भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

यो मेरुरखिलाधारस्तु'गश्चानंतयोजनः ।
चतुर्दशजगच्चक्रसंप्रोतनिजविग्रहः ॥२८॥

वह देवी परा नित्या के स्वरूप से काल की व्याप्ति करने वाली है । कलनान्तकता से देवी सम्पूर्ण जगत् का कलन करती है ।२२। महाराज्ञी नित्या नाम वाली है जिसमें तद्भिदा भी नित्या नाम ही है । अतएव उसके ही नाम से वह पुरी पहिले सनामा प्रथिता हुई है ।२३। कामेश्वरी पुरी तथा भगमाला पुरी तथा नित्य क्लिन्नापुरी—इत्यादि नाम ही प्रथिता है। वही पर्याप्त है ।२४। इसीलिए नाम वर्ण से योग्य पुण्य दिन में महान शिल्प के प्रकार से उस शुभा पुरी की रचना की थी ।२५। इसलिए कारण कृत्येन्द्र ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वरों के द्वारा उन क्षेत्रों में श्री पुरीस्थों में कहे गये थे ।२६। हे लोपामुद्रापते ! आप श्रवण कीजिए—मैं अब उस श्री पुर का विस्तार और पुर के अधिष्ठातृ देवताओं को बतलाता हूँ ।२७। जो मेरु का अखिला-धार है और अनन्तयोजन ऊँचा है चौदह भुवनों के चक्र में संप्रोत विग्रह वाला है ।२८।

तस्य चत्वारि शृंगाणि शक्रनैर्ऋतवायुषु ।
मध्यस्थलेषु जातानि प्रोच्छायास्तेषु कथ्यते ॥२६
पूर्वोक्तशृंगत्रितयं शतयोजनमुन्नतम् ।
शतयोजनविस्तारं तेषु लोकास्त्रयो मताः ॥३०
ब्रह्मलोको विष्णुलोकः शिवलोकस्तथैव च ।
एतेषां गृहविन्यासान्वक्ष्याम्यवसरांतरे ॥३१
मध्ये स्थितस्य शृंगस्य विस्तारं चोच्छ्रयं शृणु ।
चतुःशतं योजनानामुच्छ्रितं विस्तृतं तथा ॥३२
तत्रैव शृंगे महति शिल्पिभ्यां श्रीपुरं कृतम् ।
चतुःशतं योजनानां विस्तृतं कुम्भसंभव ॥३३
तत्रायं प्रविभागस्ते प्रविविच्य प्रदर्श्यते ।
प्राकारः प्रथमः प्रोक्तः कालायसविर्निमितः ॥३४
षड्दशाधिकसाहस्रयोजनायतवेष्टनः ।
चतुर्दिक्षु द्वार्थंतश्च चतुर्योजनमुच्छ्रितः ॥३५