भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

४४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

देश है वह माना गया है जो चारों ओर है ।५३। हे कुम्भ सम्भव ! वह नाना वृक्षों का महान् उद्यान कहा गया है । उद्भिज्ज आदि जितने भी हैं वे सभी वहाँ पर विद्यमान हैं ।५४। सहस्रों से भी अधिक तरुगण जो सदा ही पुष्प और फल देने वाले हैं । वे सर्वदा पत्रों से शोभित हैं और सदा ही सौरभ से संकुल हैं ।५५। आम्र—ककोल—लोह्य—वकुल—कर्णिकार— शिंशप—शिरीष—देवदारु—नमेरु वृक्ष हैं ।५६।

पुन्नागा नागभद्राश्च मुचुकुन्दाश्च कट्फलाः । एलालवंगास्तवकोलास्तथा कर्पूरशाखिनः ॥५७ पीलवः काकतुण्ड्यश्च जालकाश्चासनास्तथा । कांचनाराश्च लकुचाः पनसा हिंगुलास्तथा ॥५८ पाटलाश्च फलिन्यश्च जटिल्यो जघनेफलाः । गणिकाश्च कुरण्डाश्च बन्धुजीवाश्च दाडिमाः ॥५६ अश्वकर्णा हस्तिकर्णाश्चांपेयाः कनकद्रुमाः । यूथिकास्तालपर्ण्यश्च तुलस्यश्च सदाफलाः ॥६० तालास्तमालहिंतालखर्जूराः शरबर्बुराः । इक्षवः क्षीरिणश्चैव श्लेष्मांतकविभीतकाः ॥६१ हरीतक्यस्त्ववाक्पुष्प्यो घोण्टाल्यः स्वर्गपुष्पिकाः । भल्लातकाश्च खदिराः शाखोटाश्चन्दनद्रुमाः ॥६२ कालागुरुद्रुमाः कालस्कन्धाश्चिञ्चा वटास्तथा । उदुम्बराजुँनाश्वत्थाः शमीवृक्षा ध्रुवाद्रुमाः ॥६३

पुन्नाग—नागभद्र—मुचुकुन्द—कट्फल—एलालवंग—तबकोल— कर्पूरशाली हैं ।५७। पीलु—काकतुण्डी—शाल—आसनकांनार—लकुच— पनस—हिंगुल हैं ।५८। पाटल—फलिनी जटिली—जघनेफल—गणिका कुरण्ड—बन्धुजीव—दाड़िम—अश्वकर्ण—हस्तिकर्ण—चाम्पेय—कनकद्रुम— यूथिका—तालपर्णी—तुलसी और सदा फल के वृक्ष हैं ।५६-६०। ताल— तमाल—हिन्ताल—खजूर—शरबर्बुर—इक्षु—क्षीरी—श्लेष्मातक—विभी- तक के वृक्ष हैं ।६१। हरीतकी—अवाक्पुष्पी—घोण्टाली—स्वर्ग पुष्पिका— भल्लातक—खदिर—शाखोट—चन्दन द्रुम हैं ।६२। कालागुरु द्रुम—काल-

मतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] [ ४४६

स्कन्ध--चिंचा--वट--उदुम्बर--अर्जुन--अश्वत्थ--शमी वृक्ष--ध्रुवाद्रुम हैं ।६३।

रुचकाः कुटजाः सप्तपर्णाश्च कृतमालकाः । कपित्थास्तिन्तिणी चैवेत्येवमाद्याः सहस्रशः ॥६४॥ नानाऋतुसमाविष्टा देव्याः शृंगारहेतवः । नानावृक्षमहोत्सेधा वर्तंते वरशाखिनः ॥६५॥ कांस्यशालस्यांतराले सप्तयोजनदूरतः । चतुरस्रस्ताम्रशालः सिंधुयोजनमुन्नतः ॥६६॥ अनयोरंतरक्षोणी प्रोक्ता कल्पकवाटिका । कर्पूरगन्धिभिश्चारुरत्नबीजसमन्वितैः ॥६७॥ कांचनत्वक्सुरुचिरैः फलैस्तैः फलिता द्रुमाः । पीतांबराणि दिव्यानि प्रवालान्येव शाखिषु ॥६८॥ अमृतं स्यान्मधुरसः पुष्पाणि च विभूषणम् । ईदृशा बहवस्तत्र कल्पवृक्षाः प्रकीर्तिताः ॥६९॥ एषा कक्षा द्वितीया स्यान्कल्पवापीति नामतः । ताम्रशालस्यांतराले नागशालः प्रकीर्तितः ॥७०॥

रुचक-कुटज-सप्तपर्ण-कृतमालक-कपित्थ-तिन्तिणी-इत्यादि सहस्रों प्रकार के वृक्ष हैं ।६४। ये सभी वृक्ष अनेक जीव-जन्तुओं से समन्वित हैं जो श्रीदेवी के शृंगार के कारण हैं । नाना भाँति के वृक्षों के महान् उत्सेध से युक्त हैं ऐसे श्रेष्ठशाखी हैं ।६५। कांस्यशाल के अन्तराल में सात-योजन दूर चौकोर ताम्र शाल है जो सिन्धु योजन अनुकूल है अर्थात् सात योजन तक पीछे लगा हुआ है ।६६। इन दोनों की भीतर की पृथ्वी है जो कल्पक वाटों वाली कही गयी है वे द्रुम ऐसे हैं जो ऐसे हैं जो ऐसे फलों वाले हैं जिनमें कपूर की गन्ध है और सुन्दर रत्नों के बीजों से संयुत हैं । उनकी छाल सुनहली है और परम सुन्दर हैं । इन वृक्षों में पीताम्बर दिव्य प्रवाल हैं ।६७-६८। अमृत इनका मधुरस है और पुष्प ही विभूषण हैं । इस प्रकार के वहाँ पर बहुत से कल्प वृक्ष कीर्तित किये गये हैं ।६९। यह दूसरी कक्षा है । जिसका नाम कल्पवापी है । फिर उस ताम्रशाल के अन्तराल में नाग शाल कहा गया है ।७०।

४५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अनयोरुभयोस्तिर्यग्देशः स्यात्सप्तयोजनः ।
तत्र संतानवाटी स्यात्कल्पवापीसमाकृतिः ॥७१
तयोर्मध्ये मही प्रोक्ता हरिचन्दनवाटिका ।
कल्पवाटीसमाकारा फलपुष्पसमाकुला ॥७२
एषु सर्वेषु शालेषु पूर्ववद्द्वारकल्पनम् ।
पूर्ववद्गोपुराणां च मुकुटानां च कल्पनम् ॥७३
गोपुरद्वारक्लृप्तं च द्वारे द्वारे च संमितिः ।
आरकूटस्यांतराले सप्तयोजनदूरतः ॥७४
पञ्चलोहमयः शालः पूर्वशालसमाकृतिः ।
तयोर्मध्ये मही प्रोक्ता मन्दारद्रुमवाटिका ॥७५
पञ्चलोहस्यांतराले सप्तयोजनदूरतः ।
रौप्यशालस्तु संप्रोक्तः पूर्वोक्तैर्लक्षणैर्युतः ॥७६
तयोर्मध्ये मही प्रोक्ता पारिजातद्रुवाटिका ।
दिव्यामोदसुसंपूर्णा फलपुष्पभरोज्ज्वला ॥७७

