भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताहार वर्णन ] [ ४७५

गुहसप्तान्दुराचाराँल्ललिताद्वेषकारिणः । कूटभक्तिपरान्मूर्खान् स्तब्धानत्यंतदर्पितान् ॥५८ मन्त्रचोरान्कुमन्त्रांश्च कुविद्यानघसंश्रयान् । नास्तिकान्पापशीलांश्च वृथैव प्राणिहिंसकान् ॥५९ स्त्रीद्विष्टाँल्लोकविद्विष्टान्पाषंडानां हि पालिनः । कालसूत्रे रौरवे च कुम्भीपाके च कुम्भज ॥६० असिपत्रवने घोरे कृमिभक्षे प्रतापने । लालाक्षेपे सूचिवेधे तथैवांगारपातने ॥६१ एवमादिषु कष्टेषु नरकेषु घटोद्भव । पातयत्याज्ञया तस्याः श्रीदेव्याः स महौजसः ॥६२ तस्यैव पश्चिमे भागे निर्ऋतिः खड्गधारकः । राक्षसं लोकमाश्रित्य वर्तते ललितार्चकः ॥६३

चित्रगुप्त जिनमें अग्रणी है ऐसे यमराज के भटों के साथ आज्ञा के धारण करने वाले गुह श्री देवी के समय को नियमित किया करते हैं ।५७। जो गुह के द्वारा शप्त हैं—दुराचारी हैं—ललिता के साथ द्वेष करने वाले हैं—कूटभक्ति में तत्पर हैं—मूर्ख हैं—स्तब्ध हैं और बहुत ही अधिक दर्प वाले हैं—मन्त्र चोर हैं—कुत्सित मन्त्र वाले हैं—कुविद्या के पाप का संश्रय करने वाले हैं—नास्तिक हैं—पाप कर्मों के करने वाले हैं उनको भिन्न-भिन्न नरकों में डाल दिया जाता है। उन नरकों के नाम ये हैं—कालसूत्र-रौरव-कुम्भीपाक-वह महान ओज वाला उसी श्री देवी की आज्ञा से हे घटोद्भव ! इन नरकों में डाल दिया करता है ।५८-६२। उसके ही पश्चिम भाग में खड्ग का धारण करने वाला निर्ऋति है। वह भी श्री ललिता का अर्चक राक्षस लोक का आश्रय ग्रहण करके रहा करते हैं ।६३।

तस्य चोत्तरभागे तु द्वारयोरंतरस्थले । वारुणं लोकमाश्रित्य वरुणे वर्तते सदा ॥६४ वारुण्यास्वादनोन्मत्तः शुभ्रांगो झषवाहनः । सदा श्रीदेवतामंत्रजापी श्रीक्रमसाधकः ॥६५