भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 856, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 856

मतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] [ ४४७

योजन पर द्वार हैं जिनमें बहुत सुन्दर किवाड़ लगे हुए हैं ।४५। और भूमि- कायें भी उतनी ही हैं जैसी ऊर्ध्व में ह्रास में संयुत हैं । गोपुर के आगे का विस्तार एक योजन समाश्रित है ।४६। उसका आयाम भी वहाँ पर उतना ही है त्रिमुकुट कहा गया है। हे घटोद्भव ! मुकुट का विस्तार एक कोश के मान वाला है ।४७। हे मुने ! गोपुर के ही तुल्य दो कोश समुन्नद्ध ह्रास है । मुकुट के अन्दर की भूमि आधे के बराबर है ।४८। मुकुट पश्चिम— पूर्वं—दक्षिण में द्वार गोपुर में है । दक्षोत्तर मुकुट पश्चिम द्वार गोपुर में है ।४६।

दक्षिणद्वारवत्प्रोक्ता उत्तरद्वाः किरीटिकाः ।
पश्चिमद्वारवत्पूर्वद्वारे मुकुटकल्पना ॥५०
कालायसाख्यशालस्यांतरे मारुतयोजने ।
अंतरे कांस्यशालस्य पूर्ववद्गोपुरोऽन्वितः ॥५१
शालमूलप्रमाणं च पूर्ववत्परिकीर्तितम् ।
कांस्यशालोऽपि पूर्वादिदिक्षु द्वारसमन्वितः ॥५२
द्वारेद्वारे गोपुराणि पूर्वलक्षणभांजि च ।
कालायसस्य कांस्यस्य योंऽतर्देशः समंततः ॥५३
नानावृक्षमहोद्यानं तत्प्रोक्तं कुम्भसंभव ।
उद्भिज्जाद्यं यावदस्ति तत्सर्वं तत्र वर्तते ॥५४
परसहस्त्रास्तरवः सदापुष्पाः सदाफलाः ।
सदापल्लवशोभाढ्याः सदा सौरभसंकुलाः ॥५५
चूताः कंकोलका लोध्रा बकुलाः कर्णिकारकाः ।
शिंशपाश्च शिरीषाश्च देवदारुनमेरवः ॥५६

दक्षिण द्वार के समान उत्तर द्वार किरीटिका कही गयी है । पश्चिम द्वार के तुल्य पूर्व द्वार में मुकुट की योजना है ।५०। कालायस शाल के अन्तर में मारुत योजन में कांस्यशाल के अन्तर में पूर्व की भाँति गोपुर अन्वित है ।५१। शाल के मूल का प्रमाण तो पूर्व के ही समान कीर्तित किया गया है। कांस्य शाल भी पूर्व आदि दिशाओं के द्वार से समन्वित है ।५२। प्रतिद्वार में पूर्व लक्षण वाले गोपुर हैं । कालायस और कांस्य का जो अन्त-

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २) · पृष्ठ 856, कुल 893 में से · BharatKosha