इन दोनों का एक तिर्यग् देश है जो सात योजन वाला है । वहाँ पर एक सन्तानवाटी है जो कल्प वापी के ही सदृश आकृति वाली होती है ।७१। उन दोनों के मध्य में मही बतायी गयी है । जिसका नाम हरि चन्दन वाटिका है । यह भी कल्पवाटी के तुल्य ही आकार वाली है और फलों तथा पुष्पों से घिरी हुई है ।७२। इन समस्त शालों में पूर्व की ही भाँति द्वारों की कल्पना है और पहिली भाँति ही गोपुरों का और मुकुटों का भी कल्पन है ।७३। प्रत्येक द्वार में गोपुर द्वार के ही समान संमिति है आरकूट के अन्तराल में सात योजनों की दूरी वाला एक प्राकार और है ।७४। पञ्च लौह से पूर्ण-शाल है जो पूर्व शाल के समान आकार वाला है । उन दोनों के मध्य में जो मही है वह मन्दार द्रुमों की वाटिका वाली है ।७५। पाँचों लौहों के अन्तराल में सात योजनों की दूरी वाला चाँदी का शाल है जो पूर्व के ही सदृश लक्षणों तथा आकृति वाला है ऐसा बताया गया है । सुवर्ण का शाल पूर्व के ही समान द्वारों से सुशोभित बताया गया है ।७६। उन दोनों के मध्य में जो मही है वह पारिजात के द्रुमों की ही वाटिका है । वह परम दिव्य गन्ध वाली तथा फल पुष्पों से समन्वित है ।७७।

मातंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] । ४५१

रौप्यशालस्यांतराले सप्तयोजनविस्तरः । हेमशालः प्रकथितः पूर्ववद्द्वारशोभितः ॥७८ तयोर्मध्ये मही प्रोक्ता कदम्बतरुवाटिका । तत्र दिव्या नीपवृक्षा योजनद्वयमुन्नताः ॥७९ सदैव मदिरास्पंदा मेदुरप्रसवोज्ज्वलाः । येभ्यः कादम्बरी नाम योगिनी भोगदायिनी ॥८० विशिष्टा मदिरोद्याना मंत्रिण्याः सततं प्रिया । ते नीपवृक्षाः सुच्छायाः पत्रलाः पल्लवाकुलाः । आमोदलोलभृङ्गालीझंकारैः पूरितोदराः ॥८१ तत्रैव मंत्रिणीनाथामन्दिरं सुमनोहरम् । कदम्बवनवाट्यास्तु विदिक्षु ज्वलनादितः ॥८२ चत्वारि मंदिराण्युच्चैः कल्पितान्यादिशिल्पिना । एकैकस्य तु गेहस्य विस्तारः पञ्चयोजनः ॥८३ पञ्चयोजनमायामः समावरणतः स्थिति । एवमन्यविदिक्षु स्युस्सर्वत्र प्रियकद्रुमाः । निवासनगरी सेयं श्यामायाः परिकीर्तिता ॥८४

रौप्य शाल के अन्तराल में सात योजनों के विस्तार वाला हेम शाल कहा गया है जो पूर्व की ही भाँति द्वारों से शोभित है ।७८। उन दोनों के मध्य में भूमि जो थी वह ऐसी बतलायी गयी है कि उसमें कदम्बों के द्रुमों की वाटिका बनी है। उसमें परम दिव्यनीपों के वृक्ष हैं जो दो योजन ऊँचाई वाले हैं ।७९। वे सदा ही मदिरा का स्पन्दन करने वाले हैं और मेदुर प्रसवों से परम उज्ज्वल हैं। जिनसे कादम्बरी नाम वाली योगिनी भोग देने वाली है ।८०। वह विशेषता से युक्त मदिरोद्याना वाटिका मन्त्रिणी देवी की निरन्तर प्रिया है। वे नीपों की वृक्षावलियाँ छाया वाली तथा सुरम्य पत्र और पल्लवों से समाकुल रहा करती हैं। उसकी सुरम्य सुगन्ध से परम चञ्चल भ्रमरों की झंकार हुआ करती है जिससे उसका मध्य भाग भरा हुआ रहता है ।८१। वहाँ पर ही मन्त्रिणीनाथा का एक बहुत मनोहर मन्दिर है। कदम्बों के वन की वाटिका के विदिशाओं में ज्वलनादि से युक्त है ।८२। उस जादि

४५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

शिल्पी ने चार परमोच्च मन्दिर बनाये थे। एक-एक के घर का विस्तार पाँच योजन का था ।८३। पाँच योजनों का उनका आयाम था और समावरण से उनकी स्थिति थी। इसी रीति से अन्य विदिशाओं में सभी जगह प्रियक के द्रुम वहाँ पर थे। यह श्यामादेवी की परम प्रिय निवास की नगरी थी ।८४।

सेनार्थं नगरी त्वन्या महापद्माटवीस्थले ।
यदत्रं व गृहं तस्या बहुयोजनदूरतः ॥८५
श्रीदेव्या नित्यसेवा तु मन्त्रिण्या न घटिष्यते ।
अतश्चिन्तामणिगृहोपांतेऽपि भवनं कृतम् ।
तस्याः श्रीमन्त्रनाथायाः सुरत्वष्ट्रा मयेन च ॥८६
श्रीपुरे मन्त्रिणीदेव्या मन्दिरस्य गुणान्बहून् ।
वर्णयिष्यति को नाम यो द्विजिव्हासहस्रवान् ॥८७
कादम्बरीमदाताम्रनयनाः कलवीणया ।
गायन्त्यस्तत्र खेलंति मान्यमातंगकन्यकाः ॥८८

अगस्त्य उवाच—

मातङ्गो नाम कः प्रोक्तस्तस्य कन्याः कथं च ताः ।
सेवंते मन्त्रिणीनाथां सदा मधुमदालसाः ॥८९

हयग्रीव उवाच—

मतंगो नाम तपसामेकराशिस्तपोधनः ।
महाप्रभावसंपन्नो जगत्सर्जनलंपटः ॥६०
तपः शक्त्याऽत्तधिया च सर्वत्राज्ञाप्रवर्त्तकः ।
तस्य पुत्रस्तु मातंगो मुद्रिणीं मन्त्रिनायिकाम् ॥६१

सेना के निवास करने की अन्य नगरी भी थी जो महा पद्माटवी के स्थल में थी और वहाँ पर ही इसका गृह था जो बहुत योजनों तक दूर था ।८५। श्री देवी की नित्य सेवा मन्त्रिणी के द्वारा नहीं होगी। इसीलिए चिन्तामणि गृह के ही समीप में भी उसका भवन बनाया था। उस मन्त्रिणीनाथा का विश्वकर्मा और मय ने ही भवन का निर्माण कराया था ।८६। श्री पुर

