भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भवनानि तु दिव्यानि वैदूर्यमणिमन्ति च । तेषु क्रीडन्ति ते नागा असुराश्च सहांगनाः ॥४०॥ वैदूर्याख्यमहाशालान्तरे मारुतयोजने । इन्द्रनीपमयः शालश्चक्रवाल इवापरः ॥४१॥ तन्मध्यकक्षाभूमिश्च नीलरत्नमयी मुने । तत्र नद्यश्च मधुराः सरांसि शिशिराणि च । नानाविधानि भोग्यानि वस्तूनि सरसान्यपि ॥४२॥

शेष—कर्कोटक—महापद्म—वासुकि—शंखक—तक्षक—शंखचूड़—महादन्त—महाफण—इत्येवमादिक नाग वहाँ पर तथा उन नागों की स्त्रियाँ भी हैं और बलेन्द्र प्रभृती धर्मवर्ती दैत्यों का गण भी अपनी अङ्गनाओं के साथ वहाँ पर नागों के सहित वास किया करते हैं ।३६-३७। ये सभी ललिता देवी के शास्त्र में दीक्षित हैं और ललिता देवी की पूजा करने वाले वहाँ पर निवास किया करते हैं ।३८। वहाँ पर वैदूर्य मणियों की कक्षा में नदियाँ भी शिशिर जलों वाली हैं । सरोवर भी विमल जलों वाले तथा सारस पक्षियों से विभूषित हैं ।३६। वहाँ पर जो भवन हैं वे परम दिव्य हैं तथा वैदूर्यमणियों के ही द्वारा निर्मित हैं । उन भवनों में नागों के समुदाय और अपनी अङ्गनाओं के साथ लेकर असुरगण क्रीड़ा किया करते हैं ।४०। वैदूर्याख्य महाशाल के अन्तर में मारुत योजन में एक इन्द्रनील मणियों से परिपूर्ण-दूसरे चक्रवाल के ही तुल्य शाल है ।४१। उसके मध्य की कक्षा की भूमि भी हे मुने ! नील रत्नमयी है और वहाँ पर नदियाँ मधुर हैं और सरोवर भी शिशिर हैं । वहाँ पर अनेक प्रकार की परम दिव्य एवं सरस भोगने के योग्य वस्तुएँ भी हैं ।४२।

ये भूलोकगता मर्त्या ललितामन्त्रसाधकाः । ते देहान्ते शक्रनीलकक्षां प्राप्य वसन्ति वै ॥४३॥ तत्र दिव्यानि वस्तूनि भुञ्जाना वनितासखाः । पिबन्तो मधुरं मद्यं नृत्यन्तो भक्तिनिर्भराः ॥४४॥ सरस्सु तेषु सिंधूनां कुलेषु कलशोद्भव । लतागृहेषु रम्येषु मन्दिरेषु महद्धिषु ॥४५॥