भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 883, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 883

४७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अत्यंतभास्वरा स्वच्छा तयोर्मध्ये स्थली मुने ।
सर्वापि मुक्ताखचिताः शिशिरातिमनोहराः ॥५१॥
ताम्रपर्णी महापर्णी सदा मुक्ताफलोदका ।
एवमाद्या महानद्यः प्रवहन्ति महास्थले ॥५२॥
तासां तीरेषु सर्वेऽपि देवलोकनिवासिनः ।
वसंति पूर्वजनुषि श्रीदेवीमन्त्रसाधकाः ॥५३॥
पूर्वाद्यष्टसु भागेषु लोकाः शक्रादिगोचराः ।
मुक्ताशालस्य परितः संयुज्य द्वारनेशकान् ॥५४॥
मुक्ताशालस्य नीलस्य द्वारयोर्मध्यदेशतः ।
पूर्वभागे शक्रलोकस्तत्कोणे वह्निलोकभूः ॥५५॥
याम्यभागे यमपुरं तत्र दण्डधरः प्रभुः ।
सर्वत्र ललितामन्त्रजापी तीव्रस्वभाववान् ॥५६॥

इन्द्रनील नामक शाल के अन्तर में मरुत योजन में एक मुक्ताफलों से परिपूर्ण शाल है और वह पहिली भांति ही गोपुर से समन्वित है ।५०। हे मुने ! उन दोनों के मध्य में अत्यधिक भास्वर स्थली है जो परम स्वच्छ है । वह सब ही मुक्ताओं से खचित है और शिशिर से अतीव मनोहर है । ।५१। उस महा स्थल में ताम्रपर्णी—महापर्णी आदि महा नदियाँ हैं जिनका जल मुक्ता फलों के ही समान हैं । ऐसी नदियाँ सर्वदा वहाँ बहा करती हैं । ।५२। उनके तटों पर सभी देवलोक के निवासी वास किया करते हैं जो अपने पूर्वजन्म में श्रीदेवी के मन्त्र की साधना करने वाले हैं ।५३। पूर्व आदि आठ भागों में शक्रादि गोचर लोक हैं जो मुक्ता शाल के सब ओर द्वार-देशकों को संयोजित करते हैं ।५४। मुक्ता शाल नील के द्वारों में मध्य देश से पूर्व भाग में इन्द्र लोक हैं और उसके कोण में वह्निलोक की भूमि है । ।५५। याम्य भाग में यम राज का नगर है । वहाँ पर दण्डधर प्रभु निवास किया करते हैं । सर्वत्र ललिता के मन्त्र का जाप करने वाले हैं और वीन स्वभाव वाले हैं ।५६।

आज्ञाधरो यमभटैश्चित्रगुप्तपुरोगमैः ।
सार्धं नियमयत्येव श्रीदेवीसमयं गुहः ॥५७॥