मतंग कन्या प्रादुर्भाव वर्णन ] [ ४५३

में मन्त्रिणी देवी के जो प्रचुर गुण थे उनका वर्णन ऐसा कौन है जो कर सकता है जिसके दो सहस्र जिह्वायें होवें ।८७। कादम्बरी के मद से लाल लोचनों वाली कल वीणा के द्वारा गायन करती हुई वहाँ पर क्रीड़ा किया करती है जो कि मान्य मातंगों की बालिकाएं हैं ।८८। अगस्त्यजी ने कहा- मतंग नाम वाला यह कौन कहा गया है और उसकी कन्या कैसी थीं जो सर्वदा ही मधु से मदालसा होकर मन्त्रिणी नाथा की सेवा किया करती हैं। ।८९। श्री हयग्रीव ने कहा-मतंग नाम वाला एक तपों का समूह तपस्वी था और यह महान् प्रभाव से संयुत था । यह जगत का सृजन करने में बहुत ही लम्पट था ।९०। तप की शक्ति से इसमें ऐसी बुद्धि हो गयी थी कि सर्वत्र आज्ञा का यह प्रवर्त्तक था । उसका पुत्र मातंग हुआ था । इसकी घोर तपस्या से मन्त्र नायिका मुद्रिणी तुष्ट हो गयी थी ।९१।

घोरैस्तपोभिरत्यर्थं पूरयामास धीरधीः । मतंगमुनिपुत्रेण सुचिरं समुपासिता ॥६२ मन्त्रिणी कृतसान्निध्या वृणीष्व वरमित्यशात् । सोऽपि सर्वमुनिश्रेष्ठो मातंगस्तपसां निधिः । उवाच तां पुरो दत्तसान्निध्यां श्यामलांबिकाम् ॥६३

मातंगमहामुनिरुवाच- देवी त्वत्स्मृतिमात्रेण सर्वाश्च मम सिद्धयः । जाता एवाणिमाद्यास्ताः सर्वाश्चान्या विभूतयः ॥६४ प्रापणीयन्न मे किंचिदस्त्यंबभुवनत्रये । सर्वतः प्राप्तकालस्य भवत्याश्चरितस्मृतेः ॥६५ अथापि तव सांनिध्यमिदं नो निष्फलं भवेत् । एवं परं प्रार्थयेऽहं तं वरं पूरयांबिके ॥६६ पूर्वं हिमवता सार्धं सौहार्दं परिहासवान् । क्रीडामत्तेन चावाच्येस्तत्र तेन प्रगल्भितम् ॥६७ अहं गौरीगुरुरिति श्लाघामात्मनि तेनिवान् । तद्वाक्यं मम नैवाभूद्यतस्तत्राधिको गुणः ॥६८

४५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

धीरबुद्धि वाले उसने परमाति घोर तपों के द्वारा पूरित कर दिया था और मतंग मुनि के पुत्र ने उसकी उपासना भली-भांति से की थी ।६२। मन्त्रिणी के समीप में उपस्थित हो गयी थी और उसने उससे वरदान का वरण करने के लिए कहा था। वह भी समस्त मुनियों में परम श्रेष्ठ था और मातंग तपों की खान था। उसने समीप में उपस्थित श्यामला देवी के आगे यही कहा था ।६३। मातंग महामुनि ने हे देवि मुझे आपकी केवल स्मृति ही से समस्त सिद्धियाँ अणिमा आदि हो जावें और अन्य भी सब विभूतियाँ भी हो जावें ।६४। हे अम्ब ! तीनों भुवनों में मुझे कुछ भी प्राप्त करने के योग्य न रहे। केवल आपके चरित की स्मृति से ही सभी ओर से मुझे सब कुछ की प्राप्ति का समय हो जावे ।६५। और आपका मेरे समीप में उपस्थित हो जाना भी निष्फल न होवे। इस रीति से मैं दूसरा वर माँगता हूँ उसको भी हे अम्बिके ! आप पूर्ण करिए ।६६। पूर्व में मेरा हिमवान् के साथ परिहास वाला सौहार्द था। क्रीड़ा में मत्त उसने कुछ अवाच्य वचन कह डाले थे ।६७। उसने कहा था कि मैं गौरी का गुरु हूँ—ऐसी बहुत आत्म प्रशंसा की थी। उसका वह वाक्य ऐसा था कि मेरे पास कुछ भी उत्तर नहीं था क्योंकि उसमें अधिक गुण था ।६८।

उभयोर्गुणसाम्ये तु मित्रयोरधिके गुणे । एकस्य कारणाज्जाते तत्रान्यस्य स्पृहा भवेत् ।।९९ गौरीगुरुत्वश्लाघार्थं प्राप्ताकामोऽप्यहं तपः । कृतवान्मंत्रिणीनाथे तत्त्वं मत्तनया भव ।।१०० यतो मन्नामविख्याता भविष्यसि न संशयः । इत्युक्तं वचनं श्रुत्वा मातंगस्य महामुनेः । तथास्त्विति तिरोधत्त स च प्रीतोऽभवन्मुनिः ।।१०१ मातंगस्य महर्षेस्तु तस्य स्वप्ने तदा मुदा । तापिच्छमञ्जरीमेकां ददौ कर्णावतंसतः ।।१०२ तत्स्वप्नस्य प्रभावेण मातंगस्य सधर्मिणी । नाम्ना सिद्धिमती गर्भे लघुश्यामामधारयत् ।।१०३ तत एव समुत्पन्ना मातंगी तेन कीर्तिताः । लघुश्यामेति सा प्रोक्ता श्यामा यन्मूलकन्दभूः ।।१०४

श्रीनगर त्रिपुरा सप्त कक्षा वर्णन ] [ ४५५

मातंगकन्यका हृद्याः कोटीनामपि कोटिशः । लघुश्यामा महाश्यामामातंगी वृन्दसंयुताः । अङ्गशक्तित्वमापन्नाः सेवन्ते प्रियकप्रियाम् ॥१०५ इति मातंगकन्यानामुत्पत्तिः कुम्भसंभव । कथिताः सप्तकक्षाश्च शाला लोहादिनिर्मिताः ॥१०६

