भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वाली हैं और मद से अलस । वे सभी ललितादेवी के गीत बन्धों को वार-बार गाया करती हैं ।१२। वहीं पर कल्प वृक्षों के मध्य में जो वेदिकाएं थीं उनमें संस्थित होकर अपने भक्तों के साथ सहचरण करती हुए मधू य मधु का पान किया करती हैं ।१३। पद्मरागों के महाशाल के मध्य में मारुत योजन में गोमेद को महाशाल है और उसका आकार प्रकार भी के पूर्व के ही समान है । अत्यन्त ऊँचा हीरों का पाल है और उन दोनों के मध्य में ही रत्नों की ही भूमि भी है ।१४।

तत्र देवीं समभ्यर्च्य पूर्वजन्मनि कुम्भज । वसन्त्यप्सरसां वृन्दैः साकं गन्धर्वपुङ्गवाः ॥१५ महाराज्ञीगुणगणान्गायन्तो वल्लकीस्वनैः । कामभोगैकरसिकाः कामसन्निभविग्रहाः । सुकुमारप्रकृतयः श्रीदेवीभक्तिशालिनः ॥१६ गोमेदकस्य शालस्तु पूर्वशालसमाकृतिः । तदन्तरे योगिनीनां भैरवाणां च कोटयः । कालसंकर्षणीमंबां सेवन्ते तत्र भक्तितः ॥१७ गोमेदकमहाशालान्तरे मारुतयोजने । उर्वशी मेनका चैव रम्भा चालंबुषा तथा ॥१८ मञ्जुघोषा सुकेशी च पूर्वचित्तिघृताचिका । कृतस्तला च विश्वाची पुञ्जिकस्थलया सह ॥१९ तिलोत्तमेति देवानां वेश्या एतादृशोऽपराः । गन्धर्वैः सह नव्यानि कल्पवृक्षमधूनि च ॥२० पिबन्त्यो ललितादेवीं ध्यायन्त्यश्च मुहुर्मुहुः । स्वसौभाग्यविवृद्धयर्थं गुणयन्त्यश्च तन्मनुम् ॥२१

हे कुम्भज ! वहां पर देवी की भली भांति अर्चना करके परम श्रेष्ठ गन्धर्वों का समूह अप्सराओं के समुदायों के ही साथ में निवास किया करते हैं ।१५। वे सब्र वल्लकी वाद्य के शब्दों से महाराज्ञी के गुणगणों का गायन किया करते हैं । ये काम भोग में बड़े रसिक हैं तथा कामदेव के ही समान