संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 873, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें४६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
द्वादशी मधुशुक्ल है मधु शुक्ल त्रयोदशीमें तथा मधुशुक्ला चतुर्दशी है ।५२। मधुशुक्ला पोर्णमासी और मधुकृष्णा प्रथमा है । मधुकृष्णा द्वितीया और तृतीया मधुकृष्णिका है ।५३। चतुर्थी मधुकृष्णा और मधुकृष्णा पञ्चमी । षष्ठी मधुकृष्णा और सप्तमी मधु कृष्ण से है ।५४। मधुकृष्णा अष्टमी मधुकृष्ण से नवमी है । हे विन्ध्यदर्प निषूषदन ! दशमी मधुकृष्णा है ।५५। मधुकृष्णा एकादशी है तथा द्वादशी मधु कृष्ण से है । मधु कृष्ण त्रयोदशी से है और मधु कृष्ण चतुर्दशी है ।५६।
मध्वमा चेति विज्ञेयास्त्रिंशदेतास्तु शक्तयः । एवमेव प्रकारेण माधवाख्यो परिस्थितिः ॥५७
शुक्लप्रतिपदाद्यास्तु शक्तयस्त्रिंशदन्यकाः । मिलित्वा षष्टिसंख्यास्तु ख्याता वासन्तशक्तयः ॥५८
स्वैःस्वैर्मन्त्रैस्तत्र चक्रे पूजनीया विधानतः । वासन्तचक्रराजस्य सप्तावरणभूमयः ॥५९
षष्टिः स्युर्देवतास्तासु षष्टिभूमिषु संस्थिताः । विभज्य चार्चनीयाः स्युस्तत्तन्मन्त्रैस्तु साधकैः ॥६०
तथा वासन्तचक्रं स्यात्तथैवान्येषु च त्रिषु । देवतास्तु परं भिन्नाः शुक्रशुच्यादिभेदतः ॥६१
शक्तयः षष्टिसंख्याता ग्रीष्मचक्रे महोदयाः । एवं वर्षादिके चक्रे भेदान्नभनभस्यजान् ॥६२
षष्टिषष्टिसु शक्तीना चक्रेचक्रे प्रतिष्ठिताः । ग्रन्थविस्तारभीत्या तु तत्संख्यानाद्विरम्यते ॥६३
मधु अमा है—ये तीस शक्तियाँ हैं । इसी प्रकार से माधवाख्य के ऊपर में स्थित हैं ।५७। शुक्ल प्रतिपदा आदिक अन्य तीस शक्तियाँ हैं । ये सब मिलकर वासन्त शक्तियाँ साठ विख्यात हैं ।५८। अपने-अपने मन्त्रों के द्वारा वहाँ चक्र में वासन्त चक्रराज में वासन्त चक्रराज की सात आवरण भूमियाँ विधि से पूजन करने के योग्य हैं ।५९। साठ भूमियों में ये साठ देवता संस्थित हैं । साधकों के द्वारा विभाग करके उन-उन मन्त्रों से पूजन करने के योग्य हैं ।६०। उसी भांति से वासन्त चक्र तीन अन्यों में है और