संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] [ ४४६
स्कन्ध--चिंचा--वट--उदुम्बर--अर्जुन--अश्वत्थ--शमी वृक्ष--ध्रुवाद्रुम हैं ।६३।
रुचकाः कुटजाः सप्तपर्णाश्च कृतमालकाः । कपित्थास्तिन्तिणी चैवेत्येवमाद्याः सहस्रशः ॥६४॥ नानाऋतुसमाविष्टा देव्याः शृंगारहेतवः । नानावृक्षमहोत्सेधा वर्तंते वरशाखिनः ॥६५॥ कांस्यशालस्यांतराले सप्तयोजनदूरतः । चतुरस्रस्ताम्रशालः सिंधुयोजनमुन्नतः ॥६६॥ अनयोरंतरक्षोणी प्रोक्ता कल्पकवाटिका । कर्पूरगन्धिभिश्चारुरत्नबीजसमन्वितैः ॥६७॥ कांचनत्वक्सुरुचिरैः फलैस्तैः फलिता द्रुमाः । पीतांबराणि दिव्यानि प्रवालान्येव शाखिषु ॥६८॥ अमृतं स्यान्मधुरसः पुष्पाणि च विभूषणम् । ईदृशा बहवस्तत्र कल्पवृक्षाः प्रकीर्तिताः ॥६९॥ एषा कक्षा द्वितीया स्यान्कल्पवापीति नामतः । ताम्रशालस्यांतराले नागशालः प्रकीर्तितः ॥७०॥
रुचक-कुटज-सप्तपर्ण-कृतमालक-कपित्थ-तिन्तिणी-इत्यादि सहस्रों प्रकार के वृक्ष हैं ।६४। ये सभी वृक्ष अनेक जीव-जन्तुओं से समन्वित हैं जो श्रीदेवी के शृंगार के कारण हैं । नाना भाँति के वृक्षों के महान् उत्सेध से युक्त हैं ऐसे श्रेष्ठशाखी हैं ।६५। कांस्यशाल के अन्तराल में सात-योजन दूर चौकोर ताम्र शाल है जो सिन्धु योजन अनुकूल है अर्थात् सात योजन तक पीछे लगा हुआ है ।६६। इन दोनों की भीतर की पृथ्वी है जो कल्पक वाटों वाली कही गयी है वे द्रुम ऐसे हैं जो ऐसे हैं जो ऐसे फलों वाले हैं जिनमें कपूर की गन्ध है और सुन्दर रत्नों के बीजों से संयुत हैं । उनकी छाल सुनहली है और परम सुन्दर हैं । इन वृक्षों में पीताम्बर दिव्य प्रवाल हैं ।६७-६८। अमृत इनका मधुरस है और पुष्प ही विभूषण हैं । इस प्रकार के वहाँ पर बहुत से कल्प वृक्ष कीर्तित किये गये हैं ।६९। यह दूसरी कक्षा है । जिसका नाम कल्पवापी है । फिर उस ताम्रशाल के अन्तराल में नाग शाल कहा गया है ।७०।