संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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स्वसमानैर्महासत्त्वैर्लोकनिर्वाहदक्षिणैः ॥८० अधिज्यकार्मुकेंदक्षः षोडशावरणस्थितः । आवृतः सततं वक्त्रैर्जपञ्छ्रीदेवतामनुम् ॥८१ श्रीदेवीध्यानसम्पन्नः श्रीदेवीपूजनोत्सुकः । अनेककोटिरुद्राणीगणमंडितपार्श्वभूः ॥८२ ताश्च सर्वाः प्रदीप्तांग्यो नवयौवनगर्विताः । ललिताध्याननिरताः सदासवमदालसाः ॥८३ ताभिश्च साकं स श्रीमान्महारुद्रस्त्रिशूलभृत् । हिरण्यबाहुप्रमुखै रुद्रैरन्यैर्निषेवितः ॥८४
वहाँ पर बहुत से यक्षराज के सेनानी गण भी निवास किया करते हैं जिनके प्रमुख नाम मणि भद्र-पूर्ण भद्र-मणिमान और मणिकन्धर हैं ।७८। उस लोक के पूर्व भाग में महान उदय वाला रुद्रलोक भी हैं। वेशकी मती रत्नों से खचित वहाँ पर रुद्र उसके अधिष्ठाता देव हैं ।७९। वह सदा हीं क्रोध से दीप्त रहता है और सर्वदा धनुष को चढ़ाये हुए रहते हैं । अपने ही सदृश-दक्ष-षोडश आवरणों में स्थित वक्त्रों से निरन्तर आवृत्त श्री देवता के मन्त्र का जाप किया करता है ।८०-८१। श्री देवी के ध्यान से सम्पन्न और श्री देवी के पूजन में समुत्सुक-बहुत सी करोड़ों रुद्राणियों के गणों से मण्डित पार्श्व की भूमि वाले हैं ।८२। वे सभी रुद्राणियाँ भी प्रदीप्त अङ्गों वाली हैं और नवीन यौवन के गर्व से अन्वित हैं। वे सभी श्री ललिता के ध्यान में निमग्न रहा करती हैं तथा सर्वदा आसव के मद से अलग हैं ।८३। उन सबके साथ में श्रीमान् महान् रुद्र त्रिशूल के धारी हैं और हिरण्य बाहु जिनमें प्रमुख हैं ऐसे अन्य अनेक रुद्रों के द्वारा निषेवित हैं ।८४।
ललितादर्शनभ्रष्टानुद्धतान्गुरुधिक्कृतान् । शूलकोट्या विनिर्भिद्य नेत्रोत्थैः कटुपावकैः ॥८५ दहंस्तेषां वधूर्भृत्यान्प्रजाश्चैव विनाशयन् । आज्ञाधरो महावीरो ललिताज्ञाप्रपालकः ॥८६ रुद्रलोकेऽतिरुचिरे वर्तते कुम्भसम्भव । महारुद्रस्य तस्यर्षे परिवाराः प्रमाथिनः ॥८७