संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४७६
ये रुद्रास्तानसंख्यातान्को वा वक्तुं पटुर्भवेत् ।
ये रुद्रा अधिभूम्यां तु सहस्राणां सहस्रशः ॥८८
दिवि येऽपि च वर्तंते सहस्राणां सहस्रशः ।
येषामन्नमिषवश्चैव येषां वातास्तथेषवः ॥८९
येषां च वर्षमिषवः प्रदीप्ताः पिङ्गलेक्षणाः ।
अर्णवे चान्तरिक्षे च वर्तमाना महौजसः ॥६०
जटावंतो मधुष्मन्तो नीलग्रीवा विलोहिताः ।
ये भूतानामधिभुवो विशिखासः कपर्दिनः ॥६१
ललिता के दर्शन से भ्रष्ट—उद्धत और गुरु के द्वारा धिक्कृत हैं उनको शूल की कोटि से भेदन करके विनष्ट कर देता है। तथा नेत्रों से समुत्पन्न तीक्ष्ण पावक से उनके भृत्य-वधू और सन्तति का दाह करके विनाश कर दिया करता है। यह महावीर आज्ञा का पालक और ललिता का आदेश करने वाला है ।८५-८६। हे कुम्भसम्भव ! यह अतीव सुरम्य रुद्रलोक में विद्यमान रहता है। हे ऋषे ! उस महारुद्र के परिवार प्रमाथी हैं ।८७। जो भी रुद्र हैं वे अगणित हैं ऐसा कोई भी पटु नहीं है कि उनकी गणना कर सके। जो रुद्र भूमि में हैं वे भी सहस्रों ही हैं ।८८। और जो दिवलोक में हैं वे भी हजारों ही हैं। जिनके अन्नमिष हैं और जिनके वात तथा इषु हैं ।८९। और जिनके वर्ष इषु हैं—ये परम प्रदीप्त हैं तथा इनके नेत्र पिङ्गल वर्ण के हैं। ये महान ओज वाले सागर में—अन्तरिक्ष में भी वर्त्तमान रहा करते ।६०। ये जटाजूट धारी हैं—मधुमान हैं—इनकी ग्रीवा नील वर्ण की है और विलोहिव हैं। ये भूतों के अधिभू हैं—विशिखा और कपर्दी हैं ।६१।
ये अन्नेषु विविध्यंति पात्रेषु पिबतो जनान् ।
ये पथां रथका रुद्रा ये च तीर्थनिवासिनः ॥६२
सहस्रसंख्या ये चान्ये सृकावंतो निषंगिणः ।
ललिताज्ञाप्रणेतारो दिशो रुद्रा वितस्थिरे ॥६३
ते सर्वे सुमहात्मानः क्षणाद्विश्वत्रयीवहाः ।
श्रीदेव्या ध्याननिष्णाताञ्छ्रीदेवीमन्त्रजापिनः ॥६४