दोनों में गुणों की समता मित्रों में हो तो ठीक है यदि किसी में भी अधिक गुण होते हैं तो एक के कारण से दूसरे में भी स्पृहा हो जाया करती है ।६६। गौरी गुरुत्व की श्लाघा के लिए प्राप्ति कामना वाले मैंने तप किया था सो हे मन्त्रिणीनाथे ! अब आप मेरी पुत्री हो जावें ।१००। क्योंकि मेरे नाम से आप विख्यात होंगी—इसमें संशय नहीं है । मातंग महामुनि के इस वचन को सुनकर 'ऐसा ही होगा'—यह कहकर वह तिरोहित हो गयी थीं और मुनि बहुत प्रसन्न हुए थे ।१०१। उस समय में मातंग मुनि के स्वप्न के प्रसन्नता से कर्णावतंस से एक तापिच्छ की मंजरी प्रदान की थी । ।१०२। उस स्वप्न के प्रभाव से मातंग की सहधर्मिणी ने जिसका नाम सिद्धि मती था गर्भ में लघुश्यामा को धारण किया था ।१०३। उसी से जो समु-त्पन्न हुई थी इसी कारण से मातंगी कही गयी है । वह लघुश्यामा भी कही गयी थी क्योंकि उसकी मूलकन्द भू श्यामा थी ।१०४। मातंग की कन्याएं बड़ी सुन्दर थीं तथा करोड़ों थी । लघुश्यामा-महाश्यामा वृन्द संयुत मातंगी अङ्ग शक्तित्व को प्राप्त हुईं प्रियक प्रिया की सेवा किया करती हैं ।१०५। हे कुम्भसम्भव ! यही मातंग कन्याओं की उत्पत्ति है लोहादि से निर्मित सप्त कक्षा शालाएं भी कह दी गयी हैं ।१०६।

श्रीनगर त्रिपुरा सप्त कक्षा वर्णन

अगस्त्य उवाच- लोहादिसप्तशालानां रक्षका एव सन्ति वै । तन्नामकीर्तय प्राज्ञ येन मे संशयच्छिदा ॥१

हयग्रीव उवाच- नानावृक्षमहोद्याने वर्तते कुम्भसंभव । महाकालः सर्वलोकभक्षकः श्यामविग्रहः ॥२

४५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

श्यामकंचुकधारी च मदारुणविलोचनः ।
ब्रह्मांडचषके पूर्णं पिबन्विश्वरसायनम् ॥ ३
महाकालीं घनश्यामामनंगार्द्रामपाङ्गयत् ।
सिंहासने समासीनः कल्पांते कलनात्मके ॥ ४
ललिताध्यानसम्पन्नो ललितापूजनोत्सुकः ।
वितन्वंल्ललिताभक्तेः स्वायुषो दीर्घदीर्घताम् ।
कालमृत्युप्रमुखैश्च किंकरैरपि सेवितः ॥ ५
महाकालीमहाकालौ ललिताज्ञाप्रवर्त्तकौ ।
विश्वं कलयतः कृत्स्नं प्रथमेऽध्वनि वासिनौ ॥ ६
कालचक्रं मतङ्गस्य तस्यैवासनतां गताम् ।
चतुरावर णोपेतं मध्ये बिन्दुमनोहरम् ॥ ७

श्री अगस्त्यजी ने कहा—लोहादि सात शालाओं के रक्षक भी होंगे ही। हे प्राज्ञ ! अब आप उनके नामों को भी बतला दीजिए जिससे मेरे मन में संशय का छेदन हो जावे ।१। श्री हयग्रीव जी ने कहा—हे कुम्भ सम्भव ! अनेक प्रकार के वृक्षों के महान उद्यान में समस्त लोकों के भक्षण करने वाला जिसका श्याम शरीर है वह महाकाल विद्यमान रहा करता है ।२। यह श्याम वर्ण की कञ्चुकी के धारण करने वाला था और मद से उसके लाल नेत्र थे । तथा ब्रह्माण्ड के प्याले में वह विश्व रसायन का पान किया करता है ।३। घन के समान श्याम वर्ण वालो की ओर जो काम से आर्द्र थी कटाक्ष-पात कर रहा था। कलनात्मक कल्प के अन्त में वह सिंहासन पर विराज-मान रहा करता है ।४। यह सदा ललिता देवी के ध्यान में सम्पन्न रहता है और ललितादेवी के पूजन करने में इसकी उत्सुकता रहती है । जो भी ललितादेवी के भक्त हैं उनकी आयु की दीर्घता का विस्तार अधिक किया करता है । कालमृत्यु जिनमें प्रधान है ऐसे अनेक किङ्करों के द्वारा वह सेवित रहता है ।५। महाकाली और महाकाल ये दोनों ही ललितादेवी की आज्ञा के प्रवर्तक हैं ये प्रथम मार्ग में वास करने वाले सम्पूर्ण विश्व को कलित किया करते हैं ।६। उसी मतंग का यह काल चक्र आसनता को प्राप्त हुआ था। यह चार आवरणों से उपेत था और मध्य में मनोहर बिन्दु था ।७।

श्रीनगर त्रिपुरा सप्तकक्षा वर्णन ] [ ४५७

त्रिकोणं पञ्चकोणं च षोडशच्छदपंकजम् । अष्टारपंकजं चैवं महाकालस्तु मध्यगः ॥८ त्रिकोणे तु महाकाल्या महासंध्या महानिशा । एतास्तिस्रो महादेव्यो महाकालस्य शक्तयः ॥६ तत्रैव पञ्चकोणाग्रे प्रत्यूषश्च पितृप्रसूः । प्राह्णापराहणमध्याह्नाः पञ्च कालस्य शक्तयः ॥१० अथ षोडशपत्राब्जे स्थिता शक्तीर्मुने शृणु । दिनमिश्रा तमिस्रा च ज्योत्स्नी चैव तु पक्षिणी ॥११ प्रदोषा च निशीथा च प्रहरा पूर्णिमापि च । राका चानुमतिश्चैव तथैवामावस्यिका पुनः ॥१२ सिनीवाली कुहूर्भद्रा उपरागा च षोडशी । एता षोडशमात्रस्थाः शक्तयः षोडश स्मृताः ॥१३ कला काष्ठा निमेषाश्च क्षणाश्चैव लवास्त्रुटिः । मुहूर्ताः कुतपाहोरा शुक्लपक्षस्तथैव च ॥१४

एक त्रिकोण है—फिर पञ्च कोण हैं—फिर सोलह दलों वाला पङ्कज है—फिर आठ आरों काल पङ्कज है—और महाकाल मध्यगामी रहता है ।८। त्रिकोण में महाकाल्या—महासन्ध्या और महा निशा—ये तीन महा देवियां जो महाकाल की शक्तियां हैं विद्यमान हैं ।६। वहाँ पर ही पञ्चकोण के अग्रभाग से प्रत्यूष—पितृ प्रसू—प्राह्णपराहण—मध्याह्न ये पाँच काल की शक्तियां हैं ।१०। हे मुने ! अब आप सुनिए इसके पश्चात् सोलह दलों वाले कमल में जो शक्तियाँ स्थित रहा करती हैं । तमिस्रा—दिनमिश्रा—ज्योत्स्नी—पक्षिणी—प्रदोषा—निशीथा—प्रहरा—पूर्णिमा—राका—अनुमति और अमावस्यिका हैं ।११-१२। सिनीवाली—कुहू—भद्रा और सोलहवीं उपरागा है । ये सोलह मात्रस्थ षोडश शक्तियाँ कही गयीं हैं ।१३। कला—काष्ठा—निमेषा—क्षणा—लवा—त्रुटि मुहूर्त्त तथा कुतपा होरा और शुक्ल पक्ष है ।१४।

