भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पुष्पराग प्रकाशादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४६६

शरीरों वाले परमाधिक सुन्दर हैं। ये श्री देवी की भक्ति करने वाले हैं और इनकी प्रकृतियां भी परम सुकुमार होती हैं। १६। गोमेदों का जो शाल है वह भी पहिले शाल के ही सदृश आकार वाला है। उसके मध्य में करोड़ों योगिनियां और भैरवों की श्रेणियां विद्यमान हैं वहां पर वे भक्तिभाव से काल संकर्षिणी अम्बा की सेवा किया करते हैं। १७। गोमेदक शाल के मध्य में बहुत सी प्रमुख परम सुन्दरी अप्सराएं रहा करती हैं जो कि मारुत योजन में हैं। उर्वशी-मेनका-रम्भा-अलम्बुषा-मन्जुघोषा-सुकेशी-पूर्वचित्ति-घृताचिका-विश्वाची और पुञ्जिका स्थला-ये सभी वहीं पर रहती हैं। १८-१९। देवों की वेश्या तिलोत्तमा भी है और ऐसी अनेक दूसरी भी हैं। वे सब गन्धर्वों के साथ में रहकर कल्प वृक्षों के मधुओं का पान किया करती हैं। २०। तथा ललिता देवी का ध्यान बार-बार करती हैं। सौभाग्य की वृद्धि के लिए ही उस देवी के मन्त्र का गुणन किया करती हैं। २१।

चतुर्दशसु चोत्पन्ना स्थानेष्वप्सरसोऽखिलाः ।
तत्रैव देवीमर्चन्त्यो वसन्ति मुदिताशयाः ॥२२

अगस्त्य उवाच-
चतुर्दशापि जन्मानि तासामप्सरसां विभो ।
कीर्तय त्वं महाप्राज्ञ सर्वविद्यामहानिधे ॥२३

हयग्रीव उवाच-
ब्राह्मणो हृदयं कामो मृत्युरुर्वी च मारुतः ।
तपनस्य कराश्चन्द्रकरो वेदाश्च पावकः ॥२४
सौदामिनी च पीयूषं दक्षकन्या जलं तथा ।
जन्मनः कारणान्येतान्यामनांति मनीषिणः ॥२५
गीर्वाणगण्यनारीणां स्फुरत्सौभाग्यसंपदाम् ।
एताः समस्ता गंधर्वैः सार्धमर्चति चक्रिणीम् ॥२६
किन्नराः सह नारीभिस्तथा किंपुरुषा मुने ।
स्त्रीभिः सह मदोन्मत्ता हीरकस्थलमाश्रिताः ॥२७

४७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

महाराज्ञीमन्त्रजापैर्विधूताशेषकल्मषाः ।
नृत्यंतश्चैव गायंतो वर्तंते कुम्भसम्भव ॥२८

चौदह स्थानों में समस्त अप्सराएं समुत्पन्न हुई हैं। वहीं पर परमानन्द से सुसम्पन्न होकर देवी का अर्चन करती हुईं निवास किया करती हैं।२२। अगस्त्यजी ने कहा—हे विभो ! आप तो समस्त विद्याओं के निधि हैं। हे महाप्राज्ञ ! उन अप्सराओं के चौदहों जन्मों का आप वर्णन कीजिए।२३। श्री हयग्रीव ने कहा—ब्राह्मण—हृदय—काम—मृत्यु—उर्वी—मारुत-तपन के कर—चन्द्रकर—वेद—पावक—सौदामिनी—पीयूष—दक्ष कन्या-जल-ये ही मनीषी गण जन्म के कारण माना करते हैं।२४-२५। स्फुरित सौभाग्य की सम्पदा वाली देवगणों में मुख्यों की नारियों की ये समस्त गन्धर्वों के ही साथ में चक्रिणी की अर्चना किया करती हैं।२६। हे मुने ! अपनी नारियों के साथ किन्नर तथा किम्पुरुष अपनी स्त्रियों के सहित मद से उन्मत्त होते हुए उस हीरों के स्थल में आश्रम लिए हुए हैं।२७। हे कुम्भसम्भव ! महाराज्ञी के मन्त्र के जापों से समस्त कल्मषों को दूर कर देने वाले नृत्य करते हुए और गान करते हुए विद्यमान रहा करते हैं।२८।

तत्रैव हीरकक्षोण्यां वज्रा नाम नदी मुने ।
वज्राकारैर्निबिडिता भासमाना तटद्रुमैः ॥२९
वज्ररत्नेकसिकता वज्रद्रवमयोदका ।
सदा वहति सा सिंधुः परितस्तत्र पावनी ॥३०
ललितापरमेशान्यां भक्ता ये मानवोत्तमाः ।
ते तस्या उदकं पीत्वा वज्ररूपकलेवराः ।
दीर्घायुषश्च नीरोगा भवन्ति कलशोद्भव ॥३१
भंडासुरेण गलिते मुक्ते वज्रे शतक्रतुः ।
तस्यास्तीरे तपस्तेपे वज्रेशीं प्रति भक्तिमान् ॥३२
तज्जवलादुदिता देवी वज्रं दत्त्वा बलद्विषे ।
पुनरंतर्दधे सोऽपि कृतार्थः स्वर्गमेयिवान् ॥३३
अथ वज्राख्यशालस्यांतरे मारुतयोजने ।
वैदूर्यंशाल उत्तुंगः पूर्ववद्गोपुरान्वितः

पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४७१

स्थली च तत्र वैडूर्यनिर्मिता भास्वराकृतिः ॥३४ पातालवासिनो ये ये श्रीदेव्यर्चनसाधकाः । ते सिद्धमूर्त्तयस्तत्र वसन्ति सुखमेदुराः ॥३५

