संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 775, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंभंडपुत्र वध वर्णन ] [ ३६५
क्षणे क्षणे बालिकया क्रियमाणं महार णम् । व्यजिज्ञपन्महाराज्ञयै भ्रमन्त्यः परिचारिकाः ॥१०१॥ मंत्रिणीदण्डनाथे च न तां विजहतू रणे । प्रेक्षकत्वमनुप्राप्ते तूष्णीमेव बभूवतुः ॥१०२॥ सर्वेषां दैत्यपुत्राणामेकरूपा कुमारिका । प्रत्येकभिन्ना ददृशे विम्बमालेव भास्वतः ॥१०३॥ सायकैरग्निचूडालैस्तेषां मर्माणि भिदती । रक्तोत्पलामिव क्रोधसंरक्तं बिभ्रती मुखम् ॥१०४॥ आश्चर्यं ब्रुवतो व्योम्नि पश्यतां त्रिदिवौकसाम् । साधुवादैर्बहुविधैर्मन्त्रिणीदण्डनाथयोः ॥१०५॥
उस कुमारिका ने अपने बाणों के जालों की उन दैत्येन्द्रों पर वर्षा की थी । उन भंडासुर के पुत्रों के साथ उस महाराज्ञी की कुमारिका का जो युद्ध उस समय में हुआ था वह सभी सुरों और असुरों के द्वारा स्पृहा करने के ही योग्य था ।६६। कर्णीरथ पर स्थित हुई बाणों के मण्डल की वर्षा करने वाली उस नौ वर्ष की कुमारिका को देखकर दैत्यराज के पुत्र अत्यन्त अधिक विस्मित हो गये थे ।१००। प्रतिक्षण उस बालिका के द्वारा किये जाने वाले युद्ध का समाचार परिचारिकाएं भ्रमण करती हुई महाराज्ञी को बता रही थी ।१०१। मन्त्रिणी और दण्डनाथाओं ने उस कुमारिका को कभी भी युद्ध में साथ नहीं छोड़ा था। ये दोनों प्रेक्षक थीं और चुप ही हो गयी थीं ।१०२। सूर्य देव की विम्बमाला के ही तुल्य वह एक ही स्वरूप वाली कुमारी समस्त दैत्य के पुत्रों को प्रत्येक को भिन्न दिखाई दे रही थी ।१०३। अग्नि चूडाल बाणों से उनके कर्मों का भेदन करती हुई युद्ध कर रही थी और उसका मुख क्रोध से लाल रक्त कमल के ही समान शोभित हो रहा था ।१०४। नभ में देवगण देखते हुए बड़ा ही आश्चर्य प्रकट कर रहे थे । तथा मन्त्रिणी और दण्डनाथा के अनेक प्रकार के साधु वाद भी कहे जा रहे थे ।१०५।
अर्च्यमाना रणं चक्रे लघुहस्ता कुमारिका । द्वितीयं युद्धदिवसं समस्तमपि सा रणे ॥१०६॥