संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४७३
सदा जपंतः श्रीदेवी पठन्तश्चापि तद्गुणान् ।
निवसंति महाभागा नारीभिः परिवेष्टिताः ॥४६॥
कर्मक्षये पुनर्यांति भूलोके मानुषीं तनुम् ।
पूर्ववासनया युक्ताः पुनरर्चंति चक्रिणीम् ।
पुनर्यांति श्रीनगरे शक्रनीलमहास्थलीम् ॥४७॥
तत्स्थलस्यैव संपर्काद् रागद्वेषसमुद्भवैः ।
नीलैर्भावैः सदा युक्ता वर्तंते मनुजा मुने ॥४८॥
ये पुनर्ज्ञानिनो मर्त्या निर्द्वंद्वा नियतेन्द्रियाः ।
ते मुने विस्मयाविष्टाः संविशंति महेश्वरीम् ॥४९॥
जो मानव भूलोक के मध्य में हैं और ललितादेवी के मन्त्र की साधना करने वाले हैं वे अपने देहों के अन्त में इन्द्र देव की नील कक्ष्या को प्राप्त करके वहाँ पर ही निवास किया करते हैं ।४३। वहाँ पर अपनी वनिताओं के साथ में दिव्य वस्तुओं का भोग करते हुए मधुर मद्य का पान किया करते हैं और भक्तिभाव में निर्भर होते हुए नृत्य किया करते हैं ।४४। हे कलशोद्भव ! उन सरोवरों में और नदियों के समुदायों में—लताओं के गृहों में तथा रम्य एवं महान् ऋद्धियों वाले मन्दिरों में वे सदा श्रीदेवी का जाप करते और उसके ही गुणगणों को पढ़ा करते हैं। ये महान् भाग वाले पुरुष अपनी नारियों से परिवेष्टित होकर निवास किया करते हैं ।४५-४६। जब इनके पुण्य कर्मों का क्षय हो जाता है तो उस स्वर्गीय सुख का त्याग करके फिर इसी मनुष्य का देह प्राप्त किया करते हैं। पूर्व की वासना उनकी आत्मा में बनी ही रहा करती है और वे पुनः चक्रिणी का अर्चन किया करते हैं । फिर वे श्रीनगर में शक्रनील महास्थली में गमन किया करते हैं। ।४७। हे मुने ! उस स्थल के सम्पर्क से ही राग-द्वेष से समुत्पन्न भावों से जो नील होते हैं वे सर्वदा युक्त होते हैं ऐसे ही मनुष्य रहते हैं ।४८। जो ज्ञान वाले मनुष्य होते हैं वे निर्द्वन्द्व और नियत इन्द्रियों वाले हैं। हे मुने ! वे विस्मय युक्त होकर महेश्वरी में प्रवेश किया करते हैं ।४९।
इन्द्रनीलाख्यशालस्यांतरे मारुतयोजने ।
मुक्ताफलमयः शालः पूर्ववद्गोपुरान्वितः ॥५०॥