संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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श्रीदेवतादर्शनस्य द्वेषिणः पाशबन्धनैः ।
बद्ध्वा नयत्यधोमार्गं भक्तानां बन्धमोचकः ॥६६॥
तस्य चोत्तरकोणेषु वायुलोको महाद्युतिः ।
तत्र वायुशरीराश्च सदानन्दमहोदयाः ॥६७॥
सिद्धा दिव्यर्षयश्चैव पवनाभ्यासिनोऽपरे ।
गोरक्षप्रमुखाश्चान्ये योगिनो योगतत्पराः ॥६८॥
एतैः सह महासत्त्वस्तत्र श्रीमारुतेश्वरः ।
सर्वथा भिन्नमूर्त्तिश्च वर्तते कुम्भसम्भव ॥६९॥
इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्णा तस्य शक्तयः ।
तिस्रो मारुतनाथस्य सदा मधुमदालसाः ॥७०॥
उसके उत्तर भाग में दोनों के मध्य स्थल में वारुण लोक का आश्रयके लेकर सदा वरुण देवता रहा करता है ॥६४॥ यह वारुणी के अस्वादन में मत्त रहता है । इसका परमशुभ्र है और वृष इसका वाहन है । यह भी श्रीदेवी के मन्त्र के जप करने वाला है और श्री के क्रम की साधन करने वाला है ।६५। जो भी श्री देवता से द्वेष करने वाले हैं उनको पाशों के बन्धनों से बाँधकर भक्तों के बन्धन को छुड़ाने वाला यह अधो मार्ग में पहुँचा दिया करता है ।६६। और उसके उत्तर कोने में महती द्युति वाला वायुलोक है । वहाँ पर वायु के ही शरीरों वाले तथा सर्वदा आनन्द से पूर्ण महोदय सिद्ध-गण और दिव्य ऋषिगण तथा दूसरे पवन के अभ्यास वाले—गो की रक्षा में प्रधान—योग में परायण योगी रहा करते हैं और इन्हीं के साथ महान सत्त्व वाला श्रीमारुतेश्वर निवास करते हैं । इनकी मूर्ति सर्वथा भिन्न है ।६७-६९। हे कुम्भ-सम्भव ! इडा-पिङ्गला और सुषुम्णा इसकी शक्तियाँ हैं । ये तीन शक्तियाँ मरुतनाथ की सर्वदा मधु के मद से अलस रहा करती हैं ।७०।
ध्वजहस्तो मृगवरे वाहने महति स्थितः ।
ललितायजनध्यानक्रमपूजनतत्परः ॥७१॥
आनन्दपूरिताङ्गीभिरन्याभिः शक्तिभिर्वृतः ।
स मारुतेश्वरः श्रीमान्सदा जपति चक्रिणीम् ॥७२॥
तेन सत्त्वेन कल्पान्ते त्रैलोक्यं सचराचरम् ।