हे मुने ! वहीं पर हीरों की भूमि में एक वज्र नाम वाली नदी है। उसके तट पर जो द्रुम हैं वे वज्राकार हैं। उनसे वह निविड़ित है ऐसी ही भासमान होती है ।२६। वह नदी परम पावनी सदा ही बहती रहती है और सभी ओर उसका बहाव रहता है। उसका जल ही ऐसा प्रतीत होता है कि वज्रों से परिपूर्ण है तथा उसकी सिकता भी वज्र (हीरा) रत्नों का ही मुख्य भाग है ।३०। परमेशानी ललिता के जो मानव परम भक्त हैं वे ही उस नदी के जल का पान करके वज्र स्वरूप कलेवरों वाले हो जाया करते हैं। वे दीर्घ आयु वाले नीरोग हे कलशोद्भव ! हुआ करते हैं ।३१। भण्डासुर के द्वारा गलित और वज्र के मुक्त होने पर इन्द्रदेव ने वज्रेशी के चरणों में भक्ति भाव से उस नदी के तट पर तपश्चर्या की थी ।३२। उसके जल से समुदित हुई देवी ने इनके लिए वज्र दिया था। फिर वह अन्तर्हित हो गयी थीं और वह इन्द्र भी कृतार्थ होकर स्वर्ग को चला गया था ।३३। इसके अनन्तर वज्राख्य शाल के अन्तर में माहत योजन में ठीक बहुत ऊँचा वैदर्य शाल है और उसका भी गोपुर तथा द्वार पूर्व के ही समान है। वहाँ की स्थली भी वैदूर्यों से निर्मित है और उसकी आकृति परम भास्वर है ।३४। जो भी पाताल के निवासी श्री देवी के साधक प्राणी हैं वे ही सिद्ध मूर्ति वाले सुख से मेदुर होकर वहाँ पर निवास किया करते हैं ।३५।

शेषकर्कोटकमहापद्मवासुकिशंखकाः । तक्षकः शङ्खचूडश्च महादन्तो महाफणः ॥३६ इत्येवमादयस्तत्र नागानागस्त्रियोऽपि च । बलीन्द्रप्रमुखानां च दैत्यानां धर्मवर्तिनाम् । गणस्तत्र तथा नागैः सार्धं वसति सांगनाः ॥३७ ललितामन्त्रजप्तारो ललिताशास्त्रदीक्षिताः । ललितापूजका नित्यं वसन्त्यसुरभोगिनः ॥३८ तत्र वैडूर्यकक्षायां नद्यः शिशिरपायसः । सरांसि विमलांभांसि सारसालंकृतानि च ॥३६

४७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भवनानि तु दिव्यानि वैदूर्यमणिमन्ति च । तेषु क्रीडन्ति ते नागा असुराश्च सहांगनाः ॥४०॥ वैदूर्याख्यमहाशालान्तरे मारुतयोजने । इन्द्रनीपमयः शालश्चक्रवाल इवापरः ॥४१॥ तन्मध्यकक्षाभूमिश्च नीलरत्नमयी मुने । तत्र नद्यश्च मधुराः सरांसि शिशिराणि च । नानाविधानि भोग्यानि वस्तूनि सरसान्यपि ॥४२॥

शेष—कर्कोटक—महापद्म—वासुकि—शंखक—तक्षक—शंखचूड़—महादन्त—महाफण—इत्येवमादिक नाग वहाँ पर तथा उन नागों की स्त्रियाँ भी हैं और बलेन्द्र प्रभृती धर्मवर्ती दैत्यों का गण भी अपनी अङ्गनाओं के साथ वहाँ पर नागों के सहित वास किया करते हैं ।३६-३७। ये सभी ललिता देवी के शास्त्र में दीक्षित हैं और ललिता देवी की पूजा करने वाले वहाँ पर निवास किया करते हैं ।३८। वहाँ पर वैदूर्य मणियों की कक्षा में नदियाँ भी शिशिर जलों वाली हैं । सरोवर भी विमल जलों वाले तथा सारस पक्षियों से विभूषित हैं ।३६। वहाँ पर जो भवन हैं वे परम दिव्य हैं तथा वैदूर्यमणियों के ही द्वारा निर्मित हैं । उन भवनों में नागों के समुदाय और अपनी अङ्गनाओं के साथ लेकर असुरगण क्रीड़ा किया करते हैं ।४०। वैदूर्याख्य महाशाल के अन्तर में मारुत योजन में एक इन्द्रनील मणियों से परिपूर्ण-दूसरे चक्रवाल के ही तुल्य शाल है ।४१। उसके मध्य की कक्षा की भूमि भी हे मुने ! नील रत्नमयी है और वहाँ पर नदियाँ मधुर हैं और सरोवर भी शिशिर हैं । वहाँ पर अनेक प्रकार की परम दिव्य एवं सरस भोगने के योग्य वस्तुएँ भी हैं ।४२।

ये भूलोकगता मर्त्या ललितामन्त्रसाधकाः । ते देहान्ते शक्रनीलकक्षां प्राप्य वसन्ति वै ॥४३॥ तत्र दिव्यानि वस्तूनि भुञ्जाना वनितासखाः । पिबन्तो मधुरं मद्यं नृत्यन्तो भक्तिनिर्भराः ॥४४॥ सरस्सु तेषु सिंधूनां कुलेषु कलशोद्भव । लतागृहेषु रम्येषु मन्दिरेषु महद्धिषु ॥४५॥

[ पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४७३

सदा जपंतः श्रीदेवी पठन्तश्चापि तद्गुणान् ।
निवसंति महाभागा नारीभिः परिवेष्टिताः ॥४६॥
कर्मक्षये पुनर्यांति भूलोके मानुषीं तनुम् ।
पूर्ववासनया युक्ताः पुनरर्चंति चक्रिणीम् ।
पुनर्यांति श्रीनगरे शक्रनीलमहास्थलीम् ॥४७॥
तत्स्थलस्यैव संपर्काद् रागद्वेषसमुद्भवैः ।
नीलैर्भावैः सदा युक्ता वर्तंते मनुजा मुने ॥४८॥
ये पुनर्ज्ञानिनो मर्त्या निर्द्वंद्वा नियतेन्द्रियाः ।
ते मुने विस्मयाविष्टाः संविशंति महेश्वरीम् ॥४९॥

जो मानव भूलोक के मध्य में हैं और ललितादेवी के मन्त्र की साधना करने वाले हैं वे अपने देहों के अन्त में इन्द्र देव की नील कक्ष्या को प्राप्त करके वहाँ पर ही निवास किया करते हैं ।४३। वहाँ पर अपनी वनिताओं के साथ में दिव्य वस्तुओं का भोग करते हुए मधुर मद्य का पान किया करते हैं और भक्तिभाव में निर्भर होते हुए नृत्य किया करते हैं ।४४। हे कलशोद्भव ! उन सरोवरों में और नदियों के समुदायों में—लताओं के गृहों में तथा रम्य एवं महान् ऋद्धियों वाले मन्दिरों में वे सदा श्रीदेवी का जाप करते और उसके ही गुणगणों को पढ़ा करते हैं। ये महान् भाग वाले पुरुष अपनी नारियों से परिवेष्टित होकर निवास किया करते हैं ।४५-४६। जब इनके पुण्य कर्मों का क्षय हो जाता है तो उस स्वर्गीय सुख का त्याग करके फिर इसी मनुष्य का देह प्राप्त किया करते हैं। पूर्व की वासना उनकी आत्मा में बनी ही रहा करती है और वे पुनः चक्रिणी का अर्चन किया करते हैं । फिर वे श्रीनगर में शक्रनील महास्थली में गमन किया करते हैं। ।४७। हे मुने ! उस स्थल के सम्पर्क से ही राग-द्वेष से समुत्पन्न भावों से जो नील होते हैं वे सर्वदा युक्त होते हैं ऐसे ही मनुष्य रहते हैं ।४८। जो ज्ञान वाले मनुष्य होते हैं वे निर्द्वन्द्व और नियत इन्द्रियों वाले हैं। हे मुने ! वे विस्मय युक्त होकर महेश्वरी में प्रवेश किया करते हैं ।४९।

इन्द्रनीलाख्यशालस्यांतरे मारुतयोजने ।
मुक्ताफलमयः शालः पूर्ववद्गोपुरान्वितः ॥५०॥

४७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अत्यंतभास्वरा स्वच्छा तयोर्मध्ये स्थली मुने ।
सर्वापि मुक्ताखचिताः शिशिरातिमनोहराः ॥५१॥
ताम्रपर्णी महापर्णी सदा मुक्ताफलोदका ।
एवमाद्या महानद्यः प्रवहन्ति महास्थले ॥५२॥
तासां तीरेषु सर्वेऽपि देवलोकनिवासिनः ।
वसंति पूर्वजनुषि श्रीदेवीमन्त्रसाधकाः ॥५३॥
पूर्वाद्यष्टसु भागेषु लोकाः शक्रादिगोचराः ।
मुक्ताशालस्य परितः संयुज्य द्वारनेशकान् ॥५४॥
मुक्ताशालस्य नीलस्य द्वारयोर्मध्यदेशतः ।
पूर्वभागे शक्रलोकस्तत्कोणे वह्निलोकभूः ॥५५॥
याम्यभागे यमपुरं तत्र दण्डधरः प्रभुः ।
सर्वत्र ललितामन्त्रजापी तीव्रस्वभाववान् ॥५६॥

इन्द्रनील नामक शाल के अन्तर में मरुत योजन में एक मुक्ताफलों से परिपूर्ण शाल है और वह पहिली भांति ही गोपुर से समन्वित है ।५०। हे मुने ! उन दोनों के मध्य में अत्यधिक भास्वर स्थली है जो परम स्वच्छ है । वह सब ही मुक्ताओं से खचित है और शिशिर से अतीव मनोहर है । ।५१। उस महा स्थल में ताम्रपर्णी—महापर्णी आदि महा नदियाँ हैं जिनका जल मुक्ता फलों के ही समान हैं । ऐसी नदियाँ सर्वदा वहाँ बहा करती हैं । ।५२। उनके तटों पर सभी देवलोक के निवासी वास किया करते हैं जो अपने पूर्वजन्म में श्रीदेवी के मन्त्र की साधना करने वाले हैं ।५३। पूर्व आदि आठ भागों में शक्रादि गोचर लोक हैं जो मुक्ता शाल के सब ओर द्वार-देशकों को संयोजित करते हैं ।५४। मुक्ता शाल नील के द्वारों में मध्य देश से पूर्व भाग में इन्द्र लोक हैं और उसके कोण में वह्निलोक की भूमि है । ।५५। याम्य भाग में यम राज का नगर है । वहाँ पर दण्डधर प्रभु निवास किया करते हैं । सर्वत्र ललिता के मन्त्र का जाप करने वाले हैं और वीन स्वभाव वाले हैं ।५६।

