भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पुष्पराग प्रकाशादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४६६

शरीरों वाले परमाधिक सुन्दर हैं। ये श्री देवी की भक्ति करने वाले हैं और इनकी प्रकृतियां भी परम सुकुमार होती हैं। १६। गोमेदों का जो शाल है वह भी पहिले शाल के ही सदृश आकार वाला है। उसके मध्य में करोड़ों योगिनियां और भैरवों की श्रेणियां विद्यमान हैं वहां पर वे भक्तिभाव से काल संकर्षिणी अम्बा की सेवा किया करते हैं। १७। गोमेदक शाल के मध्य में बहुत सी प्रमुख परम सुन्दरी अप्सराएं रहा करती हैं जो कि मारुत योजन में हैं। उर्वशी-मेनका-रम्भा-अलम्बुषा-मन्जुघोषा-सुकेशी-पूर्वचित्ति-घृताचिका-विश्वाची और पुञ्जिका स्थला-ये सभी वहीं पर रहती हैं। १८-१९। देवों की वेश्या तिलोत्तमा भी है और ऐसी अनेक दूसरी भी हैं। वे सब गन्धर्वों के साथ में रहकर कल्प वृक्षों के मधुओं का पान किया करती हैं। २०। तथा ललिता देवी का ध्यान बार-बार करती हैं। सौभाग्य की वृद्धि के लिए ही उस देवी के मन्त्र का गुणन किया करती हैं। २१।

चतुर्दशसु चोत्पन्ना स्थानेष्वप्सरसोऽखिलाः ।
तत्रैव देवीमर्चन्त्यो वसन्ति मुदिताशयाः ॥२२

अगस्त्य उवाच-
चतुर्दशापि जन्मानि तासामप्सरसां विभो ।
कीर्तय त्वं महाप्राज्ञ सर्वविद्यामहानिधे ॥२३

हयग्रीव उवाच-
ब्राह्मणो हृदयं कामो मृत्युरुर्वी च मारुतः ।
तपनस्य कराश्चन्द्रकरो वेदाश्च पावकः ॥२४
सौदामिनी च पीयूषं दक्षकन्या जलं तथा ।
जन्मनः कारणान्येतान्यामनांति मनीषिणः ॥२५
गीर्वाणगण्यनारीणां स्फुरत्सौभाग्यसंपदाम् ।
एताः समस्ता गंधर्वैः सार्धमर्चति चक्रिणीम् ॥२६
किन्नराः सह नारीभिस्तथा किंपुरुषा मुने ।
स्त्रीभिः सह मदोन्मत्ता हीरकस्थलमाश्रिताः ॥२७