भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४७७

परागमयतां नीत्वा विनोदयति तत्क्षणात् ॥७३ तस्य सत्वस्थ सिद्ध्यर्थं तानेव ललितेश्वरीम् । पूजयन्भावयन्नास्ते सर्वाभरणभूषितः ॥७४ तल्लोकपूर्वभागस्थे यक्षलोके महाद्युतिः । यक्षेंद्रो वसति श्रीमांस्तद्द्वारद्रुममध्यगः ॥७५ निधिभिश्च नवाकारैर्ऋद्धिवृद्ध्यादिशक्तिभिः । सहितो ललिताभक्तान्पूरयन्धनसम्पदा ॥७६ यक्षीभिश्च मनोज्ञाभिरनुकूलप्रवृत्तिभिः । विविधैर्मधुभेदैश्च सम्पूजयति चक्रिणीम् ॥७७

वह मरुतेश्वर श्रेष्ठ सिंह के वाहन पर विराजमान हैं—हाथ में ध्वजा लिए हुए हैं और ललिता देवी के यजन-ध्यान और अर्चन के क्रम में परायण रहते हैं ।७१। आनन्द से पूरित अङ्गों वाली अन्य शक्तियों से समावृत रहते हैं । वह श्रीमान मरुतेश्वर सदा चक्रिणी का जाप किया करते हैं ।७२। उसी के सत्त्व से चराचर त्रैलोक्य को कल्प के अन्त में परागमयता को प्राप्त करके उसी क्षण में विनोदित किया करते हैं ।७३। उसी सत्त्व की सिद्धि के लिए उसी ललितेश्वरी की भावना तथा अर्चना करते हुए समस्त आभरणों से भूषित हैं ।७४। उस लोक के पूर्व भाग में यक्षलोक है उसमें महान कान्ति सम्पन्न यक्षराज निवास किया करते हैं । यह श्री सम्पन्न हैं और उसके द्वारों के मध्य में स्थित हैं ।७५। निधियों के द्वारा जो नौ हैं तथा ऋद्धि, वृद्धि आदि शक्तियों के द्वारा ललिता के भक्तों की धन सम्पदा से पूर्ति किया करते हैं ।७६। अनुकूल प्रवृत्ति वाली परम सुन्दरी पत्नियों के सहित अनेक प्रकार के मधु के भेदों से उसी चक्रिणी देवी की सविधि पूजा किया करते हैं ।७७।

मणिभद्रः पूर्णभद्रो मणिमान्माणिकन्धरः । इत्येवमादयो यक्षसेनान्यस्तत्र सन्ति वै ॥७८ तल्लोकपूर्वभागे तु रुद्रलोको महोदयः । अनर्घ्यरत्नखचितस्तत्र रुद्रोऽधिदेवता ॥७९ सदैव मन्युना दीप्तः सदा बद्धमहेषुधिः ।