संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४६७
सिद्धजातिषु ये देवीमुपास्य विविधैः क्रमैः । त्यक्तवन्तो वपुः पूर्वं ते सिद्धास्तत्र सांगनाः ॥८ ललितामन्त्रजप्तारो ललिताक्रमतत्पराः । ते सर्वे ललितादेव्या नामकीर्तनकारिणः ॥९ पुष्परागमहाशालांतरे मारुतयोजने । पद्मरागमयः शालश्चतुरस्रः समंततः ॥१० स्थली च पद्मरागाढ्या गोपुराद्यं च तन्मयम् । तत्र चारणदेशस्थाः पूर्वदेहविनाशतः । सिद्धिं प्राप्ता महाराज्ञीचरणाम्भोजसेवकाः ॥११ चारणीनां स्त्रियश्चापि चार्वंग्यो मदलालसाः । गायन्ति ललितादेव्या गीतिबन्धान्मुहुर्मुहुः ॥१२ तत्रैव कल्पवृक्षाणां मध्यस्थवेदिकास्थिताः । भर्तृभिः सहचारिण्यः पिबन्ति मधुरं मधु ॥१३ पद्मरागमहाशालान्तरे मरुतयोजने । गोमेदकमहाशालः पूर्वशालासमाकृतिः । अतितुङ्गो हीरशालस्तयोर्मध्ये च हीरभूः ॥१४
वहां की समस्त नदियाँ भी उसी के वर्ण वाली हैं तथा मणियों के वृक्ष भी उसी वर्णों वाले हैं। अनेक प्रकार के क्रमों से जो सिद्ध जातियों में देवी की उपासना करने वाले थे पूर्व शरीर को त्याग कर अङ्गनाओं के साथ ही थे ।८। वे सभी ललितादेवी के मन्त्र का जाप करने वाले और ललिता के ही क्रम में परायण थे । वे सभी ललितादेवी के नाम का कीर्त्तन करने वाले ही थे ।९। पुष्पराग के महाशाल के अन्तर में मारुत योजन में पद्मरागमय एक शाल है जो सभी ओर से चौकोर है ।१०। वहाँ की जो स्थली है वह भी पद्मरागों से संयुत है और गोपुर आदि भी उसी पद्मराग से परिपूर्ण है । वहो पर चारण देश में संस्थित होने वाले अपने देह के विनाश हो जाने से सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं क्योंकि वे सभी महाराज्ञी के चरण कमलों के सेवक थे ।११। चारणों की स्त्रियाँ भी परम सुन्दर अङ्गों