भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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मतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] [ ४४३

येषु क्षेत्रेषु कॢप्तानि घ्नन्त्या देव्या महासुरान् । नामानि नित्यानाम्नैव प्रथितानि न संशयः ॥२१॥

ब्रह्मादिक से परिपृष्ट हुए उन दोनों शिल्पियों ने कहा था कि क्षेत्रों का प्रविभाग यथोचित कल्पित कीजिए ।१५। कारण पुरुषों ने कहा—प्रथम तो मेरु के पृष्ठ पर और निषध महीधर पर—हेम गिरि पर—हिम कूट पर और पांचवे गन्ध मादन पर—नील—मेष—श्रृंगार और महागिरि महेन्द्र पर ये नौ क्षेत्र भौम विदित हैं ।१६-१७। जलीय सात ही स्थान हैं जो समस्त सिन्धुओं में बताये गये हैं। लवण सागर—इक्षुसार सागर—सुरा सागर—घृत सागर ।१८। दधि सागर-क्षीर सिन्धु है। पूर्व में कहे हुए नौ शैलेन्द्र और पीछे बताये गये सात सिन्धु हैं ।१६। इन सोलह क्षेत्रों का आहरण करके श्री के पुरों की कॢप्ति के लिए हैं। महान ओज वाली ललिता देवी के जिनमें दिव्य गृह होंगे। आप दोनों ही शिल्पी हैं और दिव्य घटना के महान् पण्डित हैं अतः ऐसा ही निर्माण कीजिए ।२०। जिन क्षेत्रों में असुरों का हनन करने वाली देवी के नाम कॢप्त हैं वे सब नित्य नाम से ही प्रथित हैं—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ।२१।

सा हि नित्यास्वरूपेण कालव्याप्तिकरी परा । सर्वं कलयन्ते देवी कलनांकतया जगत् ॥२२ नित्यानां च महाराज्ञी नित्या यत्र न तद्विदा । अतस्तदीयनाम्ना तु सनामा प्रथिता पुरा ॥२३ कामेश्वरीपुरी चैव भगमालापुरी तथा । नित्यक्लिन्नापुरीत्यादिनामानि प्रथितान्यलम् ॥२४ अतो नामानि वर्णन योग्ये पुण्यतमे दिने । महाशिल्पप्रकारेण पुरीं रचयतां शुभाम् ॥२५ इति कारणकृत्यैर्द्रैर्ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः । प्रोक्तौ तौ श्रीपुरीस्थेषु तेषु क्षेत्रेषु चक्रतुः ॥२६ अथ श्रीपुरविस्तारं पुराधिष्ठातृदेवताः । कथयाम्यहमाधार्य लोपामुद्रापते श्रृणु ॥२७