कृष्णपक्षायनाश्चैव विषुवा च त्रयोदशी । संवत्सरा च परिवत्सरेडावत्सरापि च ॥१५

४५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

एताः षोडश पत्राब्जवासिन्यः शक्तयः स्मृताः । इद्वत्सरा ततश्चेन्दुवत्सरावत्सरेऽपि च ॥१६॥ तिथिवारांश्च नक्षत्रं योगांश्च करणानि च । एतास्तु शक्तयो नागपत्रांभोरुहसंस्थिताः ॥१७॥ कलिः कल्पा च कलना काली चेति चतुष्टयम् । द्वारपालकतां प्राप्तं कालचक्रस्य भास्वतः ॥१८॥ एता महाकालदेव्यो मदप्रहसिताननाः । मदिरापूर्णचषकमशेषं चारुणप्रभम् । दधानाः श्यामलाकाराः सर्वाः कालस्य योषितः ॥१९॥ ललितापूजनध्यानजपस्तोत्रपरायणाः । निषेवन्ते महाकालं कालचक्रासनस्थितम् ॥२०॥ अथ कल्पकवट्यास्तु रक्षकः कुम्भसम्भव । वसन्तर्तुर्महातेजा ललिताप्रियकिङ्करः ॥२१॥

कृष्णपक्ष—अयन—विषुवा और—त्रयोदशी—सम्वत्सरा परि वत्सरा इडा वत्सरा ।१५। ये सोलह पत्राब्ज वासिनी शक्तियां कही गयी हैं । इद्वत्सरा—इन्दुवत्सरा—तिथि—वत्सरा—तिथि—वार—नक्षत्र—योग—करण ये शक्तियां नाग पत्रांबु रुह में संस्थित रहती हैं ।१६-१७। कलि—कल्प—कलना—काली—ये चार भास्वात काल चक्र के द्वार पालता को प्राप्त होते हैं ।१८। ये महाकाल देवियां मद से प्रहसित मुखों वाली हैं । उनका चषक अर्थात् प्याला मदिरा से परिपूर्ण रहा करता है और उसकी प्रभा अरुण होती है । ये सब काल की स्त्रियाँ श्यामल आकार वाली हैं ।१९। ये कालचक्र के आसन पर स्थित होती हुई श्री ललितादेवी के ध्यान—पूजन जप और स्तोत्रों के पाठ में ही परायण रहती हैं और महाकाल की सेवा किया करती हैं ।२०। हे कुम्भसम्भव ! कल्पक वटी का रक्षक वसन्त ऋतु होता है जो महान् तेज से युक्त ललितादेवी का परम प्रिय किङ्कर है ।२१।

पुष्पसिंहासनासीनः पुष्पमाध्वीमदारुणः । पुष्पायुधः पुष्पभूषः पुष्पच्छत्रेण शोभितः ॥२२॥ मधुश्रीमर्धवश्रीश्च द्वे देव्यौ तस्य दीव्यतः । प्रसूनमदिरामत्तो प्रसून शरलालसे ॥२३॥

श्रीनगर त्रिपुरा सप्त कक्षा वर्णन ] [ ४५६

सन्तानवाटिकापालो ग्रीष्मर्तु स्तीक्ष्णलोचनः । ललिताकिङ्करो नित्यं तस्यास्त्वाज्ञाप्रवर्तकः ॥२४॥ शुक्रश्रीश्च शुचिश्रीश्च तस्य भार्ये उभे स्मृते । हरिचन्दनवाटी तु मुने वर्षर्तु ना स्थिता ॥२५॥ स वर्षर्तु र्महातेजा विद्युत्पिङ्गललोचनः । वज्राट्टहासमुखरो मत्तजीमूतवाहनः ॥२६॥ जीमूतकवचच्छन्नो मणिकार्मुकधारकः । ललितापूजनध्यानजपस्तोत्रपरायणः ॥२७॥ वर्तते विन्ध्यमथन त्रैलोक्याह्लाददायकः । नभःश्रीश्च नभस्यश्रीः स्वरस्वारस्वमालिनी ॥२८॥

यह वसन्त ऋतु पुष्पों के आसन पर विराजमान और पुष्पों की माध्वी के मद से अरुण वर्ण वाला है । इसके आयुध भी कुसुमों के ही हैं तथा पुष्प ही भूषणों वाला और पुष्पों के छत्र की भूषा वाला है ।२२। मधु श्री और माधव श्री—ये दो देवियाँ उसकी दीप्त हैं । ये दोनों ही पुष्पों की मदिरा से मत्त हैं और प्रसून शर (कामदेव) की लालसा वाली हैं ।२३। सन्तान वाटिका का पालक ग्रीष्म ऋतु है जिसके लोचन बहुत तीक्ष्ण हैं । यह भी श्रीललिता देवी का सेवक नित्य ही रहता है तथा उसकी आज्ञा का प्रवर्तक है ।२४। शुक्र श्री और शुचि श्री—ये दो उसकी भार्याएँ हैं । हे मुने ! वर्षा ऋतु हरिचन्दन वाटिका में स्थित रहा करती है ।२५। वह वर्षा ऋतु महान् तेज से युक्त हैं और विद्युत् के सदृश उसके पिङ्गल लोचन हैं। यह वज्रपात के समान अट्टहास से शब्दायमान हैं तथा मेघ ही इसका वाहन होता है ।२६। मेघों के कवच से यह ढका हुआ रहता है और मणियों के कार्मुक वाला है । यह भी ललिता देवी के अर्चन ध्यान और स्तोत्र पाठ में तत्पर रहा करता है ।२७। यह विन्ध्य मथन त्रैलोक्य के आह्लाद का देने वाला है । नभः श्री—नभस्य श्री स्वर स्वार स्वरमालिनी उसकी शक्तियाँ हैं ।२८।

अम्बा दुला निरलिश्वाभ्रयन्ती मेघप्रंत्रिका । वर्षयन्ती चिबुणिका वारिधारा च शक्तयः ॥२९॥

४६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वर्षंत्यो द्वादश प्रोक्ता मदारुणविलोचनाः । ताभिः समं स वर्षर्तुः शक्तिभिः परमेश्वरीम् ॥३०॥ सदैव संजपन्नास्ते निजोत्थैः पुष्पमंडलैः । ललिताभक्तदेशांस्तु भूषयन्स्वस्य सम्पदा ॥३१॥ तद्वैरिणां तु वसुधामनावृष्ट्या निपीडयन् । वर्तते सततं देवकिङ्करो जलदागमः ॥३२॥ मन्दारवाटिकायां तु सदा शरहतुर्वसन् । तां कक्षां रक्षति श्रीमांल्लोकचित्तप्रसादनः ॥३३॥ इषश्रीश्च तथोर्जश्रीस्तस्यतौः प्राणनायिके । ताभ्यां संजहृतुस्तोयं निजोत्थैः पुष्पमंडलैः । अभ्यर्चयति साम्राज्ञीं श्रीकामेश्वरयोषितम् ॥३४॥ हेमन्तर्तुर्महातेजा हिमशीतलविग्रहः । सदा प्रसन्नवदनो ललिताप्रियकिङ्करः ॥३५॥

