संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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वर्षंत्यो द्वादश प्रोक्ता मदारुणविलोचनाः । ताभिः समं स वर्षर्तुः शक्तिभिः परमेश्वरीम् ॥३०॥ सदैव संजपन्नास्ते निजोत्थैः पुष्पमंडलैः । ललिताभक्तदेशांस्तु भूषयन्स्वस्य सम्पदा ॥३१॥ तद्वैरिणां तु वसुधामनावृष्ट्या निपीडयन् । वर्तते सततं देवकिङ्करो जलदागमः ॥३२॥ मन्दारवाटिकायां तु सदा शरहतुर्वसन् । तां कक्षां रक्षति श्रीमांल्लोकचित्तप्रसादनः ॥३३॥ इषश्रीश्च तथोर्जश्रीस्तस्यतौः प्राणनायिके । ताभ्यां संजहृतुस्तोयं निजोत्थैः पुष्पमंडलैः । अभ्यर्चयति साम्राज्ञीं श्रीकामेश्वरयोषितम् ॥३४॥ हेमन्तर्तुर्महातेजा हिमशीतलविग्रहः । सदा प्रसन्नवदनो ललिताप्रियकिङ्करः ॥३५॥
अम्बा—दुला—निरत्नि—अभ्रयन्ती—मेघयन्त्रिका—वर्षयन्ती—चिबु- णिका और वारिधारा—वर्षन्ती ये बारह जो महान् नेत्रों वाली हैं इसकी शक्तियां हैं ।२६। उस ऋतु की इष श्री और ऊर्ज श्री दो प्राण नाभिकाएं हैं। अपने उठाये हुए पुष्प मण्डलों से उन दोनों के द्वारा जल का भली-भांति हरण किया जाया करता था। श्री कामेश्वर ही योषित का जो महा साम्रस्तो थी ये अभ्यर्चन करती हैं। उन सबके साथ जो वर्षा ऋतु की शक्तियां हैं वे श्रम से उत्थित पुष्पमण्डलों से सदा ही सम्पन्न हैं। जो ललिता के भक्तों के देश हैं उन पर कृपा से सम्पदा के द्वारा भूषित किया करती हैं ।३०-३१। उनके शत्रुओं की वसुधा को अनावृष्टि से पीड़ित करता हुआ देवी का किङ्कर जलदागम वर्तमान रहता है ।३२। मन्दारों की वाटिका में सदा ही शरद ऋतु निवास किया करता है। वह श्रीमान् लोगों के चित्त को प्रसन्न करने वाला उस कक्षा की रक्षा करता है ।३२-३३। हेमन्त ऋतु हिमसे शीतल विग्रह वाला होता है। यह सदा ही प्रसन्न मुख वाला है ओर ललिता देवी का बहुत ही प्रिय किंकर है ।३४-३५।