भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

देश है वह माना गया है जो चारों ओर है ।५३। हे कुम्भ सम्भव ! वह नाना वृक्षों का महान् उद्यान कहा गया है । उद्भिज्ज आदि जितने भी हैं वे सभी वहाँ पर विद्यमान हैं ।५४। सहस्रों से भी अधिक तरुगण जो सदा ही पुष्प और फल देने वाले हैं । वे सर्वदा पत्रों से शोभित हैं और सदा ही सौरभ से संकुल हैं ।५५। आम्र—ककोल—लोह्य—वकुल—कर्णिकार— शिंशप—शिरीष—देवदारु—नमेरु वृक्ष हैं ।५६।

पुन्नागा नागभद्राश्च मुचुकुन्दाश्च कट्फलाः । एलालवंगास्तवकोलास्तथा कर्पूरशाखिनः ॥५७ पीलवः काकतुण्ड्यश्च जालकाश्चासनास्तथा । कांचनाराश्च लकुचाः पनसा हिंगुलास्तथा ॥५८ पाटलाश्च फलिन्यश्च जटिल्यो जघनेफलाः । गणिकाश्च कुरण्डाश्च बन्धुजीवाश्च दाडिमाः ॥५६ अश्वकर्णा हस्तिकर्णाश्चांपेयाः कनकद्रुमाः । यूथिकास्तालपर्ण्यश्च तुलस्यश्च सदाफलाः ॥६० तालास्तमालहिंतालखर्जूराः शरबर्बुराः । इक्षवः क्षीरिणश्चैव श्लेष्मांतकविभीतकाः ॥६१ हरीतक्यस्त्ववाक्पुष्प्यो घोण्टाल्यः स्वर्गपुष्पिकाः । भल्लातकाश्च खदिराः शाखोटाश्चन्दनद्रुमाः ॥६२ कालागुरुद्रुमाः कालस्कन्धाश्चिञ्चा वटास्तथा । उदुम्बराजुँनाश्वत्थाः शमीवृक्षा ध्रुवाद्रुमाः ॥६३

पुन्नाग—नागभद्र—मुचुकुन्द—कट्फल—एलालवंग—तबकोल— कर्पूरशाली हैं ।५७। पीलु—काकतुण्डी—शाल—आसनकांनार—लकुच— पनस—हिंगुल हैं ।५८। पाटल—फलिनी जटिली—जघनेफल—गणिका कुरण्ड—बन्धुजीव—दाड़िम—अश्वकर्ण—हस्तिकर्ण—चाम्पेय—कनकद्रुम— यूथिका—तालपर्णी—तुलसी और सदा फल के वृक्ष हैं ।५६-६०। ताल— तमाल—हिन्ताल—खजूर—शरबर्बुर—इक्षु—क्षीरी—श्लेष्मातक—विभी- तक के वृक्ष हैं ।६१। हरीतकी—अवाक्पुष्पी—घोण्टाली—स्वर्ग पुष्पिका— भल्लातक—खदिर—शाखोट—चन्दन द्रुम हैं ।६२। कालागुरु द्रुम—काल-