संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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महाराज्ञीमन्त्रजापैर्विधूताशेषकल्मषाः ।
नृत्यंतश्चैव गायंतो वर्तंते कुम्भसम्भव ॥२८
चौदह स्थानों में समस्त अप्सराएं समुत्पन्न हुई हैं। वहीं पर परमानन्द से सुसम्पन्न होकर देवी का अर्चन करती हुईं निवास किया करती हैं।२२। अगस्त्यजी ने कहा—हे विभो ! आप तो समस्त विद्याओं के निधि हैं। हे महाप्राज्ञ ! उन अप्सराओं के चौदहों जन्मों का आप वर्णन कीजिए।२३। श्री हयग्रीव ने कहा—ब्राह्मण—हृदय—काम—मृत्यु—उर्वी—मारुत-तपन के कर—चन्द्रकर—वेद—पावक—सौदामिनी—पीयूष—दक्ष कन्या-जल-ये ही मनीषी गण जन्म के कारण माना करते हैं।२४-२५। स्फुरित सौभाग्य की सम्पदा वाली देवगणों में मुख्यों की नारियों की ये समस्त गन्धर्वों के ही साथ में चक्रिणी की अर्चना किया करती हैं।२६। हे मुने ! अपनी नारियों के साथ किन्नर तथा किम्पुरुष अपनी स्त्रियों के सहित मद से उन्मत्त होते हुए उस हीरों के स्थल में आश्रम लिए हुए हैं।२७। हे कुम्भसम्भव ! महाराज्ञी के मन्त्र के जापों से समस्त कल्मषों को दूर कर देने वाले नृत्य करते हुए और गान करते हुए विद्यमान रहा करते हैं।२८।
तत्रैव हीरकक्षोण्यां वज्रा नाम नदी मुने ।
वज्राकारैर्निबिडिता भासमाना तटद्रुमैः ॥२९
वज्ररत्नेकसिकता वज्रद्रवमयोदका ।
सदा वहति सा सिंधुः परितस्तत्र पावनी ॥३०
ललितापरमेशान्यां भक्ता ये मानवोत्तमाः ।
ते तस्या उदकं पीत्वा वज्ररूपकलेवराः ।
दीर्घायुषश्च नीरोगा भवन्ति कलशोद्भव ॥३१
भंडासुरेण गलिते मुक्ते वज्रे शतक्रतुः ।
तस्यास्तीरे तपस्तेपे वज्रेशीं प्रति भक्तिमान् ॥३२
तज्जवलादुदिता देवी वज्रं दत्त्वा बलद्विषे ।
पुनरंतर्दधे सोऽपि कृतार्थः स्वर्गमेयिवान् ॥३३
अथ वज्राख्यशालस्यांतरे मारुतयोजने ।
वैदूर्यंशाल उत्तुंगः पूर्ववद्गोपुरान्वितः