श्रमं प्राप्स्यामि बंधुभिः ॥ १६ ॥ इति रोषस्खलद्वर्णः श्वसन्निव भुजंगमः । खड्गं विधुन्वन्नुत्थायः प्रचचालातिमत्तवत् ॥ १७ ॥ तं निरुध्य च संभ्रान्ताः सर्वे दानवपुङ्गवाः । वाचमूचुरतिक्रोधाज्ज्वलंतो ललितां प्रति ॥ १८ ॥ न तदर्थे कार्यः स्वामिन्संभ्रम ईदृशः । अस्माभिः स्वबलैर्युक्तैः रणोत्साहो विधीयते ॥ १९ ॥ भवदाज्ञालवं प्राप्य समस्तभुवनं हठात् । विमर्दयितुमीशाः स्मः किमु तां मुग्धभामिनीम् ॥ २० ॥ किं चोषयामः सप्ताब्धीन्क्षोदयामोऽथ वा गिरीन् । अधरोत्तरमेवैतत्रैलोक्यं करवाम वा ॥ २१ ॥
उसने यमराज के तुल्य अपने खड्ग को म्यान से निकाल लिया था जो बड़ा ही उग्र था । उसने अपने नेत्रों को फैलाया था और वह तेज से ज्वलित हो गया था ।१५। युद्ध में बन्धुओं के सहित इसी समय मैं इस खड्ग से उस दुष्टा के खण्ड-२ करके युद्ध में श्रम को प्राप्त करूंगा ।१६। इस तरह से रोष से उसका वर्ण स्खलित हो गया था और वह सर्प के ही तुल्य निःश्वास ले रहा था । वह एक मत्त पुरुष के ही समान अपने खड्ग को हिलाता हुआ वहाँ से चल दिया था ।१७। सभी सम्भ्रान्त दानवों ने उसको रोक दिया था और अत्यधिक क्रोध से जलते हुए उन्होंने ललिता के प्रति वचन कहने का आरम्भ कर दिया था ।१८। हे स्वामिन् ! उसके लिए आपको ऐसा सम्भ्रम नहीं करना चाहिए। हम लोग अपने बलों से समन्वित