संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] | ४६५
शुक्र शुच्यादि के भेद से देवता भिन्न हैं ।६१। शक्तियाँ संख्या में साठ हैं जो महोदया ग्रीष्म चक्र में हैं । इसी तरह से वर्षादिक चक्र में भेद से नभन-भस्यज हैं ।६२। ये साठ-साठ शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं । ग्रन्थ के विस्तार से भय से उनकी संख्या करने से विराम लिया जा रहा है ।६३।
आर्तव्याः शक्तयस्त्वेता ललिताभक्त सौख्यदाः । ललितापूजनध्यानजपस्तोत्रपरायणाः ॥६४॥ कल्पादिवाटिकाचक्रे सञ्चरंत्यो मदालसाः । स्वस्वपुष्पोत्थमधुभिस्तर्पयंत्यो महेश्वरीम् ॥६५॥ मिलित्वा चैव संख्याताः षट्युत्तरशतत्रयम् । एवं सप्तसु शालेषु पालिकाश्चक्रदेवताः ॥६६॥ नामकीर्तनपूर्वं तु प्रोक्तस्तुभ्यं प्रपृच्छते । अन्येषामपि शालानामुपादानं तु पूरकम् । विस्तारं तत्र शक्तिं च कथयाम्यवधारय ॥६७॥
ये शक्तियाँ ललिता देवी के सौख्य के देने वाली हैं इनका आहरण करना चाहिए । जो भी ललिता के पूजन ध्यान जप और स्तोत्र में परायण हैं ।६४। कल्पादि वाटिका के चक्र में मदालसा ये सञ्चरण किया करती हैं । अपने-अपने पुष्पों के मधु से ये महेश्वरी का तर्पण किया करती हैं ।६५। सब मिलकर तीन सौ साठ होती हैं । इसी तरह से सात सालों में चक्र देवता पालिका हैं ।६६। आपने पूछा है तो आपके सामने नामों का कीर्तन कर दिया है । अन्य शालाओं का उपादान पूरक है । उनका विस्तार और शक्ति कहता हूँ, आप अवधारण कीजिए ।६७।
॥ पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ॥
हयग्रीव उवाच- कथितं सप्तशालानां लक्षणं शिल्पिभिः कृतम् । अथ रत्नमयाः शालाः प्रकीर्त्यंतेऽवधारय ॥१॥ सुवर्णमयशालस्य पुष्परागमयस्य च । सप्तयोजनमात्रं स्यान्मध्येन्तरमुदाहृतम् ॥२॥