संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अधिकारी पुरुषों ने कहा था—हे विश्वकर्मन् ! आप बहुत ही ऊँचे शिल्प कर्म के ज्ञाता हैं। हे महोदय मय ! आप दोनों ही घटना मार्ग के विद्वान् हैं और सभी शास्त्रों के भी ज्ञाता हैं ? ।८। आप लोग तो केवल संकल्प से ही महान् शिल्प कल्प के विशारद हैं। आप दोनों को ही नित्य ज्ञान की सागर ललितादेवी की श्री नगरियां बनानी चाहिए जो षोडशी क्षेत्र के मध्य में उसके क्षेत्र की समान संख्या से युक्त होंगी। वे श्री नगरी अनेक रत्नों से विभूषित भी बनानी चाहिए ।९-१०। जहाँ पर सोलह प्रकार से भिन्न परमेश्वरी ललिता इस विश्व की रक्षा के लिए अपना निवास बनायेगी ।११। यह हमारा भी प्रिय होवे और मरुतों का भी प्रिय हो और सर्वलोक का प्रिय होवे ऐसा यह नाम से ही विरचित करो ।१२। यह कारण देवों का वचन उन दोनों ने श्रवण करके दोनों विश्वकर्माओं ने ऐसा ही होगा—यह कहकर स्वीकार किया था ।१३। फिर उनने नमस्कार करके उन कारण देवताओं से पूछा था कि ये श्री नगरियाँ किन क्षेत्रों में बनानी चाहिए ।१४।
ब्रह्माद्याः परिपृष्टास्ते प्रोचुस्तौ शिल्पिनौ पुनः ।
क्षेत्राणां प्रविभागं तु कल्पयन्तौ यथोचितम् ॥१५
कारणपुरुषा ऊचुः-
प्रथमं मेरुपृष्ठे तु निषधे च महीधरे ।
हेमकूटे हिमगिरौ पञ्चमे गन्धमादने ॥१६
नीले मेषो च शृंगारे महेन्द्रे च महागिरौ ।
क्षेत्राणि हि नवैतानि भौमानि विदितान्यथ ॥१७
औदकानि तु सप्तैव प्रोक्तान्यखिलसिन्धुषु ।
लवणोऽब्धीक्षुसाराब्धिः सुराब्धिर्घृतसागरः ॥१८
दधिसिन्धुः क्षीरसिन्धुर्जंलसिन्धुश्च सप्तमः ।
पूर्वोक्ता नव शैलेन्द्राः पश्चात्सप्त च सिन्धवः ॥१९
आहृत्य षोडश क्षेत्राण्यंवाश्रीपुरक्लृप्तये ।
येषु दिव्यानि वेश्मानि ललिताया महौजसः ।
सृजतं दिव्यघटनापण्डितौ शिल्पिनौ युवाम् ॥२०