भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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मतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] [ ४४१

सभी प्रकार से सन्देह के पंक को सुखा देने वाले हैं ।२। श्री हयग्रीवजी ने कहा—जिस प्रकार से पूर्व में कहे हुए लक्षणों से युक्त चक्ररथ को प्राप्त करके महाभागानला परमेश्वरी ललिता समुत्पन्न हुई थी ।३। फिर ब्रह्मा आदि के द्वारा प्रार्थना किये जाने पर वैवाहिकी लीला करके उसने लोकों के लिए कण्टक भंडासुर पर विजय प्राप्त की थी ।४। वहाँ पर महेन्द्र आदि देवगण बहुत ही अधिक सन्तुष्ट हुए थे । इसके उपरान्त कामेश्वर का और ललिता का परम शोभन नित्य उपभोग के समस्त अर्थों वाला एक मन्दिर का निर्माण करने के लिए सब देवगण उत्सुक हुए थे ।५। ललिता देवी के कुमार ब्रह्मा-विष्णु और महेश्वर थे । इन्होंने वर्धकि विश्वकर्मा को जो कि शिल्प विद्या का पण्डित था ।६। और असुरों का शिल्पी मय को जो माया में बड़ा कुशल था बुलाया था। इनका सत्कार करके ललिता की आज्ञा से उनसे सबने कहा था ।७।

अधिकारिपुरुषा ऊचुः—

भो विश्वकर्मञ्छिल्पज्ञ भोभो मय महोदय ।
भवन्तो सर्वशास्त्रज्ञौ घटनामार्गकोविदो ॥८

संकल्पमात्रेण महाशिल्पकल्पविशारदौ ।
युवाभ्यां ललितादेव्या नित्यज्ञानमहोदधेः ॥९

षोडशीक्षेत्रमध्येषु तत्क्षेत्रसमसंख्यया ।
कर्तव्या श्रीनगर्र्यो हि नानारत्नैरलङ्कृताः ॥१०

यत्र षोडशधा भिन्ना ललिता परमेश्वरी ।
विश्वत्राणाय सततं निवासं रचयिष्यति ॥११

अस्माकं हि प्रियमिदं मरुतामपि च प्रियम् ।
सर्वलोकप्रियं चैतत्तन्नाम्नैव विरच्यताम् ॥१२

इति कारणदेवानां वचनं सुनिशम्य तौ ।
विश्वकर्ममयौ नत्वा व्यभाषेतां तथास्त्विति ॥१३

पुनर्नत्वा पृष्ठवन्तौ तौ तान्कारणपूरुषान् ।
केषु क्षेत्रेषु कर्तव्याः श्रीनगर्र्यो महोदयाः ॥१४

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