आज्ञाधरो यमभटैश्चित्रगुप्तपुरोगमैः ।
सार्धं नियमयत्येव श्रीदेवीसमयं गुहः ॥५७॥

पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताहार वर्णन ] [ ४७५

गुहसप्तान्दुराचाराँल्ललिताद्वेषकारिणः । कूटभक्तिपरान्मूर्खान् स्तब्धानत्यंतदर्पितान् ॥५८ मन्त्रचोरान्कुमन्त्रांश्च कुविद्यानघसंश्रयान् । नास्तिकान्पापशीलांश्च वृथैव प्राणिहिंसकान् ॥५९ स्त्रीद्विष्टाँल्लोकविद्विष्टान्पाषंडानां हि पालिनः । कालसूत्रे रौरवे च कुम्भीपाके च कुम्भज ॥६० असिपत्रवने घोरे कृमिभक्षे प्रतापने । लालाक्षेपे सूचिवेधे तथैवांगारपातने ॥६१ एवमादिषु कष्टेषु नरकेषु घटोद्भव । पातयत्याज्ञया तस्याः श्रीदेव्याः स महौजसः ॥६२ तस्यैव पश्चिमे भागे निर्ऋतिः खड्गधारकः । राक्षसं लोकमाश्रित्य वर्तते ललितार्चकः ॥६३

चित्रगुप्त जिनमें अग्रणी है ऐसे यमराज के भटों के साथ आज्ञा के धारण करने वाले गुह श्री देवी के समय को नियमित किया करते हैं ।५७। जो गुह के द्वारा शप्त हैं—दुराचारी हैं—ललिता के साथ द्वेष करने वाले हैं—कूटभक्ति में तत्पर हैं—मूर्ख हैं—स्तब्ध हैं और बहुत ही अधिक दर्प वाले हैं—मन्त्र चोर हैं—कुत्सित मन्त्र वाले हैं—कुविद्या के पाप का संश्रय करने वाले हैं—नास्तिक हैं—पाप कर्मों के करने वाले हैं उनको भिन्न-भिन्न नरकों में डाल दिया जाता है। उन नरकों के नाम ये हैं—कालसूत्र-रौरव-कुम्भीपाक-वह महान ओज वाला उसी श्री देवी की आज्ञा से हे घटोद्भव ! इन नरकों में डाल दिया करता है ।५८-६२। उसके ही पश्चिम भाग में खड्ग का धारण करने वाला निर्ऋति है। वह भी श्री ललिता का अर्चक राक्षस लोक का आश्रय ग्रहण करके रहा करते हैं ।६३।

तस्य चोत्तरभागे तु द्वारयोरंतरस्थले । वारुणं लोकमाश्रित्य वरुणे वर्तते सदा ॥६४ वारुण्यास्वादनोन्मत्तः शुभ्रांगो झषवाहनः । सदा श्रीदेवतामंत्रजापी श्रीक्रमसाधकः ॥६५

४७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

श्रीदेवतादर्शनस्य द्वेषिणः पाशबन्धनैः ।
बद्ध्वा नयत्यधोमार्गं भक्तानां बन्धमोचकः ॥६६॥
तस्य चोत्तरकोणेषु वायुलोको महाद्युतिः ।
तत्र वायुशरीराश्च सदानन्दमहोदयाः ॥६७॥
सिद्धा दिव्यर्षयश्चैव पवनाभ्यासिनोऽपरे ।
गोरक्षप्रमुखाश्चान्ये योगिनो योगतत्पराः ॥६८॥
एतैः सह महासत्त्वस्तत्र श्रीमारुतेश्वरः ।
सर्वथा भिन्नमूर्त्तिश्च वर्तते कुम्भसम्भव ॥६९॥
इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्णा तस्य शक्तयः ।
तिस्रो मारुतनाथस्य सदा मधुमदालसाः ॥७०॥

उसके उत्तर भाग में दोनों के मध्य स्थल में वारुण लोक का आश्रयके लेकर सदा वरुण देवता रहा करता है ॥६४॥ यह वारुणी के अस्वादन में मत्त रहता है । इसका परमशुभ्र है और वृष इसका वाहन है । यह भी श्रीदेवी के मन्त्र के जप करने वाला है और श्री के क्रम की साधन करने वाला है ।६५। जो भी श्री देवता से द्वेष करने वाले हैं उनको पाशों के बन्धनों से बाँधकर भक्तों के बन्धन को छुड़ाने वाला यह अधो मार्ग में पहुँचा दिया करता है ।६६। और उसके उत्तर कोने में महती द्युति वाला वायुलोक है । वहाँ पर वायु के ही शरीरों वाले तथा सर्वदा आनन्द से पूर्ण महोदय सिद्ध-गण और दिव्य ऋषिगण तथा दूसरे पवन के अभ्यास वाले—गो की रक्षा में प्रधान—योग में परायण योगी रहा करते हैं और इन्हीं के साथ महान सत्त्व वाला श्रीमारुतेश्वर निवास करते हैं । इनकी मूर्ति सर्वथा भिन्न है ।६७-६९। हे कुम्भ-सम्भव ! इडा-पिङ्गला और सुषुम्णा इसकी शक्तियाँ हैं । ये तीन शक्तियाँ मरुतनाथ की सर्वदा मधु के मद से अलस रहा करती हैं ।७०।

ध्वजहस्तो मृगवरे वाहने महति स्थितः ।
ललितायजनध्यानक्रमपूजनतत्परः ॥७१॥
आनन्दपूरिताङ्गीभिरन्याभिः शक्तिभिर्वृतः ।
स मारुतेश्वरः श्रीमान्सदा जपति चक्रिणीम् ॥७२॥
तेन सत्त्वेन कल्पान्ते त्रैलोक्यं सचराचरम् ।

पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४७७

परागमयतां नीत्वा विनोदयति तत्क्षणात् ॥७३ तस्य सत्वस्थ सिद्ध्यर्थं तानेव ललितेश्वरीम् । पूजयन्भावयन्नास्ते सर्वाभरणभूषितः ॥७४ तल्लोकपूर्वभागस्थे यक्षलोके महाद्युतिः । यक्षेंद्रो वसति श्रीमांस्तद्द्वारद्रुममध्यगः ॥७५ निधिभिश्च नवाकारैर्ऋद्धिवृद्ध्यादिशक्तिभिः । सहितो ललिताभक्तान्पूरयन्धनसम्पदा ॥७६ यक्षीभिश्च मनोज्ञाभिरनुकूलप्रवृत्तिभिः । विविधैर्मधुभेदैश्च सम्पूजयति चक्रिणीम् ॥७७

वह मरुतेश्वर श्रेष्ठ सिंह के वाहन पर विराजमान हैं—हाथ में ध्वजा लिए हुए हैं और ललिता देवी के यजन-ध्यान और अर्चन के क्रम में परायण रहते हैं ।७१। आनन्द से पूरित अङ्गों वाली अन्य शक्तियों से समावृत रहते हैं । वह श्रीमान मरुतेश्वर सदा चक्रिणी का जाप किया करते हैं ।७२। उसी के सत्त्व से चराचर त्रैलोक्य को कल्प के अन्त में परागमयता को प्राप्त करके उसी क्षण में विनोदित किया करते हैं ।७३। उसी सत्त्व की सिद्धि के लिए उसी ललितेश्वरी की भावना तथा अर्चना करते हुए समस्त आभरणों से भूषित हैं ।७४। उस लोक के पूर्व भाग में यक्षलोक है उसमें महान कान्ति सम्पन्न यक्षराज निवास किया करते हैं । यह श्री सम्पन्न हैं और उसके द्वारों के मध्य में स्थित हैं ।७५। निधियों के द्वारा जो नौ हैं तथा ऋद्धि, वृद्धि आदि शक्तियों के द्वारा ललिता के भक्तों की धन सम्पदा से पूर्ति किया करते हैं ।७६। अनुकूल प्रवृत्ति वाली परम सुन्दरी पत्नियों के सहित अनेक प्रकार के मधु के भेदों से उसी चक्रिणी देवी की सविधि पूजा किया करते हैं ।७७।

मणिभद्रः पूर्णभद्रो मणिमान्माणिकन्धरः । इत्येवमादयो यक्षसेनान्यस्तत्र सन्ति वै ॥७८ तल्लोकपूर्वभागे तु रुद्रलोको महोदयः । अनर्घ्यरत्नखचितस्तत्र रुद्रोऽधिदेवता ॥७९ सदैव मन्युना दीप्तः सदा बद्धमहेषुधिः ।

४७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स्वसमानैर्महासत्त्वैर्लोकनिर्वाहदक्षिणैः ॥८० अधिज्यकार्मुकेंदक्षः षोडशावरणस्थितः । आवृतः सततं वक्त्रैर्जपञ्छ्रीदेवतामनुम् ॥८१ श्रीदेवीध्यानसम्पन्नः श्रीदेवीपूजनोत्सुकः । अनेककोटिरुद्राणीगणमंडितपार्श्वभूः ॥८२ ताश्च सर्वाः प्रदीप्तांग्यो नवयौवनगर्विताः । ललिताध्याननिरताः सदासवमदालसाः ॥८३ ताभिश्च साकं स श्रीमान्महारुद्रस्त्रिशूलभृत् । हिरण्यबाहुप्रमुखै रुद्रैरन्यैर्निषेवितः ॥८४

वहाँ पर बहुत से यक्षराज के सेनानी गण भी निवास किया करते हैं जिनके प्रमुख नाम मणि भद्र-पूर्ण भद्र-मणिमान और मणिकन्धर हैं ।७८। उस लोक के पूर्व भाग में महान उदय वाला रुद्रलोक भी हैं। वेशकी मती रत्नों से खचित वहाँ पर रुद्र उसके अधिष्ठाता देव हैं ।७९। वह सदा हीं क्रोध से दीप्त रहता है और सर्वदा धनुष को चढ़ाये हुए रहते हैं । अपने ही सदृश-दक्ष-षोडश आवरणों में स्थित वक्त्रों से निरन्तर आवृत्त श्री देवता के मन्त्र का जाप किया करता है ।८०-८१। श्री देवी के ध्यान से सम्पन्न और श्री देवी के पूजन में समुत्सुक-बहुत सी करोड़ों रुद्राणियों के गणों से मण्डित पार्श्व की भूमि वाले हैं ।८२। वे सभी रुद्राणियाँ भी प्रदीप्त अङ्गों वाली हैं और नवीन यौवन के गर्व से अन्वित हैं। वे सभी श्री ललिता के ध्यान में निमग्न रहा करती हैं तथा सर्वदा आसव के मद से अलग हैं ।८३। उन सबके साथ में श्रीमान् महान् रुद्र त्रिशूल के धारी हैं और हिरण्य बाहु जिनमें प्रमुख हैं ऐसे अन्य अनेक रुद्रों के द्वारा निषेवित हैं ।८४।

ललितादर्शनभ्रष्टानुद्धतान्गुरुधिक्कृतान् । शूलकोट्या विनिर्भिद्य नेत्रोत्थैः कटुपावकैः ॥८५ दहंस्तेषां वधूर्भृत्यान्प्रजाश्चैव विनाशयन् । आज्ञाधरो महावीरो ललिताज्ञाप्रपालकः ॥८६ रुद्रलोकेऽतिरुचिरे वर्तते कुम्भसम्भव । महारुद्रस्य तस्यर्षे परिवाराः प्रमाथिनः ॥८७