अम्बा—दुला—निरत्नि—अभ्रयन्ती—मेघयन्त्रिका—वर्षयन्ती—चिबु- णिका और वारिधारा—वर्षन्ती ये बारह जो महान् नेत्रों वाली हैं इसकी शक्तियां हैं ।२६। उस ऋतु की इष श्री और ऊर्ज श्री दो प्राण नाभिकाएं हैं। अपने उठाये हुए पुष्प मण्डलों से उन दोनों के द्वारा जल का भली-भांति हरण किया जाया करता था। श्री कामेश्वर ही योषित का जो महा साम्रस्तो थी ये अभ्यर्चन करती हैं। उन सबके साथ जो वर्षा ऋतु की शक्तियां हैं वे श्रम से उत्थित पुष्पमण्डलों से सदा ही सम्पन्न हैं। जो ललिता के भक्तों के देश हैं उन पर कृपा से सम्पदा के द्वारा भूषित किया करती हैं ।३०-३१। उनके शत्रुओं की वसुधा को अनावृष्टि से पीड़ित करता हुआ देवी का किङ्कर जलदागम वर्तमान रहता है ।३२। मन्दारों की वाटिका में सदा ही शरद ऋतु निवास किया करता है। वह श्रीमान् लोगों के चित्त को प्रसन्न करने वाला उस कक्षा की रक्षा करता है ।३२-३३। हेमन्त ऋतु हिमसे शीतल विग्रह वाला होता है। यह सदा ही प्रसन्न मुख वाला है ओर ललिता देवी का बहुत ही प्रिय किंकर है ।३४-३५।

श्रीनगर त्रिपुरा सप्त कक्षा वर्णन ] [ ४६१

निजोत्थैः पुष्पसंभारै रचयन्परमेश्वरीम् । पारिजातस्य वाटीं तु रक्षति ज्वलनार्दनः ॥३६ सहःश्रीश्च सहस्यश्रीस्तस्य द्वे योषिते शुभे । कदम्बवनवाट्यास्तु रक्षकः शिशिराकृतिः ॥३७ शिशिरर्तुर्मुनिश्श्रेष्ठ वर्तते कुम्भसम्भव । सा कक्ष्या तेन सर्वत्र शिशिरीकृतभूतला ॥३८ तद्वासिनी ततः श्यामा देवता शिशिराकृतिः । तपःश्रीश्च तपस्यश्रीस्तस्य द्वे योषिदुत्तमे । ताभ्यां सहार्चयत्यंबां ललितां विश्वपावनीम् ॥३९ अगस्त्य उवाच- गन्धर्ववदन श्रीमन्नानावृक्षादिसप्तकैः । प्रथमोद्यानपालस्तु महाकालो मया श्रितः ॥४० चतुरावरणं चक्रं त्वया तस्य प्रकीर्तितम् । षण्णामृतूनामन्येषां कल्पकोद्यानवाटिषु । पालकत्वं श्रुतं त्वत्तश्चक्रदेव्यस्तु न श्रुताः ॥४१ अत एव वसन्तादिचक्रावरणदेवताः । क्रमेण ब्रूहि भगवन्सर्वज्ञोऽसि यतो महान् ॥४२

अपने में समुत्पन्न कुसुमों के संभारों से यह परमेश्वरी की अर्चना किया करता है। ज्वलनार्दन यह पारिजात की वाटिका की सर्वदा रक्षा किया करता है ॥३६॥ सहः श्री और सहस्य श्री—ये दो परम शुभ उसकी पत्नियां हैं। उन अपनी उत्तम नारियों को साथ में लेकर यह विश्व पावनी अम्बा ललिता का समर्चन किया करता है। कदम्ब वन की वाटिका की शिशिराकृति रक्षा करता था ॥३७॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! हे कुम्भ सम्भव ! यह शिशिर ऋतु है। वह सभी जगह कक्ष्या उसी से शीतल भूतल वाली है ॥३८॥ उसमें निवास करने वाली शिशिराकृति श्यामा देवता है। तपः श्री और तपस्य श्री ये दो उसकी उत्तम स्त्रियां हैं। उन दोनों के ही साथ वह विश्व-पावती ललिता देवी का अर्चन करता है ॥३९॥ अगस्त्यजी ने कहा—हे

४६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गन्धर्व वदन ! श्री सम्पन्न अनेक वृक्षों के सप्तक से प्रथमोद्यान का पालक महाकाल मयाश्रित है । चतुरशारण चक्र आपने उसका कीर्तित किया है । अन्यों का छै ऋतुएँ कल्पोद्यान वाटिकाओं में पाला है—यह भी सुना है और आप से चक्र की देवियाँ नही सुनी हैं ।४०-४१। अतएव वसन्त आदि चक्र के आवरण देवता आप क्रम से बताइए । क्योंकि आप तो महान सर्वज्ञ महापुरुष हैं ।४२।

हयग्रीव उवाच— आकर्णय मुनिश्रेष्ठ तत्तच्चक्रस्थदेवता ।।४३ कालचक्रं पुरा प्रोक्तं वासन्तं चक्रमुच्यते । त्रिकोणं पञ्चकोणं च नागच्छदसरोरुहम् । षोडशारं सरोजं च दशारद्वितयं पुनः ।।४४ चतुरस्रं च विज्ञेयं सप्तावरणसंयुतम् । तन्मध्ये बिन्दुचक्रस्थो वसन्तर्तु महाद्युतिः ।।४५ तदेकद्वयसंलग्ने मधुश्रीमाधवश्रियो । उभाभ्यां निजहस्ताभ्यामुभयोस्तनमेककम् ।।४६ निपीडयन्स्वहस्तस्य युगलेन ससौरभम् । सपुष्पमदिरापूर्णचषकं पिशितं वहन् ।।४७ एवमेव तु सर्वर्तुं ध्यानं विन्ध्यनिषूदन । वर्षर्तौस्तु पुनर्ध्याने शक्तिद्वितयमादिमम् । अंकस्थितं तु विज्ञेयं शक्तयोऽन्याः समीपगाः ।।४८ अथ वासन्तचक्रस्थदेवीः शृणु वदाम्यहम् । मधुशुक्लप्रथमिका मधुशुक्लद्वितीियका ।।४९

श्री हयग्रीवजी ने कहा—हे मुनिश्रेष्ठ ! आप उन-उन चक्रों में स्थित देवताओं को श्रवण कीजिए ।४३। पहिले हमने कालचक्र बता दिया है । अब वासन्त बताया जाता है । त्रिकोण पञ्चकोण नागच्छद सरोरुह है । सोलह आर हैं ऐसा सरोज है फिर चौबीस हैं ।४४। सात आवरणों से युक्त चतुरस्र जान लेना चाहिए । उसके मध्य में बिन्दुचक्र में स्थित महान् द्युति वाला

