संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
प्रकाशयामास बलं ललितादुहिता निजम् । अस्त्रप्रत्यस्त्रमोक्षेण तान्सर्वानपि भिन्दती ॥१०७ नारायणास्त्रमोक्षेण महाराज्ञीकुमारिका । द्विशत्यक्षौहिणीसैन्यं भस्मसादकरोत्क्षणात् ॥१०८ अक्षौहिणीनां क्षयतः क्षणात्कोपमुपागताः । आकृष्टगुरुधन्वानस्तेऽपतन्नेकहेलया ॥१०६ ततः कलकले जाते शक्तीनां च दिवौकसाम् । युगपत्तिंशतो बाणानसृजत्सा कुमारिका ॥११० हस्तलाघवमाश्रित्य मुक्तैश्चन्द्रार्धसायकैः । त्रिंशता त्रिंशतो भण्डपुत्राणामाहतं शिरः ॥१११ इति भंडस्य पुत्रेषु प्राप्तेषु यमसादनम् । अत्यन्तविस्मयाविष्टा ववृषुः पुष्पमम्बराः ॥११२
लघु हाथों वाली वह कुमारिका पूज्यमान होती हुई युद्ध कर रही थी । उसने युद्ध में दूसरा पूर्ण दिवस भी समाप्त किया था और उस ललिता देवी की पुत्री ने अपने बल को प्रकाशित किया था। वह उन सबको अपने अस्त्रों और प्रत्यस्त्रों से भेदन कर रही थी ।१०६-१०७। उस महाराज्ञी की कुमारिका ने नारायणास्त्र को छोड़कर दो सौ अक्षौहिणी सेनाओं को एक ही क्षण में भस्मसात् कर दिया था ।१०८। उन अक्षौहिणी सेनाओं के विनाश होने से एक ही क्षण में क्रोध को प्राप्त हुए वे दैत्यराज के पुत्रों ने अपने-अपने धनुषों को खींचा था और वे सब एक ही साथ गिर गये थे ।१०६। फिर शक्तियों का और देवगणों का कलकल उत्पन्न हो जाने पर उस कुमारिका ने एक ही साथ तीस बाण छोड़े थे ।११०। हाथ की कुशलता का आश्रय लेकर छोड़े हुए अर्ध चन्द्र बाणों से जो संख्या में तीस थे उन तीसों भण्डासुर के पुत्रों का उसने शरीर काट डाला था ।१११। इस तरह से भंड के समस्त पुत्रों के मर जाने पर अत्यधिक विस्मय से युक्त होकर देवों ने आकाश में स्थित होकर पुष्पों की वर्षा की थी ।११२।
सा च पुत्री महाराज्ञाः विध्वस्तासुरसैनिका । मन्त्रिणीदण्डनाथाभ्यामालिग्यत भृशं मुदा ॥११३