पुष्पराग प्रकारादि मुक्ताकार वर्णन ] [ ४७६

ये रुद्रास्तानसंख्यातान्को वा वक्तुं पटुर्भवेत् ।
ये रुद्रा अधिभूम्यां तु सहस्राणां सहस्रशः ॥८८
दिवि येऽपि च वर्तंते सहस्राणां सहस्रशः ।
येषामन्नमिषवश्चैव येषां वातास्तथेषवः ॥८९
येषां च वर्षमिषवः प्रदीप्ताः पिङ्गलेक्षणाः ।
अर्णवे चान्तरिक्षे च वर्तमाना महौजसः ॥६०
जटावंतो मधुष्मन्तो नीलग्रीवा विलोहिताः ।
ये भूतानामधिभुवो विशिखासः कपर्दिनः ॥६१

ललिता के दर्शन से भ्रष्ट—उद्धत और गुरु के द्वारा धिक्कृत हैं उनको शूल की कोटि से भेदन करके विनष्ट कर देता है। तथा नेत्रों से समुत्पन्न तीक्ष्ण पावक से उनके भृत्य-वधू और सन्तति का दाह करके विनाश कर दिया करता है। यह महावीर आज्ञा का पालक और ललिता का आदेश करने वाला है ।८५-८६। हे कुम्भसम्भव ! यह अतीव सुरम्य रुद्रलोक में विद्यमान रहता है। हे ऋषे ! उस महारुद्र के परिवार प्रमाथी हैं ।८७। जो भी रुद्र हैं वे अगणित हैं ऐसा कोई भी पटु नहीं है कि उनकी गणना कर सके। जो रुद्र भूमि में हैं वे भी सहस्रों ही हैं ।८८। और जो दिवलोक में हैं वे भी हजारों ही हैं। जिनके अन्नमिष हैं और जिनके वात तथा इषु हैं ।८९। और जिनके वर्ष इषु हैं—ये परम प्रदीप्त हैं तथा इनके नेत्र पिङ्गल वर्ण के हैं। ये महान ओज वाले सागर में—अन्तरिक्ष में भी वर्त्तमान रहा करते ।६०। ये जटाजूट धारी हैं—मधुमान हैं—इनकी ग्रीवा नील वर्ण की है और विलोहिव हैं। ये भूतों के अधिभू हैं—विशिखा और कपर्दी हैं ।६१।

ये अन्नेषु विविध्यंति पात्रेषु पिबतो जनान् ।
ये पथां रथका रुद्रा ये च तीर्थनिवासिनः ॥६२
सहस्रसंख्या ये चान्ये सृकावंतो निषंगिणः ।
ललिताज्ञाप्रणेतारो दिशो रुद्रा वितस्थिरे ॥६३
ते सर्वे सुमहात्मानः क्षणाद्विश्वत्रयीवहाः ।
श्रीदेव्या ध्याननिष्णाताञ्छ्रीदेवीमन्त्रजापिनः ॥६४

४८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

श्रीदेवतायां भक्ताश्च पालयंति कृपालवः ।
षोडशावरणं चक्रं मुक्ताप्राकारमंडले ॥६५
आश्रित्य रुद्रास्ते सर्वे महारुद्रं महोदयम् ।
हिरण्यबाहुप्रमुखा ज्वलन्मन्युमुपासते ॥६६

जो अन्नों में विविद्ध होते हैं--पात्रों में जनों को पीते हैं पथों में रथक हैं और जो तीर्थों में निवास करने वाले हैं ।६२। और जो अन्य हैं उनकी भी सहस्रों ही संख्या है। ये सृकावान् हैं और निषङ्गी हैं। सभी ललितादेवी की आज्ञा के प्रणेता हैं। ऐसे रुद्र दिशाओं में प्रस्थित हैं ।६३। वे सभी महान आत्माओं वाले हैं और क्षणभर में तीनों लोकों के वहन करने वाले हैं। ये सभी श्रीदेवी के ध्यान में परम निष्णात रहने वाले हैं तथा श्रीदेवी के मन्त्र का जाप करने वाले हैं ।६४। ये श्रीदेवी में परम भक्त हैं तथा कृपालु उसकी आज्ञा का पालन किया करते हैं। सोलह आवरण वाले चक्र में जो मुक्ताओं के प्रकार मण्डल में है समाश्रय ग्रहण करके सभी महोदय महारुद्र की उपासना करते हैं जो कि क्रोध से जाज्वल्यमान हैं। इनमें हिरण्य बाहु प्रधान हैं ऐसे सब रुद्र हैं ।६५-६६।

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॥ दिग्पालादि शिवलोकान्तर वर्णन ॥

अगस्त्य उवाच-
षोडशावरणं चक्रं किं तद्रुद्राधिदैवतम् ।
तत्र स्थिताश्च रुद्राः के केन नाम्ना प्रकीर्तिताः ॥१
केष्वावरणबिंबेषु किन्नामानो वसन्ति ते ।
यौगिकं रौढिकं नाम तेषां ब्रूहि कृपानिधे ॥२

हयग्रीव उवाच-
तत्र रुद्रालयः प्रोक्तो मुक्ताजालकनिर्मितः ।
पञ्चयोजनविस्तारस्तत्संख्यायामशोभितः ॥३
षोडशावरणेर्युक्तो मध्यपीठमनोहरः ।
मध्यपीठे महारुद्रो ज्वलन्मन्युस्त्रिलोचनः ॥४