श्रीनगर त्रिपुरा सप्त कक्षा वर्णन ] | ४६३

वसन्त ऋतु है ।४५। उसके एक के साथ दो प्रियाएँ संलग्न रहती हैं जिनके नाम मधु श्री और माधव श्री हैं। दोनों के स्तनों को अपने एक-एक हाथ से ग्रहण किये हुए हैं ।४६। उन उरोजों को अपने दोनों हाथों से निपीडित करता है और सौरभ से समन्वित है। वह सौरभ वाली मदिरा पुष्पों से संयुक्त है उसका चषक भरा हुआ है और पिशित भी है इनका वहन कर रहा है ।४७। विन्ध्य निषूदन ! इस रीति से सब ऋतुओं का ध्यान करे । वर्षा ऋतु के ध्यान ये फिर दो शक्तियों आदि का ध्यान करे । जो उसके अङ्क में ही स्थित हैं तथा अन्य शक्तियाँ का उसके समीप में स्थित हैं ।४८। उसके अनन्तर अब उस वासन्त चक्र में जो देवियाँ वर्तमान रहती हैं उनको भी मैं आपको अभी बतलाता हूँ—आप उनका श्रवण कीजिए । मधु शुक्ला पहली है और मधु शुक्ल द्वितीय हैं ।४६।

मधुशुक्लतृतीया च मधुशुक्लचतुर्थिका ।
मधुशुक्ला पञ्चमी च मधुशुक्ला च षष्ठिका ॥५०॥
मधुशुक्ला सप्तमी च मधुशुक्लाष्टमी पुनः ।
नवमी मधुशुक्ला च दशमी मधुशुक्लिका ॥५१॥
मधुशुक्लैकादशी च द्वादशी मधुशुक्लतः ।
मधुशुक्लत्रयोदश्यां मधुशुक्ला चतुर्दशी ॥५२॥
मधुशुक्ला पौर्णमासी प्रथमा मधुकृष्णिका ।
मधुकृष्णा द्वितीया च तृतीया मधुकृष्णिका ॥५३॥
चतुर्थी मधुकृष्णा च मधुकृष्णा च पञ्चमी ।
षष्ठी तु मधुकृष्णा स्यात्सप्तमी मधुकृष्णतः ॥५४॥
मधुकृष्णाष्टमी चैव नवमी मधुकृष्णतः ।
दशमी मधुकृष्णा च विन्ध्यदर्पनिषूदन ॥५५॥
मधुकृष्णैकादशी तु द्वादशी मधुकृष्णतः ।
मधुकृष्णत्रयोदश्या मधुकृष्णचतुर्दशी ॥५६॥

मधुशुक्ल तृतीया है और मधुशुक्ल चतुर्थिका है। मधु शुक्ला पञ्चमी और मधुशुक्ल षष्ठिका है ।५०। मधुशुक्ला सप्तमी और फिर मधु-शुक्ला अष्टमी है 'नवमी मधुशुक्ला है ।५१। मधुशुक्ला एकादशी और

४६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्वादशी मधुशुक्ल है मधु शुक्ल त्रयोदशीमें तथा मधुशुक्ला चतुर्दशी है ।५२। मधुशुक्ला पोर्णमासी और मधुकृष्णा प्रथमा है । मधुकृष्णा द्वितीया और तृतीया मधुकृष्णिका है ।५३। चतुर्थी मधुकृष्णा और मधुकृष्णा पञ्चमी । षष्ठी मधुकृष्णा और सप्तमी मधु कृष्ण से है ।५४। मधुकृष्णा अष्टमी मधुकृष्ण से नवमी है । हे विन्ध्यदर्प निषूषदन ! दशमी मधुकृष्णा है ।५५। मधुकृष्णा एकादशी है तथा द्वादशी मधु कृष्ण से है । मधु कृष्ण त्रयोदशी से है और मधु कृष्ण चतुर्दशी है ।५६।

मध्वमा चेति विज्ञेयास्त्रिंशदेतास्तु शक्तयः । एवमेव प्रकारेण माधवाख्यो परिस्थितिः ॥५७

शुक्लप्रतिपदाद्यास्तु शक्तयस्त्रिंशदन्यकाः । मिलित्वा षष्टिसंख्यास्तु ख्याता वासन्तशक्तयः ॥५८

स्वैःस्वैर्मन्त्रैस्तत्र चक्रे पूजनीया विधानतः । वासन्तचक्रराजस्य सप्तावरणभूमयः ॥५९

षष्टिः स्युर्देवतास्तासु षष्टिभूमिषु संस्थिताः । विभज्य चार्चनीयाः स्युस्तत्तन्मन्त्रैस्तु साधकैः ॥६०

तथा वासन्तचक्रं स्यात्तथैवान्येषु च त्रिषु । देवतास्तु परं भिन्नाः शुक्रशुच्यादिभेदतः ॥६१

शक्तयः षष्टिसंख्याता ग्रीष्मचक्रे महोदयाः । एवं वर्षादिके चक्रे भेदान्नभनभस्यजान् ॥६२

षष्टिषष्टिसु शक्तीना चक्रेचक्रे प्रतिष्ठिताः । ग्रन्थविस्तारभीत्या तु तत्संख्यानाद्विरम्यते ॥६३

मधु अमा है—ये तीस शक्तियाँ हैं । इसी प्रकार से माधवाख्य के ऊपर में स्थित हैं ।५७। शुक्ल प्रतिपदा आदिक अन्य तीस शक्तियाँ हैं । ये सब मिलकर वासन्त शक्तियाँ साठ विख्यात हैं ।५८। अपने-अपने मन्त्रों के द्वारा वहाँ चक्र में वासन्त चक्रराज में वासन्त चक्रराज की सात आवरण भूमियाँ विधि से पूजन करने के योग्य हैं ।५९। साठ भूमियों में ये साठ देवता संस्थित हैं । साधकों के द्वारा विभाग करके उन-उन मन्त्रों से पूजन करने के योग्य हैं ।६०। उसी भांति से वासन्त चक्र तीन अन्यों में है और

पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] | ४६५

शुक्र शुच्यादि के भेद से देवता भिन्न हैं ।६१। शक्तियाँ संख्या में साठ हैं जो महोदया ग्रीष्म चक्र में हैं । इसी तरह से वर्षादिक चक्र में भेद से नभन-भस्यज हैं ।६२। ये साठ-साठ शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं । ग्रन्थ के विस्तार से भय से उनकी संख्या करने से विराम लिया जा रहा है ।६३।

