संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४७१
स्थली च तत्र वैडूर्यनिर्मिता भास्वराकृतिः ॥३४ पातालवासिनो ये ये श्रीदेव्यर्चनसाधकाः । ते सिद्धमूर्त्तयस्तत्र वसन्ति सुखमेदुराः ॥३५
हे मुने ! वहीं पर हीरों की भूमि में एक वज्र नाम वाली नदी है। उसके तट पर जो द्रुम हैं वे वज्राकार हैं। उनसे वह निविड़ित है ऐसी ही भासमान होती है ।२६। वह नदी परम पावनी सदा ही बहती रहती है और सभी ओर उसका बहाव रहता है। उसका जल ही ऐसा प्रतीत होता है कि वज्रों से परिपूर्ण है तथा उसकी सिकता भी वज्र (हीरा) रत्नों का ही मुख्य भाग है ।३०। परमेशानी ललिता के जो मानव परम भक्त हैं वे ही उस नदी के जल का पान करके वज्र स्वरूप कलेवरों वाले हो जाया करते हैं। वे दीर्घ आयु वाले नीरोग हे कलशोद्भव ! हुआ करते हैं ।३१। भण्डासुर के द्वारा गलित और वज्र के मुक्त होने पर इन्द्रदेव ने वज्रेशी के चरणों में भक्ति भाव से उस नदी के तट पर तपश्चर्या की थी ।३२। उसके जल से समुदित हुई देवी ने इनके लिए वज्र दिया था। फिर वह अन्तर्हित हो गयी थीं और वह इन्द्र भी कृतार्थ होकर स्वर्ग को चला गया था ।३३। इसके अनन्तर वज्राख्य शाल के अन्तर में माहत योजन में ठीक बहुत ऊँचा वैदर्य शाल है और उसका भी गोपुर तथा द्वार पूर्व के ही समान है। वहाँ की स्थली भी वैदूर्यों से निर्मित है और उसकी आकृति परम भास्वर है ।३४। जो भी पाताल के निवासी श्री देवी के साधक प्राणी हैं वे ही सिद्ध मूर्ति वाले सुख से मेदुर होकर वहाँ पर निवास किया करते हैं ।३५।
शेषकर्कोटकमहापद्मवासुकिशंखकाः । तक्षकः शङ्खचूडश्च महादन्तो महाफणः ॥३६ इत्येवमादयस्तत्र नागानागस्त्रियोऽपि च । बलीन्द्रप्रमुखानां च दैत्यानां धर्मवर्तिनाम् । गणस्तत्र तथा नागैः सार्धं वसति सांगनाः ॥३७ ललितामन्त्रजप्तारो ललिताशास्त्रदीक्षिताः । ललितापूजका नित्यं वसन्त्यसुरभोगिनः ॥३८ तत्र वैडूर्यकक्षायां नद्यः शिशिरपायसः । सरांसि विमलांभांसि सारसालंकृतानि च ॥३६