दिग्पालादि शिवलोकान्तर वर्णन ] [ ४८१

सज्जकार्मुकहस्तश्च सर्वदा वर्तते मुने । त्रिकोणे कथिता रुद्रास्त्रय एव घटोद्भव ॥५॥ हिरण्यबाहु सेनानीर्दिशांपतिरथापरः ॥६॥ वृक्षाश्च हरिकेशाश्च तथा पशुपतिः परः । शष्पिञ्जरस्त्वषीमांश्च पथीनां पतिरेव च ॥७॥

श्री अगस्त्यजी ने कहा—षोडशावरण चक्र क्या वह रुद्र के अधिदैवत वाला है। वहां पर संस्थित रुद्र कौन है और किस नाम से प्रकीत्तित हैं ।१। ।२। और किन आवरण विष्ठों में किस नामों वाले निवास किया करते हैं ? हे कृपानिधे ! उनका यौगिक और रूढिक नाम आप मुझे बतलाइये ।२। श्री हयग्रीवजी ने कहा—वहां पर तीन रुद्र कहे गये हैं—मुक्ता जातक में निर्मित हैं। उसकी संख्या और आयाम से शोभित पाँच योजन का विस्तार है ।३। मध्यपीठ मनोहर सोलह आवरणों से युक्त है। मध्य में जो पीठ है जो जाज्वल्यमान मन्यु (क्रोध) वाले और तीन लोचनों से समन्वित हैं ।४। हे मुने ! वह सर्वदा सुसज्जित कार्मुक से हाथ में लेकर विद्यमान रहा करते हैं। हे घटोद्भव ! त्रिकोण में तीन ही रुद्र कहे गये हैं ।५। एक तो हिरण्य बाहु हैं—दूसरे सेनानी हैं और तीसरे का नाम दिशांपति है ।६। तथा वृक्ष-हरिकेश और तीसरे पशुपति हैं। शष्पिञ्जर—त्विषीमान् और पथीनां पति है ।७।

एते षट्कोणगाः किं च बभ्रुशास्त्वष्टकोणके । विव्याध्यन्नपतिश्चैव हरिकेशोपवीतिनौ ॥८॥ पुष्टानां पतिरप्यन्यो भवो हेतिस्तथैव च । दशपत्रे स्वावरणे प्रथमो जगतां पतिः ॥९॥ रुद्रातताविनी क्षेत्रपतिः सूतस्तथापरः । अहं त्वन्यो वनपती रोहितः स्थपतिस्तथा ॥१०॥ वृक्षाणां पतिरप्यन्यश्चैते सज्जशरासनाः । मन्त्री च वाणिजश्चैव तथा कक्षपतिः परः ॥११॥ भवन्तिस्तु चतुर्थः स्यात्पञ्चमो वाग्विदस्ततः । ओषधीनां पतिश्चैव षष्ठः कलशसंभव ॥१२॥

४८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

उच्चैर्घोषाक्रन्दयन्तौ पतीनां च पतिस्तथा । कृत्स्नवीतश्च धावश्च सत्त्वानां पतिरेव च ॥१३ एते द्वादश पत्रस्थाः पञ्चमावरणस्थिताः । सहमानश्च निर्व्याधिरव्यधीनां पतिस्तथा ॥१४ ये तो षट्कोणों में स्थित हैं और अष्ट कोणों में बहुत से हैं । निर्व्याधि—हरिकेश—उपवीती—पुष्टों के पति—भव—हेति हैं । दश पत्र आवरण में प्रथम जगतों के पति हैं ।८-६। रुद्र-अततावी—क्षेत्रपति—तथा सूत—अहंतु अन्य पति—रोहित और स्थपति हैं ।१०। अन्य वृक्षों का पति—ये धनुष को सुसज्जित रखने वाले हैं । मन्त्री-वाणिज-कक्ष पति-भवन्ति चौथा और पांचवां वाग्विस्तत है । औषधियों के पति-छठवां हे कलश सम्भव है ।११-१२। उच्चैर्घोष-आक्रन्दयन्त तथा पतियों का पति है । कृत्स्नवीत-धाव-सत्वों का पति—ये इतने द्वादश पत्रों में स्थित हैं जो पञ्चम आवरण में वर्तमान रहते हैं । सहमान निर्व्याधि-के पति हैं ।१३-१४।

ककुभश्च निषंगी च स्तेनानां च पतिस्तथा । निचेरुश्चेति विज्ञेयाः षष्ठावरणदेवताः ॥१५ अधः परिचरोऽरण्यः पतिः किं च सृकाविषः । जिघांसन्तो मुष्णतां च पतयः कुम्भसम्भव ॥१६ असीमंतश्च सुप्राज्ञस्तथा नक्तंचरो मुने । प्रकृतीनां पतिश्चैव उष्णीषी च गिरेश्चरः ॥१७ कुलुञ्चानां पतिश्चैवेषुमन्तः कलशोद्भव । धन्वाविदश्चातन्वानप्रतिपूर्वंदधानकाः ॥१८ आयच्छतः षोडशैते षोडशारनिवासिनः । विसृजन्तस्तथास्यंतो विध्यंतश्चापि सिंधुप ॥१९ आसीनाश्च शयानाश्च यन्तो जाग्रत एव च । तिष्ठन्तश्चैव धावन्तः सभ्याश्चैव समाधिपाः ॥२० अश्वाश्चैवाश्वपतय अव्याधिन्यस्तथैव च । विविध्यंतो गणाध्यक्षा बृहन्तो विध्यमर्हन् ॥२१