आर्तव्याः शक्तयस्त्वेता ललिताभक्त सौख्यदाः । ललितापूजनध्यानजपस्तोत्रपरायणाः ॥६४॥ कल्पादिवाटिकाचक्रे सञ्चरंत्यो मदालसाः । स्वस्वपुष्पोत्थमधुभिस्तर्पयंत्यो महेश्वरीम् ॥६५॥ मिलित्वा चैव संख्याताः षट्युत्तरशतत्रयम् । एवं सप्तसु शालेषु पालिकाश्चक्रदेवताः ॥६६॥ नामकीर्तनपूर्वं तु प्रोक्तस्तुभ्यं प्रपृच्छते । अन्येषामपि शालानामुपादानं तु पूरकम् । विस्तारं तत्र शक्तिं च कथयाम्यवधारय ॥६७॥

ये शक्तियाँ ललिता देवी के सौख्य के देने वाली हैं इनका आहरण करना चाहिए । जो भी ललिता के पूजन ध्यान जप और स्तोत्र में परायण हैं ।६४। कल्पादि वाटिका के चक्र में मदालसा ये सञ्चरण किया करती हैं । अपने-अपने पुष्पों के मधु से ये महेश्वरी का तर्पण किया करती हैं ।६५। सब मिलकर तीन सौ साठ होती हैं । इसी तरह से सात सालों में चक्र देवता पालिका हैं ।६६। आपने पूछा है तो आपके सामने नामों का कीर्तन कर दिया है । अन्य शालाओं का उपादान पूरक है । उनका विस्तार और शक्ति कहता हूँ, आप अवधारण कीजिए ।६७।

॥ पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ॥

हयग्रीव उवाच- कथितं सप्तशालानां लक्षणं शिल्पिभिः कृतम् । अथ रत्नमयाः शालाः प्रकीर्त्यंतेऽवधारय ॥१॥ सुवर्णमयशालस्य पुष्परागमयस्य च । सप्तयोजनमात्रं स्यान्मध्येन्तरमुदाहृतम् ॥२॥

४६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तत्र सिद्धाः सिद्धनार्यः खेलंति मदविह्वलाः ।
रसै रसायनैश्चापि खड्गैः पादांजनैरपि ॥३
ललितायां भक्तियुक्तास्तर्पयन्तो महाजनान् ।
वसन्ति विविधास्तत्र पिबन्ति मदिरारसान् ॥४
पुष्परागादिशालानां पूर्ववद्द्वारक्लृप्तयः ।
पुष्परागादिशालेषु कवाटार्गलगोपुरम् ।
पुष्परागादिजं ज्ञेयमुच्चैन्द्रादित्यभास्वरम् ॥५
हेमप्राकारचक्रस्य पुष्परागमयस्य च ।
अन्तरे या स्थली सापि पुष्परागमयी स्मृता ॥६
वक्ष्यमाणमहाशालाकक्षासु निखिलास्वपि ।
तद्वर्णाः पक्षिणस्तत्र तद्वर्णानि सरांसि च ॥७

श्री हयग्रीवजी ने कहा—शिल्पियों के द्वारा निर्मित सप्त शालाओं का लक्षण बता दिया गया है । इसके अनन्तर रत्नों से परिपूर्ण शालायें अब कीर्त्तित की जाती है उनका आप अवधारण कीजिए ।१। सुवर्ण से परिपूर्ण शाल और पुष्प रोगों से परिपूर्ण शाल का जो मध्य में अन्तर है वह सात योजन मात्र कहा गया है ।२। वहाँ पर सिद्ध और मद से विह्वल सिद्धों की नारियाँ खेला करती हैं । उनकी क्रीड़ा के साधन रस-रसायन-खड्ग और पादाञ्जन होते हैं ।३। ये ललिता देवी में भक्ति से युक्त हैं और महाजनों का तर्पण किया करती हैं । वहाँ पर अनेक प्रकार के वास करते हैं और मदिरारस का पान किया करते हैं ।३। पुष्पराज आदि की जो शालाएँ हैं उनके द्वारों की रचनाएं पूर्व की ही भाँति हैं । पुष्प राग प्रभृति की शालों में कपाट अर्गला और गोपुर हैं । यह सभी पुष्प राग आदि से समुत्पन्न है तथा इन्दु और सूर्य के समान ही परम भास्वर हैं ।५। हेम के प्राकार वाले चक्र का और पुष्परागों से परिपूर्ण का जो अन्तर है उसमें जो स्थल है वह भी पुष्परागों से परिपूर्ण है ऐसा ही कहा गया है ।६। आगे कहे जाने वाली महा शालाओं की कक्षाओं में समस्तों में भी उनके ही वर्ण वाले सब पक्षी हैं और उनके ही वर्णों वाले सब सरोवर हैं ।७।

तद्वर्णसलिला नद्यस्तद्वर्णाश्च मणिद्रुमाः ।

पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४६७

सिद्धजातिषु ये देवीमुपास्य विविधैः क्रमैः । त्यक्तवन्तो वपुः पूर्वं ते सिद्धास्तत्र सांगनाः ॥८ ललितामन्त्रजप्तारो ललिताक्रमतत्पराः । ते सर्वे ललितादेव्या नामकीर्तनकारिणः ॥९ पुष्परागमहाशालांतरे मारुतयोजने । पद्मरागमयः शालश्चतुरस्रः समंततः ॥१० स्थली च पद्मरागाढ्या गोपुराद्यं च तन्मयम् । तत्र चारणदेशस्थाः पूर्वदेहविनाशतः । सिद्धिं प्राप्ता महाराज्ञीचरणाम्भोजसेवकाः ॥११ चारणीनां स्त्रियश्चापि चार्वंग्यो मदलालसाः । गायन्ति ललितादेव्या गीतिबन्धान्मुहुर्मुहुः ॥१२ तत्रैव कल्पवृक्षाणां मध्यस्थवेदिकास्थिताः । भर्तृभिः सहचारिण्यः पिबन्ति मधुरं मधु ॥१३ पद्मरागमहाशालान्तरे मरुतयोजने । गोमेदकमहाशालः पूर्वशालासमाकृतिः । अतितुङ्गो हीरशालस्तयोर्मध्ये च हीरभूः ॥१४

वहां की समस्त नदियाँ भी उसी के वर्ण वाली हैं तथा मणियों के वृक्ष भी उसी वर्णों वाले हैं। अनेक प्रकार के क्रमों से जो सिद्ध जातियों में देवी की उपासना करने वाले थे पूर्व शरीर को त्याग कर अङ्गनाओं के साथ ही थे ।८। वे सभी ललितादेवी के मन्त्र का जाप करने वाले और ललिता के ही क्रम में परायण थे । वे सभी ललितादेवी के नाम का कीर्त्तन करने वाले ही थे ।९। पुष्पराग के महाशाल के अन्तर में मारुत योजन में पद्मरागमय एक शाल है जो सभी ओर से चौकोर है ।१०। वहाँ की जो स्थली है वह भी पद्मरागों से संयुत है और गोपुर आदि भी उसी पद्मराग से परिपूर्ण है । वहो पर चारण देश में संस्थित होने वाले अपने देह के विनाश हो जाने से सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं क्योंकि वे सभी महाराज्ञी के चरण कमलों के सेवक थे ।११। चारणों की स्त्रियाँ भी परम सुन्दर अङ्गों