भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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श्रीनगर त्रिपुरा सप्त कक्षा वर्णन ] | ४६३

वसन्त ऋतु है ।४५। उसके एक के साथ दो प्रियाएँ संलग्न रहती हैं जिनके नाम मधु श्री और माधव श्री हैं। दोनों के स्तनों को अपने एक-एक हाथ से ग्रहण किये हुए हैं ।४६। उन उरोजों को अपने दोनों हाथों से निपीडित करता है और सौरभ से समन्वित है। वह सौरभ वाली मदिरा पुष्पों से संयुक्त है उसका चषक भरा हुआ है और पिशित भी है इनका वहन कर रहा है ।४७। विन्ध्य निषूदन ! इस रीति से सब ऋतुओं का ध्यान करे । वर्षा ऋतु के ध्यान ये फिर दो शक्तियों आदि का ध्यान करे । जो उसके अङ्क में ही स्थित हैं तथा अन्य शक्तियाँ का उसके समीप में स्थित हैं ।४८। उसके अनन्तर अब उस वासन्त चक्र में जो देवियाँ वर्तमान रहती हैं उनको भी मैं आपको अभी बतलाता हूँ—आप उनका श्रवण कीजिए । मधु शुक्ला पहली है और मधु शुक्ल द्वितीय हैं ।४६।

मधुशुक्लतृतीया च मधुशुक्लचतुर्थिका ।
मधुशुक्ला पञ्चमी च मधुशुक्ला च षष्ठिका ॥५०॥
मधुशुक्ला सप्तमी च मधुशुक्लाष्टमी पुनः ।
नवमी मधुशुक्ला च दशमी मधुशुक्लिका ॥५१॥
मधुशुक्लैकादशी च द्वादशी मधुशुक्लतः ।
मधुशुक्लत्रयोदश्यां मधुशुक्ला चतुर्दशी ॥५२॥
मधुशुक्ला पौर्णमासी प्रथमा मधुकृष्णिका ।
मधुकृष्णा द्वितीया च तृतीया मधुकृष्णिका ॥५३॥
चतुर्थी मधुकृष्णा च मधुकृष्णा च पञ्चमी ।
षष्ठी तु मधुकृष्णा स्यात्सप्तमी मधुकृष्णतः ॥५४॥
मधुकृष्णाष्टमी चैव नवमी मधुकृष्णतः ।
दशमी मधुकृष्णा च विन्ध्यदर्पनिषूदन ॥५५॥
मधुकृष्णैकादशी तु द्वादशी मधुकृष्णतः ।
मधुकृष्णत्रयोदश्या मधुकृष्णचतुर्दशी ॥५६॥

मधुशुक्ल तृतीया है और मधुशुक्ल चतुर्थिका है। मधु शुक्ला पञ्चमी और मधुशुक्ल षष्ठिका है ।५०। मधुशुक्ला सप्तमी और फिर मधु-शुक्ला अष्टमी है 'नवमी मधुशुक्ला है ।५१। मधुशुक्ला एकादशी और