भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तत्र सिद्धाः सिद्धनार्यः खेलंति मदविह्वलाः ।
रसै रसायनैश्चापि खड्गैः पादांजनैरपि ॥३
ललितायां भक्तियुक्तास्तर्पयन्तो महाजनान् ।
वसन्ति विविधास्तत्र पिबन्ति मदिरारसान् ॥४
पुष्परागादिशालानां पूर्ववद्द्वारक्लृप्तयः ।
पुष्परागादिशालेषु कवाटार्गलगोपुरम् ।
पुष्परागादिजं ज्ञेयमुच्चैन्द्रादित्यभास्वरम् ॥५
हेमप्राकारचक्रस्य पुष्परागमयस्य च ।
अन्तरे या स्थली सापि पुष्परागमयी स्मृता ॥६
वक्ष्यमाणमहाशालाकक्षासु निखिलास्वपि ।
तद्वर्णाः पक्षिणस्तत्र तद्वर्णानि सरांसि च ॥७

श्री हयग्रीवजी ने कहा—शिल्पियों के द्वारा निर्मित सप्त शालाओं का लक्षण बता दिया गया है । इसके अनन्तर रत्नों से परिपूर्ण शालायें अब कीर्त्तित की जाती है उनका आप अवधारण कीजिए ।१। सुवर्ण से परिपूर्ण शाल और पुष्प रोगों से परिपूर्ण शाल का जो मध्य में अन्तर है वह सात योजन मात्र कहा गया है ।२। वहाँ पर सिद्ध और मद से विह्वल सिद्धों की नारियाँ खेला करती हैं । उनकी क्रीड़ा के साधन रस-रसायन-खड्ग और पादाञ्जन होते हैं ।३। ये ललिता देवी में भक्ति से युक्त हैं और महाजनों का तर्पण किया करती हैं । वहाँ पर अनेक प्रकार के वास करते हैं और मदिरारस का पान किया करते हैं ।३। पुष्पराज आदि की जो शालाएँ हैं उनके द्वारों की रचनाएं पूर्व की ही भाँति हैं । पुष्प राग प्रभृति की शालों में कपाट अर्गला और गोपुर हैं । यह सभी पुष्प राग आदि से समुत्पन्न है तथा इन्दु और सूर्य के समान ही परम भास्वर हैं ।५। हेम के प्राकार वाले चक्र का और पुष्परागों से परिपूर्ण का जो अन्तर है उसमें जो स्थल है वह भी पुष्परागों से परिपूर्ण है ऐसा ही कहा गया है ।६। आगे कहे जाने वाली महा शालाओं की कक्षाओं में समस्तों में भी उनके ही वर्ण वाले सब पक्षी हैं और उनके ही वर्णों वाले सब सरोवर हैं ।७।

तद्वर्णसलिला नद्यस्तद्वर्णाश्च मणिद्रुमाः ।