दिग्पालादि शिवलोकान्तर वर्णन ] [ ४८३

ककुभ—निषंग—स्तेनों के पति ओर निचेरु—छठवें आवरण के देवता हैं ॥१५॥ अद्य—परिवर—अरण्य—पति—सुकाविष—जिघांसंत—मुष्णतां पति—हे कुम्भसम्भव ! धन्वाविन्द्—आतन्वान—आतन्वान—असीमन्त—सुप्राज्ञनक्तंचर—प्रकृतियों के पति—उष्णीषी—गिरेश्चर—कुलंचों से पति—इषुमन्त—प्रतिपूर्वं दधानक—आयच्छत—ये षोडश सोलह आरों के निवासी हैं—विसृजन्त—आस्यन्त धावन्त—सभ्य—समाधिप—अश्व—अश्वपति—व्याधि—न्यस्त—विविध्यन्त—गणाध्यक्ष—बृहन्त और विंध्य-मर्दन हैं ॥१६-२१॥

गृत्संश्चाष्टादशविधा देवता अष्टमावृतौ । अथ गृत्साधिपतयो व्राता व्राताधिपास्तथा ॥२२॥ गणाश्च गणपाश्चैव विश्वरूपा विरूपकाः । महान्तः क्षुल्लकाश्चैव रथिनश्चारथाः परे ॥२३॥ रथाश्च रथपत्याख्याः सेनाः सेनान्य एव च । क्षत्तारः संग्रहीतारस्तक्षाणो रथकारकाः ॥२४॥ कुलालश्चेति रुद्रास्ते नवमावृत्तिदेवताः । कर्माराश्चैव पुञ्जिष्ठा निषादाश्चेषुकृद्गणाः ॥२५॥ धन्वकारा मृगयवः श्वनयः श्वान एव च । अश्वाश्चैवाश्वपतयो भवो रुद्रो घटोद्भव ॥२६॥ शर्वः पशुपतिर्नीलग्रीवश्च शितिकण्ठकः । कपर्दी व्युप्तकेशश्च सहस्राक्षस्तथापरः ॥२७॥ शतधन्वा च गिरिशः शिपिविष्टश्च कुम्भज । मीढुष्टम इति प्रोक्ता रुद्रादशमशालगा ॥२८॥

और गृत्स ये अष्टमावृत्ति में अष्टादश नामक देवता हैं । इसके अनन्तर गृत्साधिप तप—व्राता ता व्रातधिपा—गणा—गणपा विश्वरूपा विरुपका—महान्त—क्षुल्लका—रथित—आरथा—तथा—रथ पत्याख्या—सेना—सेनान्य—क्षत्तार—संग्रहीतार—तक्षाण---रथकारका—कुलाल—ये रुद्र नवमाकृति वे देवता है ।२२-२४। कुमार—पुंजिष्ठा—निषादा—इषुकृद्-गणा—धन्वकारा—मृगयव—श्वनय—श्वान—और अश्वा—अश्वय तप-हे

४८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

घटोद्भव ! भव और रुद्र-शर्व-पशुपति-बालग्रीव-शिति कण्ठक- कपर्दी-व्युप्तकेश-सहस्राक्ष-शतधन्वागिरिश-शिपिविष्ट-मीढुष्ठम ये इतने रुद्र दशम शाल में से स्थित हैं ।२५-२८।

अथैकादशचक्रस्था इषुमद्ध्रस्ववामनाः । बृहंश्च वर्षीयांश्चैव वृद्धः समृद्धिना सह ॥२६

अग्र्यः प्रथम आशुञ्चाजिरोन्यः शीघ्रशिभ्यकौ । उर्म्याविस्वन्यरुद्रौ च स्रोतस्यो दिव्य एव च ॥३०

ज्येष्ठश्चैव कनिष्ठश्च पूर्वजावरजो तथा । मध्यमश्चावगम्यश्च जघन्यश्च घटोद्भव ॥३१

चतुर्विंशतिराख्याता एते रुद्रा महाबलाः । अथ बुद्न्यः सोम्यरुद्रः प्रतिसर्पकयाम्यकौ ॥३२

क्षेम्योवोचवखल्यश्च ततः श्लोक्यावसान्यकौ । वन्यः कक्ष्यः श्रवश्चैव ततोऽन्यस्तु प्रतिश्रवः ॥३३

आशुषेणश्चाशुरथः शूरश्च तपसां निधे । अवभिदश्च वर्मी च वरूथी विल्मिना सह ॥३४

कवची च श्रुतश्चैव सेनो दुन्दुभ्य एव च ॥३५

उसके उपरान्त एकादशवें चक्र में स्थित रुद्रों के नाम हैं। इषुमद-ह्रस्ववामन-बृहन्-वर्षीयान्-वृद्ध-समृद्धि-अग्र्य-प्रथम-आशु-अजिरोन्य-शीघ्र-शिभ्यक-उर्म्याविसु-अन्य रुद्र-स्रोतस्य-दिव्य-ज्येष्ठ-कनिष्ठ-पूर्वक-अवरज-मध्यम-अवगम्य-जघन्य-ये चौबीस महाबल रुद्र आख्यात हैं । इसके उपरान्त बुद्न्य-सोम्य रुद्र-प्रतिसर्पक-याम्यक-क्षेम्य-वोचवखल्य-श्लोक्य-असान्यक-वन्य-कक्ष्य-श्रव-प्रतिश्रव-आशुषेण-आशुरथ-शूर-हे तपसांनिधे ! अवभिन्द-वर्मी-वरूथी-विल्मी-कवची-श्रुत-सेन-दुन्दुभी इत्यादि रुद्र हैं । २६-३५।

समाप्त