भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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मतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] [ ४४५

उसके चार शिखर शक्र—नैर्ऋत्य—वायु—मध्यस्थलों में हुए हैं। जो ऊँचाई है वह बतलायी जाती है ।२६। पूर्व में कहे हुए तीन श्रृंग शत योजन उन्नत हैं ओर उनका सौ योजन ही विस्तार है। उनमें तीनों लोक माने गये हैं ।३०। ब्रह्मलोक-विष्णु लोक और शिव लोक हैं इनके महान विन्यासों का वर्णन अन्य अवसर में बताऊँगा ।३१। मध्य में स्थित श्रृंग का विस्तार ओर ऊँचाई श्रवण कीजिए। चार सौ योजन उच्चता और विस्तार है ।३२। वहाँ पर ही महान शिखर पर शिल्पियों ने श्रीपुर बनाया था। हे कुम्भ सम्भव ! वह चार सौ योजन विस्तार और ऊँचाई वाला है ।३३। वहाँ पर यह प्रविभाग है जो आपको विवेचना करके दिखाया जाता है। उसका जो प्रथम प्राकार है कालायस से बनाया गया है ।३४। सोलह सहस्र योजन आयत वेष्टन है। चारों दिशाओं में वह द्वारों से युक्त है और चार योजन ऊँचा है ।३५।

शालमूलपरीणाहो योजनायुतमब्धिप ।
शालाग्रस्य तु गव्यूतेर्नद्धवातायनं पृथक् ॥३६
शालद्वारस्य चोन्नत्यमेकयोजनमाश्रितम् ।
द्वारे द्वारे कपाटे द्वे गव्यूत्यर्धप्रविस्तरे ॥३७
एकयोजनमुन्नद्धे कालायसवनिर्मिते ।
उभयोर्गला चेत्थमर्धक्रोशसमायता ॥३८
एवं चतुर्षु द्वारेषु सदृशं परिकीर्तितम् ।
गोपुरस्य तु संस्थाने कथये कुम्भसंभव ॥३९
पूर्वोक्तस्य तु शालस्य मूले योजनसंमिते ।
पार्श्वद्वये योजने द्वे द्वे समादाय निर्मिते ॥४०
विस्तारमपि तावंतं संप्राप्तं द्वारगर्भितम् ।
पार्श्वद्वयं योजने द्वे मध्ये शालस्य योजनम् ॥४१
मेलयित्वा पञ्च मुने योजनानि प्रमाणतः ।
पार्श्वद्वयेन सार्धेन क्रोशयुग्मेन संयुतम् ॥४२

हे अब्धिप ! शाल वृक्ष के मूल के समान परिणाम वाला है और योजनायुत है। शालाग्र के गव्यूति का नद्धायत पृथक् है ।३६। शाल द्वार